Karnataka Bandh on 13th August : कावेरी नदी के पानी के बंटवारे को लेकर जारी पुरानी खींचतान और मेकेदातु समेत अन्य जल परियोजनाओं को तुरंत लागू करने की मांग पर कन्नड़ समर्थक संगठनों ने 13 अगस्त को राज्यव्यापी बंद का आह्वान किया है।
सुबह 6 बजे से शाम 6 बजे तक चलने वाले इस 12 घंटे के बंद की अगुवाई वरिष्ठ कन्नड़ एक्टिविस्ट वातल नागराज कर रहे हैं। दावों के मुताबिक, करीब 2,000 से अधिक स्थानीय संगठनों ने इस प्रदर्शन को अपना समर्थन दिया है। हालांकि, बंद का प्रभाव पूरे राज्य में एक समान रहने की उम्मीद कम है और रोजाना की आवश्यक सेवाओं पर ज्यादा असर नहीं पड़ेगा।
क्या चालू रहेगा और कहां आ सकती है परेशानी
सार्वजनिक परिवहन और रोजमर्रा के कामकाज को लेकर लोगों के मन में कई सवाल हैं। स्थानीय प्रशासन और संघों से मिली जानकारी के मुताबिक सेवाओं की स्थिति कुछ इस प्रकार रहेगी:
स्कूल और कॉलेज: शिक्षा विभाग की तरफ से पूरे राज्य में आधिकारिक छुट्टी का सामूहिक आदेश जारी नहीं हुआ है। स्थानीय स्थिति और सुरक्षा को देखते हुए जिला कलेक्टर अपने स्तर पर निर्णय लेंगे।
बस और मेट्रो सर्विस: बीएमटीसी और केएसआरटीसी की सरकारी बसें सड़कों पर उतारने की तैयारी है। नम्मा मेट्रो का परिचालन भी शेड्यूल के हिसाब से चलेगा, लेकिन विरोध प्रदर्शन के हिसाब से रूट में बदलाव हो सकता है।
कैब और ऑटो ऑटोमेशन: निजी ऑटो और कैब चालकों का रुख मिला-जुला है। बेंगलुरु जैसे बड़े शहरों में ऐप-बेस्ड राइड्स मिलने में थोड़ी देरी का सामना करना पड़ सकता है।
अस्पताल और इमरजेंसी: मेडिकल स्टोर, अस्पताल, दूध की सप्लाई, एम्बुलेंस और फायर ब्रिगेड जैसी जरूरी सेवाओं को बंद से पूरी तरह बाहर रखा गया है।
बैंक और ऑफिस: सभी सरकारी कार्यालय, आईटी कंपनियां और निजी बैंक सामान्य कार्यदिवस की तरह चालू रहेंगे।
140 साल पुराना है कावेरी जल विवाद का इतिहास

प्रदर्शनकारियों की मुख्य मांग केवल कावेरी का पानी रोकना नहीं है, बल्कि लंबित सिंचाई परियोजनाओं में तेजी लाना है। कन्नड़ संगठनों का कहना है कि राज्य सरकार को मेकेदातु, महादायी और कलासा-बंदूरी परियोजनाओं पर काम तुरंत शुरू करना चाहिए। मेकेदातु परियोजना का लक्ष्य बेंगलुरु और आसपास के इलाकों में पीने के पानी की किल्लत को हमेशा के लिए दूर करना है।
कावेरी नदी के पानी का विवाद दशकों पुराना और बेहद संवेदनशील मुद्दा है।
ब्रिटिश काल से शुरुआत: यह विवाद 1892 में तत्कालीन मद्रास प्रेसीडेंसी और मैसूर रियासत के बीच हस्ताक्षरित दस्तावेजों से शुरू हुआ था। इसके बाद 1924 में 50 साल के लिए एक नया समझौता किया गया, जो 1974 में समाप्त हुआ।
1974 के बाद बढ़ा टकराव: पुराना समझौता खत्म होते ही कर्नाटक ने इसे अनुचित करार दिया। कर्नाटक की दलील थी कि बेंगलुरु शहर के फैलाव और कृषि विस्तार के कारण उसे अधिक पानी चाहिए, जबकि तमिलनाडु ने अपने किसानों के अधिकारों का हवाला देकर विरोध किया।
ट्रिब्यूनल और सुप्रीम कोर्ट के फैसले: विवाद सुलझाने के लिए 1990 में ‘कावेरी जल विवाद न्यायाधिकरण’ (CWDT) बना। ट्रिब्यूनल ने 2007 में दोनों राज्यों का कोटा तय किया। बाद में मामला सुप्रीम कोर्ट गया, जहां 2018 में अंतिम फैसला सुनाते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कावेरी जल प्रबंधन प्राधिकरण (CWMA) का गठन किया।
कमजोर मानसून और नया संकट: हर साल मानसून कमजोर पड़ते ही विवाद फिर सतह पर आ जाता है। बारिश कम होने पर जब केंद्र या रेगुलेटरी कमेटी तमिलनाडु को पानी छोड़ने का निर्देश देती है, तो कर्नाटक में विरोध शुरू हो जाता है। 13 अगस्त को बुलाया गया यह बंद इसी लंबे चले आ रहे तनाव की ताजा कड़ी है।
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