युद्ध और आर्थिक संकट

Summary :

युद्ध करता कोई और है लेकिन नुक्सान झेलते आम लोग और निवेशक हैं यानी जिसकी गलती नहीं, कीमत वो चुकाता है। हाल ही में इज़राइल, ईरान और संयुक्त राज्य अमेरिका के बीच हुए सैन्य टकरावों ने अन्तर्राष्ट्रीय कानून के तहत बल प्रयोग की वैधता पर बहस को फिर से तेज कर दिया है। हालांकि इस चर्चा का बड़ा हिस्सा संयुक्त राष्ट्र चार्टर के अनुच्छेद 2 (4) के पालन पर केंद्रित रहता है लेकिन एक उतना ही महत्वपूर्ण सवाल अक्सर नजरअंदाज हो जाता है-अवैध बल प्रयोग की आर्थिक कीमत कौन चुकाता है? होर्मुज़ स्ट्रेट के बंद होने के बाद से आशंका…

युद्ध करता कोई और है लेकिन नुक्सान झेलते आम लोग और निवेशक हैं यानी जिसकी गलती नहीं, कीमत वो चुकाता है। हाल ही में इज़राइल, ईरान और संयुक्त राज्य अमेरिका के बीच हुए सैन्य टकरावों ने अन्तर्राष्ट्रीय कानून के तहत बल प्रयोग की वैधता पर बहस को फिर से तेज कर दिया है। हालांकि इस चर्चा का बड़ा हिस्सा संयुक्त राष्ट्र चार्टर के अनुच्छेद 2 (4) के पालन पर केंद्रित रहता है लेकिन एक उतना ही महत्वपूर्ण सवाल अक्सर नजरअंदाज हो जाता है-अवैध बल प्रयोग की आर्थिक कीमत कौन चुकाता है?

होर्मुज़ स्ट्रेट के बंद होने के बाद से आशंका जताई जाती रही है कि भारत में भी तेल और गैस की कमी हो सकती है। देश की आर्थिक सेहत का मूल्यांकन करने वाली संस्थाओं-रिजर्व बैंक, मूडीज, एसएंडपी, विश्व बैंक, फिच और एशियन डवलपमेंट बैंक ने भारत के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) की विकास दर घटा दी है। जाहिर है कि हमारी अर्थव्यवस्था में संकुचन आया है। वैसे भी भारत अब विश्व की चौथी नहीं, छठी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है। इसमें और भी गिरावट के आसार हैं।

यह मूल्यांकन आसन्न आर्थिक संकट का पहला संकेत है। खुद प्रधानमंत्री ने माना है कि कोरोना महामारी वैश्विक संकट थी तो ईरान युद्ध इस दशक का सबसे बड़ा संकट है। प्रधानमंत्री आयात कम करने के पक्षधर हैं, ताकि विदेशी मुद्रा को बचाया जा सके। ईरान युद्ध की शुरुआत में भारत का विदेशी मुद्रा भंडार 720 अरब डॉलर का था, लेकिन युद्ध के करीब 75 दिन के बाद यह भंडार घट कर 690 अरब डॉलर हो गया है, लिहाजा प्रधानमंत्री ने उन खर्चों को कम करने की अपील की है, जिनमें डॉलर खर्च करने पड़ते हैं। करीब 80 फीसदी कच्चे तेल और 70 फीसदी से अधिक सोने का आयात डॉलर में ही किया जाता है।

डॉलर के मुकाबले भारतीय मुद्रा ‘रुपए’ में 95.28 तक की ऐतिहासिक गिरावट ने संकट को गहरा दिया है। इस समय ‘रुपया’ दुनिया की दूसरी सबसे कमजोर मुद्रा है, जिसमें 12 फीसदी अवमूल्यन हुआ है। कच्चा तेल महंगा मिलने के कारण भारत को हर रोज 1619 करोड़ रुपए अतिरिक्त खर्च करने पड़ रहे हैं। आयात बिल में खाद्य तेल पर 1.86 लाख करोड़ और खाद पर 1.38 लाख करोड़ रुपए खर्च करने पड़ते हैं। बाजार में यूरिया, डीएपी की कीमतें दोगुनी बढ़ा दी गई हैं। पूर्व मुख्य आर्थिक सलाहकार अरविंद सुब्रमण्यम ने चेतावनी दी है। भारत की आर्थिक चुनौती विदेशी मुद्रा संकट नहीं है।

