संसदीय प्रणाली की यात्रा!

Summary :

भारत ने आजादी के बाद जब अपनी संसदीय प्रणाली के लोकतन्त्र की यात्रा शुरू की तो लक्ष्य निर्धारित किया कि साल में कम से कम 150 दिन इसकी बैठकें होनी चाहिए मगर आज हालत यह हो गई है कि संसद साल भर में बामुश्किल से 55 दिन ही बैठ पाती है और इसमें भी इसका अधिकांश समय सत्ता और विपक्ष के बीच नारेबाजी के शोर-शराबे में ही बीत जाता है परिणामतः महत्वपूर्ण विधेयक बिना किसी रचनात्मक बहस के ही भारी शोर-शराबे के बीच पारित कर दिये जाते हैं। क्या पिछले 80 साल में हमारी संसदीय कार्यप्रणाली की यही उपलब्धि है?…

भारत ने आजादी के बाद जब अपनी संसदीय प्रणाली के लोकतन्त्र की यात्रा शुरू की तो लक्ष्य निर्धारित किया कि साल में कम से कम 150 दिन इसकी बैठकें होनी चाहिए मगर आज हालत यह हो गई है कि संसद साल भर में बामुश्किल से 55 दिन ही बैठ पाती है और इसमें भी इसका अधिकांश समय सत्ता और विपक्ष के बीच नारेबाजी के शोर-शराबे में ही बीत जाता है परिणामतः महत्वपूर्ण विधेयक बिना किसी रचनात्मक बहस के ही भारी शोर-शराबे के बीच पारित कर दिये जाते हैं।

क्या पिछले 80 साल में हमारी संसदीय कार्यप्रणाली की यही उपलब्धि है? (15 अगस्त 1947 के बाद देश की संविधान सभा को ही फौरी लोकसभा में बदल दिया गया था।) इस गंभीर प्रश्न का आज देश के सभी राजनीतिक दलों से देश की जनता जवाब मांग रही है क्योंकि संसद इसके सत्र के शुरू औऱ समाप्त होने पर रस्म अदायगी करने की जगह नहीं है। यह सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच केवल आरोप-प्रत्यारोप में इसके भीतर और बाहर नारेबाजी करने की जगह भी नहीं है, बल्कि यह ऐसी जगह है जिसमें इस देश के करोड़ों लोगों की विकट समस्याओं का निदान ढूंढा जाता है।

संसद इस देश के लोगों की मेहनत, कर्मठता और लोकतन्त्र के प्रति अटूट निष्ठा का ऐसा सर्वोच्च संस्थान है जिसमें उनके वर्तमान से लेकर भविष्य के जीवन को सुरक्षित और आगे बढ़ाने के उपायों पर विस्तृत विचार होता है। यह बेसबब नहीं था कि हमारे स्वतन्त्रता सेनानियों ने राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के नेतृत्व में अंग्रेजों की दासता से मुक्ति का युद्ध लड़ते हुए साफ कर दिया था कि आजाद भारत संसदीय प्रणाली का ऐसा लोकतन्त्र अपनाएगा जिसमें सत्ता का केन्द्रीकरण किसी एक व्यक्ति के हाथ में न होकर सामूहिक तौर पर पूरे मन्त्रिमंडल के हाथ में होगा और राज्य स्तर तक यह प्रणाली जारी रहेगी जिससे सत्ता का अधिकाधिक विकेन्द्रीकरण हो सके और सदियों से दास मानसिकता के भाव में जी रहे भारत के लोगों के दिलों में खुद मुख्तारी का भाव जगे।

इसके लिए आजाद भारत के प्रत्येक वयस्क नागरिक को बिना किसी भेदभाव के एक वोट का अधिकार देकर प्राधिकृत किया गया कि वह इसका उपयोग करके अपने मनपसन्द की सरकार बनाये। इसलिए भारत के लोकतन्त्र को सहभागिता का लोकतन्त्र कहा जाता है क्योंकि लोकसभा में बहुमत से चुनी हुई सरकार की पहली जिम्मेदारी और जवाबदेही उस संसद के प्रति ही होती ही है जिसमें लोगों के एक वोट के अधिकार से चुने हुए सांसद आकर बैठते हैं। प्रत्यक्ष तौर पर भारत का संविधान चुनी हुई सरकार को इसके लोगों के प्रति ही जवाबदेह बनाता है।

यही वजह है कि सत्ता में बैठे हुए राजनीतिक दल की सरकार जब कोई विधेयक संसद में लाती है तो उस पर सत्ता व विपक्ष के सांसदों के बीच खुल कर बहस होती है जिससे देश की जनता के सभी प्रकार के विचारों से सम्बन्धित विधेयक को परिपूर्ण किया जा सके। मगर हम देख रहे हैं कि संसद के 25 दिन के सावन (मानसून) सत्र की 19 बैठकों के दौरान सरकार के 12 विधेयक पारित तो हो गये मगर बहस केवल एक पेपर लीक विरोधी विधेयक पर ही हुई और शेष 11 विधेयक लोकसभा में भारी शोर-शराबे के बीच ही बिना किसी बहस के पारित कर दिये गये लेकिन इस मामले में उच्च सदन राज्यसभा के रुख को हमें अलग से देखना होगा

