कभी सियासी व चुनावी रणनीतियां बुनने के उस्ताद बाजीगर रह चुके प्रशांत किशोर के सितारे वाकई इन दिनों गर्दिश में हैं। अपनी सियासी प्रासंगिकता को मौजूं बनाए रखने के लिए पिछले काफी समय से वे खूब कदमताल कर रहे हैं। जब ममता चुनाव हार गई तो उन्होंने फिर पीके के खिलाफ अखिलेश के कान भर दिए और फिर यूपी उनके लिए एक दूर की कौड़ी हो गया। उन्होंने कांग्रेस नेता राहुल गांधी से मिलने के लिए भी खूब हाथ-पैर मारे, आखिरकार प्रियंका गांधी से वे मिल भी आए, पर इन दिनों कांग्रेसी राजनीति में प्रियंका की भूमिका भी किंचित संक्षिप्त है, सो कांग्रेस के घर भी जब पीके की दाल नहीं गली तो वे सीधे हैदराबाद पहुंच गए टीआरएस के चंद्रशेखर राव से मिलने, पर राव को भी पीके का प्रस्ताव रास नहीं आया।
सूत्र बताते हैं कि राव ने भी पीके से दो टूक कह दिया ‘आपके साथ काम करना हमारे लिए मुश्किल होगा, क्योंकि आपकी विश्वसनीयता संदिग्ध है।’ अब पीके अपनी खोई हुई राजनैतिक अस्मिता हासिल करने के लिए बांकीपुर विधानसभा के उपचुनाव में अपनी किस्मत आजमाना चाहते हैं। सनद रहे कि यह सीट भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन के इस्तीफे से खाली हुई है। यह एक कायस्थों के दबदबे वाली सीट है, यहां एक लाख के आसपास कायस्थ वोटर हैं, सो यह भाजपा की एक परंपरागत मजबूत सीट में शुमार होती है। यहां अगड़े वोटर भी काफी तादाद में हैं, पीके का भरोसा है कि भरत तिवारी एनकाऊंटर मामले के बाद अगड़े उनके पक्ष में एकजुट हो जाएंगे।
कहा जाता है कि पीके ने अंदरखाने से राहुल और तेजस्वी दोनों से संपर्क साध कर उनसे यह अनुरोध किया है कि ‘यहां से राजद व कांग्रेस अपना प्रत्याशी न देकर चुनाव में उनका समर्थन कर दें ताकि भाजपा को संयुक्त विपक्ष की ताकत का अहसास कराया जा सके।’ सूत्रों की मानें तो राहुल तो इस प्रस्ताव पर राजी हो गए हैं, पर तेजस्वी तैयार नहीं हो रहे हैं, तेजस्वी का दर्द है कि ‘पीके ने उन्हें हमेशा अपने निशाने पर लिया है।’ राहुल अब भी तेजस्वी को पीके की खातिर मनाने में लगे हैं ताकि इस सीट पर बिखरे विपक्ष का सूपड़ा न साफ हो जाए।
किस गुप्त रणनीति पर काम कर रहे हैं राहुल
राहुल गांधी जमीन पर एक साथ कई प्रयोग करने की कोिशश कर रहे हैं। राहुल से जुड़े भरोसेमंद सूत्र बताते हैं कि राहुल भाजपा व संघ को उन्हीं की शैली में जवाब देने के लिए एक नई रणनीति पर काम कर रहे हैं। राहुल ने अभी अपने साथ सलाहकारों की एक नई टीम जोड़ी है, इनमें से कई विदेश में पढ़े-लिखे हैं। इनमें से ज्यादातर युवा प्रोफेशनल हैं। कहते हैं राहुल इस िनष्कर्ष पर पहुंचे हैं कि ‘भाजपा को इतना आगे लाने में संघ की एक अहम भूमिका रही है, जिसने भारतीय संस्कृति व राष्ट्रवाद का आलंबन लेकर भारतीय जनमानस के दिलो-दिमाग पर कब्जा किया है’, अब राहुल की नई टीम भी युवा और ‘भारत’ से अपना नाता पुख्ता करने में जुटी है। बहुत जल्द राहुल एक ‘युवा रोजगार यात्रा’ निकालने वाले हैं, ताकि बेरोजगारी व महंगाई जैसे सामयिक मुद्दों को उठा कर नई पीढ़ी को कांग्रेस के साथ जोड़ा जा सके। शायद यह कांग्रेस के इतिहास में पहली बार हो रहा है जब कांग्रेस शीर्ष अपने 700 जिला अध्यक्षों से सीधा संवाद स्थापित करेगा, ताकि पार्टी कैडर को जमीनी स्तर पर मजबूती दी जा सके।
