दिल्ली में विरोध प्रदर्शनों पर सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी, कहा, ‘पब्लिक प्लेसेज पर स्थाई कब्जा नहीं हो सकता’

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सुनवाई के दौरान सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने पक्ष रखते हुए कहा कि जंतर-मंतर कोई प्रॉपर प्रोटेस्ट साइट नहीं, बल्कि एक सार्वजनिक सड़क है। उन्होंने अदालत को बताया कि प्रदर्शन की अनुमति महज एक दिन की थी, लेकिन प्रदर्शनकारी बिना अनुमति के वहां 17 दिनों तक जमे रहे.

Supreme Court

Supreme Court : मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ दिल्ली में हुए विरोध प्रदर्शनों और पुलिस कार्रवाई के मामले में सुप्रीम कोर्ट में सोमवार को अहम सुनवाई हुई। सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में साफ कहा कि कोई भी व्यक्ति या संगठन किसी पब्लिक प्लेस पर स्थाई रूप से कब्जा नहीं जमा सकता।

चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने कहा कि किसानों और पत्रकारों समेत हर नागरिक को शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन करने का पूरा अधिकार है, लेकिन इसके लिए एक समय सीमा होनी चाहिए। केवल इसलिए कि किसी का प्रदर्शन चल रहा है, कोई समूह दूसरों की आवाजाही को रोक नहीं कर सकता। कोर्ट में प्रदर्शन के दौरान हुई पुलिस कार्रवाई, हिरासत और व्यापार पर पड़े असर को लेकर तीखी बहस देखने को मिली।

सॉलिसिटर जनरल की दलील

सुनवाई के दौरान सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने पक्ष रखते हुए कहा कि जंतर-मंतर कोई प्रॉपर प्रोटेस्ट साइट नहीं, बल्कि एक सार्वजनिक सड़क है। उन्होंने अदालत को बताया कि प्रदर्शन की अनुमति महज एक दिन की थी, लेकिन प्रदर्शनकारी बिना अनुमति के वहां 17 दिनों तक जमे रहे और संसद की तरफ मार्च करने की कोशिश की।

व्यापारियों की तरफ से पेश वरिष्ठ वकील मुकुल रोहतगी ने कहा कि कनॉट प्लेस और आसपास के इलाकों में करीब 50 लाख लोग प्रभावित हैं। लंबे समय तक चले धरने और रास्तों के बंद होने से त्योहारों के सीजन में कारोबार ठप हो गया है और दुकानें बंद रखने को मजबूर होना पड़ रहा है। उन्होंने कोर्ट से अगले दो महीने तक धरना-प्रदर्शनों पर रोक लगाने की मांग की।

गिरफ्तारी, निजता और सीसीटीवी कैमरे पर बहस

याचिकाकर्ताओं की ओर से वकील मेनका गुरुस्वामी ने दावा किया कि प्रदर्शन के दौरान करीब 7,000 लोगों को हिरासत में लिया गया। हालांकि, सॉलिसिटर जनरल ने इन दावों का खंडन करते हुए कहा कि लोगों को गिरफ्तार नहीं किया गया था, बल्कि सिर्फ प्रदर्शन स्थल से हटाया गया था।

वहीं, वकील प्रशांत भूषण ने प्रदर्शन स्थलों पर निगरानी और सीसीटीवी कैमरों के कानूनी आधार पर सवाल उठाए। इस पर एसजी तुषार मेहता ने कहा कि सार्वजनिक स्थान पर किसी व्यक्ति को निजता का पूर्ण अधिकार नहीं मिल सकता, क्योंकि सुरक्षा और अप्रिय घटनाओं को रोकने के लिए राज्य का ऐसा करना वैध हित है। जस्टिस जॉयमाल्या बागची ने भी टिप्पणी की कि सार्वजनिक जगह पर कैमरे में चेहरा आना अपने आप में प्राइवेसी का उल्लंघन नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में सभी संबंधित संगठनों को पक्षकार बनाने का निर्देश देते हुए सुनवाई आगे बढ़ा दी है।

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Rohit Singh

रोहित सिंह पिछले 5 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय हैं। राजनीति, समाज, अंतर्राष्ट्रीय, अपराध और शैक्षणिक लेख लिखने में दिलचस्पी रखते हैं। दिल्ली विश्वविद्यालय से पोलिटिकल साइंस में ग्रेजुएशन और जामिया मिलिया इस्लामिया से पत्रकारिता की पढ़ाई पूरी की है। वर्तमान में पंजाब केसरी दिल्ली में हिन्दी सब-एडिटर के तौर पर काम कर रहे हैं।