ट्रम्प नीति: इतिहास से कोई नहीं सीखता

Summary :

इतिहास ढेरों सबक देता है, मगर सीखता कोई भी नहीं है। जब से विश्व का इतिहास समय की दीवार पर लिखा जाने लगा है तब से यह तथ्य बार-बार दोहराया गया है कि तानाशाही व निरंकुश राज्य की उम्र लम्बी नहीं होती। यह भी दोहराया जाता है कि तानाशाह पूरी जिंदगी भय और आतंक के साए में जीने के लिए मजबूर होते हैं। प्राचीन इतिहास को छोड़ दें, समकालीन इतिहास में भी सिकंदर, चंगेज़ खान, हिटलर, मुसोलिनी, सद्दाम हुसैन, कर्नल गद्दाफी, जि़या-उल-हक, भुट्टो और इमरान का हश्र देख लें। चंगेज़ खान ने अपने करीबी सिपाहसालारों को निर्देश दे रखा था…

इतिहास ढेरों सबक देता है, मगर सीखता कोई भी नहीं है। जब से विश्व का इतिहास समय की दीवार पर लिखा जाने लगा है तब से यह तथ्य बार-बार दोहराया गया है कि तानाशाही व निरंकुश राज्य की उम्र लम्बी नहीं होती। यह भी दोहराया जाता है कि तानाशाह पूरी जिंदगी भय और आतंक के साए में जीने के लिए मजबूर होते हैं।
प्राचीन इतिहास को छोड़ दें, समकालीन इतिहास में भी सिकंदर, चंगेज़ खान, हिटलर, मुसोलिनी, सद्दाम हुसैन, कर्नल गद्दाफी, जि़या-उल-हक, भुट्टो और इमरान का हश्र देख लें।
चंगेज़ खान ने अपने करीबी सिपाहसालारों को निर्देश दे रखा था कि जब वह मरे तो उसे एक अज्ञात कब्र में दफनाया जाए। जहां वह दफन हो उसके आसपास सभी क्षेत्रों में घोड़े दौड़ाए जाएं और मिट्टी को ऐसा फैलाया जाए कि कब्र की पहचान भी न हो पाए। उसे भय था कि उसके मरने के बाद उससे पीडि़त लोग उसकी कब्र तक खोद डालेंगे और उसके शव को गिद्धों व जंगली जानवरों के सुपुर्द कर देंगे। उसे उत्तरी मंगोलिया में 18 अगस्त, 1227 को दफनाया गया था। उसके अंतिम संस्कार में आने वाले सभी लोगों को भी मार दिया गया था और बाद में एक नदी की धारा भी उस स्थल की ओर मोड़ दी गई थी।
सिकंदर की वसीयत का एक-एक पृष्ठ उसके पश्चाताप की चुगली करता है। विश्व विजय के लिए तबाही मचाने वाले सिकंदर ने अपने खाली हाथ, कफन के बाहर रखे जाने की वसीयत की थी, ताकि पूरा विश्व जान जाए कि असंख्य जिंदगियोंं को रौंदने वाला वह असफल महानायक इस संसार से खाली हाथ लौटा था।
हिटलर शत्रु सेनाओं से घिरने के भय से इतना आतंकित हो गया था कि उसने अपने बंकर में ही स्वयं को गोली मार ली थी और उसकी प्रेमिका ईवा ने विष निगल लिया था। हिटलर पर 60 लाख यहूदियों के नरसंहार का भी आरोप था। यही हश्र मुसोलिनी, सद्दाम हुसैन, गद्दाफी और जिया-उल-हक जैसे निरंकुश तानाशाहों का हुआ था। मगर इन सबके बावजूद भी किसी भी तानाशाह ने कोई सबक नहीं सीखा।
वेनेजुएला के राष्ट्रपति मादुरो को लगता था कि उनके अभेद्य-सुरक्षा कवच को कोई भी शत्रु भेद नहीं पाएगा। मगर 24 घंटे में ही उन्हें अमेरिकी सैनिक घसीटते हुए न्यूयार्क की अदालत में ले गए थे। अब डोनाल्ड ट्रम्प भी इसी भ्रम का शिकार हैं।
उन्हें भी भ्रम है कि वह भी ‘टैरिफ’ के चाबुकों का भय दिखाकर पूरे विश्व को अपने सामने झुका सकते हैं। इधर, रूसी राष्ट्रपति पुतिन भी स्वयं को सुरक्षा के कड़े दायरों में पूरी तरह अभेद्य मानते हैं। वह भी यूक्रेन को पूरी तरह नेस्तनाबूद करने पर आमादा हैं।
तानाशाही सोच का अतीत भी ढेरों सबक देता है, वर्तमान भी डराता है मगर सहमे-सहमे से तानाशाह इतिहास से कोई भी सबक नहीं लेते। लीबिया के तानाशाह मुअम्मर गद्दाफी की मौत 20 अक्तूबर, 2011 को लीबिया के सिरते शहर में हुई। वह नाटो के हवाई हमले से बचा लेकिन बाद में विद्रोही लड़ाकों ने उन्हें पकड़ लिया और सिर में गोली मारकर उनकी हत्या कर दी। गद्दाफी अपनी विदेश यात्राओं के मध्य विमानों से अपने टैंट, अपने ऊंट और अपने नकली हमशक्ल अंगरक्षक साथ ले जाता था। मगर एक बार नाटो के जेट विमानों ने उसके काफिले पर हमला किया जिससे उनके कई वाहन तबाह हो गए। हमले के बाद गद्दाफी और उनके कुछ साथी पास की नाली में छिप गए। विद्रोही लड़ाकों ने उस जगह को घेर लिया और उसे पकड़ लिया। बाद में उसे बुरी तरह घायल अवस्था में पकड़ा गया और गोली मार दी गई। इतिहास की इन चेतावनियों के बावजूद बाबा ट्रम्प अब ग्रीनलैंड, ईरान, मैक्सिको व अन्य कई देशों पर अपनी कुटिल नजरें गड़ाए हुए हैं। जाहिर है उन्होंने इतिहास में तानाशाहों की आतंकित जिंदगी से कोई सबक नहीं सीखा। अमेरिका इस समय भी एक सम्पन्न और पूर्णतया विकसित राष्ट्र है। ट्रम्प चाहते तो विश्व शांति के मसीहा भी बन सकते थे मगर महानायकत्व और दम्भ एक साथ नहीं चल सकते।
भारत के पड़ौसी बंगलादेश व पाकिस्तान भी ऐसे ही भ्रम का शिकार हैं। ट्रम्प अपने आसपास कुछ सिरफिरे सलाहकारों को लेकर चल रहे हैं। वह भारत व वर्तमान प्रधानमंत्री को भी अपने टैरिफ चाबुक दिखा रहे हैं, मगर भारतीय प्रधानमंत्री ने एक बार भी उनके दबाव तले रहने की ललक नहीं दिखाई। भारतीय स्वाभिमान की रक्षा में देश का हर नागरिक हर, राजनीतिक दल इस प्रश्न पर एकजुट हैं। यह एक सुखद स्थिति है और निश्चित है कि देश अपनी-अपनी प्रभुसत्ता की रक्षा को लेकर एकजुट रहेगा।

Dr. Chander Trikha