राहुल पुराने क्षत्रपों को किनारे कर पार्टी में नया नेतृत्व उभारना चाहते हैं। धीरे-धीरे पार्टी के मठाधीश बन गए नेताओं को किनारे लगा दिया जाएगा, राहुल का खास ध्यान दक्षिण के राज्यों पर केंद्रित है, वे वहां कांग्रेस की वापसी के लिए नई योजनाओं पर काम कर रहे हैं। इसके अलावा ईवीएम और वोट चोरी के शोर में राहुल ने देश के 5 चुनींदा लोकसभा सीट पर अपना ‘वोट रक्षक अभियान’ का पायलट प्रोजेक्ट चला रखा है, अगर एक बार यह पायलट सफल रहा तो 2029 के आम चुनाव से पहले इस ‘वोट रक्षक अभियान’ को और व्यापक रूप देने की तैयारी है, इसके बहाने वे अपने प्रशिक्षित स्वयंसेवकों का एक देशव्यापी नेटवर्क भी तैयार करना चाहते हैं। जिन राज्यों में आने वाले कुछ महीनों में चुनाव होने हैं, मसलन गुजरात, गोवा, पंजाब, उत्तराखंड, यूपी राहुल इन राज्यों के ज्यादा से ज्यादा दौरे करेंगे। राजस्थान जैसे राज्य से इस बात की शुरूआत हो सकती है कि पार्टी नेतृत्व कैसे युवा हाथों में सौंपा जाए, वहां सचिन पायलट को इसके लिए तैयार रहने को कहा गया है। राहुल की सोच है कि ‘अब विपक्षी एकता की मजबूती में वे गाहे-बगाहे विपक्ष के दबाव में नहीं आएंगे, उनके पीछे-पीछे नहीं चलेंगे, बल्कि विपक्ष को कांग्रेस के पीछे आने को मजबूर करेंगे।’
कैप्टन पर फिर से भगवा मेहरबानी
जब से कांग्रेस का पंजाब में हुए जमीनी सर्वे के नतीजे सामने आए हैं, भाजपा और आप जैसे दल भी अपनी रणनीति बदलने पर मजबूर हो गए हैं। यह सर्वे रिपोर्ट अभी अजय माकन ने राहुल गांधी को सौंपी है जिसमें कहा गया है कि ‘कांग्रेस अगर पंजाब में सिर्फ जट सिख व दलित मतदाताओं को साध ले तो आने वाले इस विधानसभा चुनाव में उसकी जीत की संभावनाएं बेहतर हो जाएंगी।’ रिपोर्ट आते ही अमरिंदर सिंह वारिंग को प्रदेश अध्यक्ष बनाए रखा गया है, पहले उन्हें बदले जाने की तैयारी थी। नाराज़ चल रहे पूर्व मुख्यमंत्री व दलित नेता चरणजीत सिंह चन्नी को चुनाव अभियान समिति का प्रमुख बना दिया गया है। प्रताप सिंह बाजवा को विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष बनाए रखा गया है।
साथ ही प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर की घर वापसी की तैयारियां भी शुरू हो गई थीं। जैसे ही इस बात की भनक दिल्ली के भगवा दरबार को लगी कैप्टन को फौरन दिल्ली तलब किया गया और पार्टी चाणक्य से उनकी एक अहम मुलाकात भी आहूत हो गई। कैप्टन को पहले राज्यसभा देने का प्रस्ताव हुआ पर कहते हैं कैप्टन ने इसके लिए मना कर दिया। इसके बाद कैप्टन की मांग के अनुरूप उन्हें हिमाचल या हरियाणा का गवर्नर बनाए जाने पर विचार हो रहा है। हिमाचल इसीलिए कि वहां कैप्टन की खूब जमीनें हैं और हरियाणा इसीलिए कि इसका राजभवन तो चंडीगढ़ में ही है जो कैप्टन के मुफीद है।