जहां इसके सभापति उपराष्ट्रपति श्री सी.पी. राधाकृष्णन ने लोकसभा अध्यक्ष के मुकाबले तुलनात्मक रूप से अधिक लोकतन्त्राभिमुखी कर्त्तव्य परायणता का परिचय देते हुए विधेयकों पर छुटपुट बहस कराई और विपक्ष के नेता श्री मल्लिकार्जुन खड़गे को अपने उद्गार प्रकट करने का समुचित अवसर भी दिया जबकि लोकसभा में विपक्ष के नेता श्री राहुल गांधी ने जिस पेपर लीक विरोधी चर्चा में हिस्सा लिया उसमें उनका वक्तव्य अधूरा ही रहा।

संसदीय प्रणाली का नियम होता है कि संसद पर पहला अधिकार विपक्ष का होता है क्योंकि वह जनता के उस हिस्से की नुमाइन्दगी करता है जो अल्पमत में रहने के कारण विपक्ष में बैठता है मगर विपक्ष के सांसदों का चुनाव भी आम मतदाता अपने वोट के अधिकार का प्रयोग करके उसी प्रकार करता है जिस प्रकार सरकार में बैठे सत्ता पक्ष के सांसदों का। इस संसदीय प्रणाली में सरकार बेशक बहुमत की बनती है मगर वह देश के सभी मतदाताओं की होती है जिसकी वजह से विपक्ष की भूमिका भी सरकार के कार्यों में जायज तौर पर हस्तक्षेप करने की हो जाती है।

इसी वजह से इस संसदीय प्रणाली में संसद चलाने की प्राथमिक जिम्मेदारी सत्तारूढ़ सरकारी पक्ष की होती है जिसका सबब यह होता है कि संसद के भीतर उन मुद्दों को वरीयता दी जाये जिन्हें लेकर सड़कों पर आम जनता आन्दोलित रहती है। इस परिप्रेक्ष्य में संसद की उत्पादकता को मापने का नजरिया या गणित आम लोगों में इसकी प्रासंगिकता को कमतर करने का भाव जगाता है।

इस सन्दर्भ में मुझे लोकसभा के प्रथम अध्यक्ष श्री जी.वी. मावलंकर का वह कथन याद आता है जो पचास के दशक में उन्होंने लोकतान्त्रिक प्रणाली के बारे में आयोजत एक सम्मेलन में कहे थे। उन्होंने कहा था कि संसद की उपयोगिता का मूल्यांकन इस बात से नहीं होगा कि उसने कितने विधेयक पारित किये, बल्कि इस बात से होगा कि इसके माध्यम से देश के कितने लोगों के जीवन में सुधार और बदलाव आया।

इसीलिए संसद केवल वाद-विवाद और तर्क-वितर्क का अखाड़ा नहीं है बल्कि यह ऐसे अन्तिम निर्णय लेने का मंच है जिससे लोगों के जीवन में बदलाव आये। मगर क्या सितम हो रहा है कि पूरा सावन सत्र ऐसे बह गया जैसे भारी बरसात में सब कुछ बह जाता है। आखिरकार वह कौन सा कारण है कि सत्तापक्ष और विपक्ष आपस में बैठ कर देश की सड़कों पर उठ रहे सैलाब को संसद में परिलक्षित नहीं कर सकते जबकि संसद आम जनता का ही प्रतिनिधित्व करती है। मगर सत्तारूढ़ दल और विपक्षी दल पूरे सत्र के पानी में बह जाने को लेकर अजीब प्रकार की राजनीति में उलझे हुए हैं।

बेशक यह कहा जा सकता है लोकतन्त्र में संसद के माध्यम से राजनीतिक दल अपनी-अपनी राजनीति में चमक लाने की कोशिशें करते हैं मगर यह कार्य संसद की प्रासंगिकता को ही दांव पर लगा कर नहीं किया जा सकता क्योंकि इससे आमजन में इस प्रणाली के प्रति विरक्ति पैदा करने का खतरा छिपा रहता है। सवाल यह नहीं है कि संसद की कार्यवाही पर कितना खर्च होता है? बल्कि सवाल यह है कि जिस संसदीय प्रणाली पर भारत का पूरा लोकतन्त्र टिका हुआ है वह भारत के आम लोगों के जीवन के खर्चों को सुगम बनाती है या नहीं?

Aditya Chopra

Aditya Chopra is well known for his phenomenal viral articles.