चमोली, 4 जून (आईएएनएस)। उत्तराखंड पुलिस-प्रशासन बद्रीनाथ धाम आने वाले तीर्थयात्रियों की सेवा पूरी लगन, समर्पण और जनसेवा की प्रबल भावना के साथ लगातार कर रहा है। इस पवित्र तीर्थस्थल पर पहुंचने वाले श्रद्धालुओं ने पुलिसकर्मियों की कुशल व्यवस्थाओं, सुरक्षा उपायों और सहायता की सराहना की है, जिससे उनकी तीर्थयात्रा का अनुभव सुगम और आरामदायक बन सका है।
‘सेवा, सुरक्षा और सुविधा’ के आदर्श वाक्य से प्रेरित होकर पुलिसकर्मी तीर्थयात्रियों को सुरक्षित, व्यवस्थित और बिना किसी परेशानी के ‘दर्शन’ का अनुभव प्रदान करने के लिए अथक प्रयास कर रहे हैं। अधिकारियों ने हर परिस्थिति में भक्तों की सहायता करने और यह सुनिश्चित करने की अपनी प्रतिबद्धता दोहराई है कि उनकी आध्यात्मिक यात्रा सुखद और यादगार बनी रहे।
कई तीर्थयात्रियों ने मंदिर में की गई व्यवस्थाओं की सराहना की।
दुबई से आए एक भक्त ने कहा, “हम यहां दुबई से आए हैं और यहां की व्यवस्थाएं बहुत ही बेहतरीन हैं। सुरक्षा के उपाय और कतार प्रबंधन बहुत ही व्यवस्थित ढंग से किए गए हैं। हर चीज का प्रबंधन बहुत ही सुचारू रूप से हो रहा है। हम पुलिसकर्मियों के प्रयासों की सचमुच सराहना करते हैं, जो सभी को सुरक्षित रखने के लिए कड़ी मेहनत कर रहे हैं। यह एक अद्भुत अनुभव रहा है। पूरे भारत और दुनिया भर के लोगों को बद्रीनाथ अवश्य आना चाहिए।”
मध्य प्रदेश से आए एक अन्य तीर्थयात्री ने कहा, “हम भगवान बद्रीनाथ के ‘दर्शन’ के लिए आए हैं और यहां की व्यवस्थाएँ बहुत अच्छी हैं। हर चीज बहुत ही व्यवस्थित है। हम उत्तराखंड प्रशासन को भक्तों के लिए एक आरामदायक अनुभव सुनिश्चित करने हेतु धन्यवाद देना चाहेंगे।”
एक तीसरे श्रद्धालु ने अपना अनुभव साझा करते हुए कहा कि यात्रा के दौरान मेरी पत्नी बीमार पड़ गई थी, लेकिन सुरक्षाकर्मियों ने तुरंत मदद और सहयोग दिया। हम यहाँ दी जा रही सुविधाओं और सहायता से बहुत संतुष्ट हैं।
इस बीच, चार धाम यात्रा में तीर्थयात्रियों की आमद में अभूतपूर्व वृद्धि देखी जा रही है। भगवान बद्रीनाथ की तीर्थयात्रा ने इस साल नए रिकॉर्ड बनाए हैं। मंदिर खुलने के महज 40 दिनों के भीतर ही श्रद्धालुओं की संख्या आठ लाख का आंकड़ा पार कर गई है।
बढ़ती भीड़ को देखते हुए श्री बद्रीनाथ-केदारनाथ मंदिर समिति ने प्रोटोकॉल और वीआईपी ‘दर्शन’ के लिए एक योगदान-आधारित प्रणाली शुरू की है। इस प्रक्रिया को सुव्यवस्थित करने और मंदिर परिसर के पास होने वाली बाधाओं को कम करने के लिए, स्थानीय पुलिस थाने के पास स्थित नीलकंठ रेस्ट हाउस में एक विशेष वीआईपी कार्यालय स्थापित किया गया है। प्रोटोकॉल ‘दर्शन’ के इच्छुक आगंतुकों को मंदिर में प्रवेश करने से पहले एक पास प्राप्त करना अनिवार्य होगा।
मंदिर समिति के अनुसार, यह पहल आम तीर्थयात्रियों को होने वाली असुविधा को कम करने के साथ-साथ यह सुनिश्चित करने के लिए शुरू की गई है कि गणमान्य व्यक्तियों की यात्रा सुरक्षित, व्यवस्थित और समय-बद्ध रहे। यह निर्णय स्थानीय स्तर पर प्राप्त सुझावों के आधार पर लिया गया है और इसे श्री बद्रीनाथ-केदारनाथ मंदिर समिति की मौजूदा मानक संचालन प्रक्रिया (एसओपी) के तहत लागू किया गया है।
संशोधित व्यवस्था के तहत, राज्य सरकार से मिली लिखित सिफारिशों के आधार पर जिला प्रशासन और मंदिर समिति द्वारा प्रोटोकॉल स्लिप जारी की जाएगी। प्रोटोकॉल ‘दर्शन’ के लिए प्रति व्यक्ति 1,100 रुपए का योगदान लिया जाएगा और मंदिर समिति द्वारा एक आधिकारिक रसीद जारी की जाएगी।
उत्तराखंड के चमोली जिले में स्थित बद्रीनाथ मंदिर, जिसे बद्रीनारायण मंदिर या बद्री विशाल के नाम से भी जाना जाता है, हिंदू धर्म के सबसे पवित्र तीर्थ स्थलों में से एक है। अलकनंदा नदी के तट पर भव्य हिमालय की गोद में स्थित यह मंदिर हर साल लाखों श्रद्धालुओं को अपनी ओर आकर्षित करता है। यह मंदिर मई से नवंबर तक तीर्थयात्रियों के लिए खुला रहता है।
बद्रीनाथ धाम का धार्मिक महत्व बहुत अधिक है। यह चार पवित्र ‘चार धाम’ तीर्थ स्थलों में से एक है और भगवान विष्णु के अनुयायियों द्वारा पूजे जाने वाले 108 ‘दिव्य देशमों’ में भी गिना जाता है। माना जाता है कि इस मंदिर की पुनः स्थापना 9वीं शताब्दी में दार्शनिक और संत आदि शंकराचार्य द्वारा की गई थी।
इस मंदिर में भगवान विष्णु की एक मीटर ऊंची, काले पत्थर से बनी मूर्ति स्थापित है, जिसे आठ ‘स्वयं व्यक्त क्षेत्रों’ (यानी स्वयं प्रकट हुए तीर्थ स्थलों) में से एक माना जाता है। इसकी रंग-बिरंगी वास्तुकला, आध्यात्मिक वातावरण और सुरम्य परिवेश इसकी भव्यता को और भी बढ़ा देते हैं। पास में ही स्थित ‘तप्त कुंड’, एक प्राकृतिक गर्म पानी का झरना, जिसके बारे में माना जाता है कि इसमें रोगों को ठीक करने के गुण हैं, तीर्थयात्रियों के लिए एक और प्रमुख आकर्षण है।
जून और सितंबर के बीच यात्रा की योजना बनाने वाले पर्यटक यहां ‘बद्री-केदार उत्सव’ और ‘माता मूर्ति का मेला’ जैसे सांस्कृतिक और धार्मिक कार्यक्रमों को भी देख सकते हैं। ये आयोजन हिमालय के इस पवित्र तीर्थ स्थल के आध्यात्मिक महत्व को और भी अधिक बढ़ा देते हैं।
–आईएएनएस
पीएसके
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