ब्रिगेडियर मोहम्मद उस्मान ने ठुकरा दिया था पाकिस्तान का प्रस्ताव, देश के लिए दिया बलिदान

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नई दिल्ली, 14 जुलाई (आईएएनएस)। ब्रिगेडियर मोहम्मद उस्मान भारतीय सेना के उन महान अधिकारियों में गिने जाते हैं, जिन्होंने देश की एकता और अखंडता की रक्षा के लिए कम उम्र में ही शहीद हो गए थे। 15 जुलाई को जन्मे मोहम्मद उस्मान को उनकी अदम्य वीरता के कारण “नौशेरा का शेर” कहा जाता है। 1947–48 के भारत-पाकिस्तान युद्ध में उनके नेतृत्व और साहस ने भारतीय सेना को महत्वपूर्ण सफलताएं दिलाईं। मरणोपरांत उन्हें भारत के दूसरे सर्वोच्च वीरता पुरस्कार महावीर चक्र से सम्मानित किया गया। मोहम्मद उस्मान का जन्म ब्रिटिश भारत में संयुक्त प्रांत के गांव बीबीपुर, मऊ जिले में 15…

नई दिल्ली, 14 जुलाई (आईएएनएस)। ब्रिगेडियर मोहम्मद उस्मान भारतीय सेना के उन महान अधिकारियों में गिने जाते हैं, जिन्होंने देश की एकता और अखंडता की रक्षा के लिए कम उम्र में ही शहीद हो गए थे। 15 जुलाई को जन्मे मोहम्मद उस्मान को उनकी अदम्य वीरता के कारण “नौशेरा का शेर” कहा जाता है। 1947–48 के भारत-पाकिस्तान युद्ध में उनके नेतृत्व और साहस ने भारतीय सेना को महत्वपूर्ण सफलताएं दिलाईं। मरणोपरांत उन्हें भारत के दूसरे सर्वोच्च वीरता पुरस्कार महावीर चक्र से सम्मानित किया गया।

मोहम्मद उस्मान का जन्म ब्रिटिश भारत में संयुक्त प्रांत के गांव बीबीपुर, मऊ जिले में 15 जुलाई 1912 को हुआ था। पिता पुलिस अफसर थे, तो उस्मान ने बचपन में ही सेना में शामिल होने के लिए अपना मन बना लिया था। भारतीयों के लिए कमीशन रैंक पाने के लिए सीमित अवसरों तथा कड़ी प्रतिस्पर्धा के बावजूद वह प्रतिष्ठित रॉयल मिलिट्री एकेडमी (आरएमएएस) में प्रवेश प्राप्त करने में सफल रहे।

मोहम्मद उस्मान 19 मार्च 1935 को भारतीय सेना में शामिल हुए और 10वीं बलूच रेंजिमेंट की 5वीं बटालियन में तैनाती दी गई। उस्मान को 30 अप्रैल 1936 को लेफ्टिनेंट और 31 अगस्त 1941 को बटालियन के कैप्टन के पद पर पदोन्नत कर दिया गया था। उन्होंने 1942 में कुछ महीनों के लिए बलूचिस्तान की राजधानी क्वेटा में स्थित भारतीय सेना का स्टाफ कॉलेज भी अटेंड किया। अप्रैल 1944 तक वो अस्थाई मेजर के पद पर सेवाएं दे रहे थे। इसके बाद अप्रैल 1945 से अप्रैल 1946 तक ब्रिगेडियर उस्मान ने 10वीं बलूच रेजिमेंट की 14वीं बटालियन की कमान संभाली।

1947 में देश के विभाजन के समय अनेक सैन्य अधिकारियों को भारत या पाकिस्तान में से किसी एक देश की सेना चुननी थी। ब्रिगेडियर मोहम्मद उस्मान को पाकिस्तान की सेना में उच्च पद और आकर्षक सुविधाओं का प्रस्ताव दिया गया, लेकिन उन्होंने उसे अस्वीकार कर भारत की सेवा को चुना। उनका यह निर्णय उनके राष्ट्रप्रेम और कर्तव्यनिष्ठा का सर्वोच्च प्रमाण था।

1947–48 के भारत-पाकिस्तान युद्ध के दौरान ब्रिगेडियर उस्मान ने जम्मू-कश्मीर के नौशेरा सेक्टर की रक्षा का नेतृत्व किया। पाकिस्तान-समर्थित कबायली और सैनिक लगातार इस क्षेत्र पर कब्ज़ा करने का प्रयास कर रहे थे, लेकिन ब्रिगेडियर उस्मान की प्रभावी रणनीति, साहस और नेतृत्व के कारण भारतीय सेना ने उनके सभी हमलों को विफल कर दिया। इस लड़ाई में करीब 2 हजार पाकिस्तानी सैनिक शहीद हुए, लेकिन भारत के केवल 33 जवान शहीद और 102 जवान घायल हुए। इस विजय ने युद्ध की दिशा बदलने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। मोहम्मद उस्मान की वीरता से प्रभावित होकर उन्हें “नौशेरा का शेर” की उपाधि दी गई।

नौशेरा की लड़ाई के दौरान पाकिस्तानी सेना ने ब्रिगेडियर उस्मान का सिर काटकर लाने वाले को 50 हजार रुपये का इनाम देने का ऐलान किया था। वहीं, ब्रिगेडियर उस्मान ने कसम खाई थी कि जब तक झांगर को पाकिस्तान के कब्जे से नहीं छुड़ा लेते, वो चैन से नही बैठेंगे.

3 जुलाई 1948 को जम्मू-कश्मीर में मोर्चे पर रहते हुए दुश्मन की गोलाबारी में ब्रिगेडियर मोहम्मद उस्मान वीरगति को प्राप्त हुए। वे स्वतंत्र भारत के सबसे वरिष्ठ सैन्य अधिकारियों में से एक थे जिन्होंने युद्धभूमि में अपने प्राण न्यौछावर किए। उनकी शहादत ने पूरे देश को भावुक कर दिया और उन्हें राष्ट्रीय वीर के रूप में सम्मान मिला।

–आईएएनएस

ओपी/पीएम

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