कामिका एकादशी व्रत कथा (Kamika Ekadashi Vrat Katha)

पौराणिक कथा के अनुसार, एक गांव में एक बलवान क्षत्रिय रहता था। उसे बहुत जल्दी गुस्सा आ जाता था। एक दिन किसी बात पर उसकी एक ब्राह्मण से बहस हो गई। झगड़ा इतना बढ़ गया कि लड़ाई के दौरान ब्राह्मण की मौत हो गई। इस घटना के बाद क्षत्रिय को अपनी गलती का बहुत पछतावा हुआ और उसे ब्रह्महत्या के पाप का डर सताने लगा। वह ब्राह्मण के अंतिम संस्कार में शामिल होकर अपना पाप धोना चाहता था, लेकिन वहां मौजूद बाकी ब्राह्मणों ने उसे रोक दिया। उन्होंने कहा कि पहले उसे अपने पाप का प्रायश्चित करना होगा। क्षत्रिय ने उनसे पाप से छुटकारा पाने का रास्ता पूछा।
ब्राह्मणों ने उसे बताया कि सावन महीने के कृष्ण पक्ष की एकादशी को भगवान विष्णु का सच्चे मन से व्रत और पूजन करना चाहिए। इसके साथ ही गरीब लोगों और ब्राह्मणों को अपनी क्षमता के हिसाब से दान देना चाहिए। उन्होंने उसे भगवान विष्णु की शरण में जाने और सच्चे दिल से माफी मांगने की सलाह दी। क्षत्रिय ने बताए गए नियमों के हिसाब से कामिका एकादशी का व्रत रखा। उसने भगवान विष्णु की नियम से पूजा की और पूरे मन से उनकी भक्ति की। पूजा में उसने तुलसी के पत्ते चढ़ाए और अपने अपराध के लिए सच्चे दिल से पछतावा किया।
कथा के अनुसार, उसकी सच्ची भक्ति और पछतावे से भगवान विष्णु खुश हो गए और उन्होंने उसे पाप से मुक्ति का वरदान दे दिया। इसके बाद उसके जीवन में अच्छे बदलाव आए और वह धर्म तथा अच्छाई के रास्ते पर चलने लगा। इसी वजह से कामिका एकादशी को पापों से छुटकारा दिलाने वाली और भगवान विष्णु की कृपा पाने वाली एकादशी के रूप में माना जाता है।


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