इसके बजाय ‘किफायत और आजीविका का संकट’ है। अगर ईरान युद्ध लंबा खिंचता है तो यह और भी बदतर हो सकता है। उनके मुताबिक, हालात बेहतर होने से पहले और ज्यादा बिगड़ने की आशंका है। पीएम मोदी की लोगों से बचत करने की अपील का उन्होंने समर्थन किया है। दिग्गज अर्थशास्त्री ने कहा कि मौजूदा ऊर्जा संकट पहले से ही घरों और आजीविका पर दबाव डाल रहा है। दुनियाभर में ईंधन की बढ़ती कीमतों के कारण ऐसा हुआ है। उन्होंने कहा, ‘यह विदेशी मुद्रा का संकट नहीं है। हमारे पास 700 अरब डॉलर का रिजर्व है। ऐसा नहीं है कि हम चीजें खरीद नहीं सकते।

यह किफायत और आजीविका का संकट है क्योंकि कीमतें बढ़नी ही हैं। आजीविका पर इसका असर पड़ेगा।”सुब्रमण्यम ने कहा कि नीति निर्माताओं को विदेशी पूंजी आकर्षित करने पर कम और इस बात पर ज्यादा ध्यान देना चाहिए कि ऊर्जा की बढ़ती कीमतों का बोझ समाज के सभी वर्गों में कैसे साझा किया जाए। उन्होंने कहा, ‘चुनौती यह है कि इस संकट का बोझ समाज के सभी वर्गों में निष्पक्ष और समान रूप से कैसे साझा किया जाए। ईंधन, गैस और खाद की बढ़ती कीमतें गरीब परिवारों और किसानों को नुक्सान पहुंचाएंगी, जब तक कि सरकार इस असर को कम करने के लिए कोई कदम न उठाए।’ निजी निवेश अभी भी कमजोर क्यों है? कोटक महिंद्रा बैंक के संस्थापक उदय कोटक ने चेतावनी दी है कि लोगों को ‘बेहद खराब परिस्थितियों’ के लिए तैयार रहना चाहिए। हालांकि सिर्फ़ भारत ही ऐसा नहीं कर रहा।

युद्ध शुरू होने के बाद कई देशों ने अपने उपभोक्ताओं और अर्थव्यवस्था पर असर कम करने के लिए कई कदम उठाए। चीन ने अपनी तेल रिफ़ाइनरियों को अस्थायी रूप से ईंधन निर्यात रोकने का आदेश दिया। ऑस्ट्रेलिया के कुछ राज्यों ने लोगों को गाड़ी कम चलाने के मक़सद से पब्लिक ट्रांसपोर्ट को बढ़ावा दिया। फिलिपींस ने मार्च में राष्ट्रीय इमरजेंसी घोषित की। श्रीलंका ने भी ईंधन राशनिंग लागू की है। अगर भारत निवेश के लिए इतनी अच्छी जगह है और जैसा कि दावा किया जा रहा है, हम 7.5-8 प्रतिशत की दर से बढ़ रहे हैं तो फिर लोग निवेश क्यों नहीं कर रहे हैं?’ भारत एक मजबूत ग्रोथ का अनुमान लगा रहा है, जबकि प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एडीआई) और निजी निवेश अभी भी सुस्त पड़े हैं।

उन्होंने निजी निवेश को फिर से बढ़ाने और निर्यात में प्रतिस्पर्धा को बेहतर बनाने के लिए मिशन मोड पर काम करने की अपील की। हमें उन राज्यों से सीख लेनी चाहिए जो निजी निवेश आकर्षित करने में कामयाब रहे हैं। दक्षिण भारत के राज्यों ने चीन से काफी निवेश आकर्षित किया है। हमें यह भी देखना होगा कि उन्होंने निवेश आ​कर्षित करने के लिए क्या नी​ितयां अपनाई हैं। कृषि को लेकर भी चिंता बनी हुई है। तापमान बहुत ज्यादा है, अल नीनो का असर कम से कम सर्दियों के मौसम में तो जरूर पड़ सकता है। इसलिए हमें निश्चित रूप से इस बात के लिए भी तैयार रहना चाहिए कि हालात और ज्यादा बिगड़ सकते हैं।

आर्थिक आपातकाल के आसार हैं और भारत सरकार भविष्य में कुछ आैर कड़े व बड़े फैसले ले सकती है। कुछ पाबंदियां भी चस्पा की जा सकती हैं? इस संकट की घड़ी में जनता को भी संयम से काम लेना होगा और किफायत को प्राथमिकता देनी होगी।

Aditya Chopra

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