रूठे-रूठे हैं ब्राह्मण, मनाएं कैसे
क्या यूपी का ब्राह्मण समाज अपने पसंदीदा राजनैतिक दल व भाजपा से इन दिनों खार खाए बैठा है? नहीं तो क्या वज़ह है कि राग पीडीए गाने में सिद्दहस्त अखिलेश इन दिनों ब्राह्मण समाज को खुश करने का कोई भी मौका हाथ से नहीं जाने देना चाहते। सूत्र बताते हैं कि आने वाले यूपी चुनाव में अखिलेश बड़ी संख्या में ब्राह्मण उम्मीदवारों को साइकिल की सवारी करा सकते हैं, अखिलेश जनेश्वर मिश्रा की जयंती पर प्रदेश में एक बड़ा प्रोग्राम करने की तैयारी कर रहे हैं। जैसा कि यूपी भाजपा के एक ब्राह्मण नेता फराखदिली से स्वीकार करते हैं कि ‘भाजपा का साथ देते रहना हमारे समाज की मजबूरी नहीं है, पहले मंदिरों के जीर्णोद्धार का एक बड़ा मुद्दा था, पर अब तो यह मुद्दा भी गौण हो गया है।’ हालांकि केंद्र में जितिन प्रसाद और राज्य सरकार में मनोज पांडेय को जरूर मंत्री बनाया गया है, पर ब्राह्मण समाज इस कदम को नाकाफी मानता है। कहते हैं फिलवक्त ब्राह्मणों ने अपने मुंह पूरी तरह सिल रखे हैं, वक्त आने पर या नवंबर-दिसंबर तक ये कोई बड़ा फैसला ले सकते हैं। वैसे भी यूपी में भाजपा के अलावा सपा, बसपा व कांग्रेस जैसे दलों के पास भी कोई बड़ा ब्राह्मण चेहरा नहीं। इन दलों ने जो भी ब्राह्मण नेता तैयार किए हैं उनका प्रभाव अपने-अपने निर्वाचन क्षेत्रों तक ही सीमित हैं। बसपा में एक सतीश चंद्र मिश्रा जरूर थे जिन्होंने ब्राह्मणों को बहिन जी के साथ जोड़ने में एक महती भूमिका निभाई थी। अब वे भी अपने गिरते स्वास्थ्य की वज़ह से इतने एक्टिव नहीं। चुनांचे ब्राह्मण समाज को भी यह फैसला लेने में मुश्किल हो सकती है कि ‘वे भगवा दामन छोड़ भी दें तो फिर जाएं कहां?’
…और अंत में
अभी पिछले दिनों भाजपा अध्यक्ष नितिन नबीन भाजपा चाणक्य अमित शाह से मिलने पहुंचे और उनके साथ कोई तीन घंटे तक विचार-विमर्श करते रहे। सूत्रों की मानें तो भाजपा अध्यक्ष अपनी नई टीम की रूप रेखा के अनुमोदन के लिए वहां पहुंचे थे, जहां कई नामों पर विस्तार से चर्चा हुई और इस ‘टीम नबीन’ को अंतिम रूप दे दिया गया। आने वाले दिनों में कभी भी अध्यक्ष जी अपनी नई टीम की घोषणा कर सकते हैं।
बांकीपुर पर क्यों है पीके की नज़रें?
Summary :
कभी सियासी व चुनावी रणनीतियां बुनने के उस्ताद बाजीगर रह चुके प्रशांत किशोर के सितारे वाकई इन दिनों गर्दिश में हैं। अपनी सियासी प्रासंगिकता को मौजूं बनाए रखने के लिए पिछले काफी समय से वे खूब कदमताल कर रहे हैं। जब ममता चुनाव हार गई तो उन्होंने फिर पीके के खिलाफ अखिलेश के कान भर दिए और फिर यूपी उनके लिए एक दूर की कौड़ी हो गया। उन्होंने कांग्रेस नेता राहुल गांधी से मिलने के लिए भी खूब हाथ-पैर मारे, आखिरकार प्रियंका गांधी से वे मिल भी आए, पर इन दिनों कांग्रेसी राजनीति में प्रियंका की भूमिका भी किंचित संक्षिप्त…


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