अब बेनाम नहीं रहेंगी गांव की सड़कें, मिलेगा यूनिक कोड और नाम

Summary :

Village Road : अभी तक भले ही गांवो के भीतर की सड़कें गुमनाम थीं और उनकी कोई पहचान नहीं होती थी, लेकिन अब ये हालात जल्द ही बदलने वाले हैं। केंद्र सरकार गांवों के भीतर की हर सड़क का नामकरण, वर्गीकरण और डिजिटल कोडिंग करने के लिए एक राष्ट्रव्यापी प्रणाली का प्रस्ताव लेकर आ रही है, जिससे देश का पहला व्यापक ग्रामीण सड़कों का बड़ा डेटाबेस तैयार होगा। इस प्रस्तावित ‘इंट्रा-विलेज रोड कोडिंग एंड ग्रेडिंग सिस्टम’ का मसौदा जल्द ही सार्वजनिक सुझावों के लिए जारी किया जाएगा। इस पूरी कवायद का उद्देश्य गांवों की सभी आंतरिक सड़कों के नामकरण, कोडिंग…

Village Road : अभी तक भले ही गांवो के भीतर की सड़कें गुमनाम थीं और उनकी कोई पहचान नहीं होती थी, लेकिन अब ये हालात जल्द ही बदलने वाले हैं। केंद्र सरकार गांवों के भीतर की हर सड़क का नामकरण, वर्गीकरण और डिजिटल कोडिंग करने के लिए एक राष्ट्रव्यापी प्रणाली का प्रस्ताव लेकर आ रही है, जिससे देश का पहला व्यापक ग्रामीण सड़कों का बड़ा डेटाबेस तैयार होगा।

इस प्रस्तावित ‘इंट्रा-विलेज रोड कोडिंग एंड ग्रेडिंग सिस्टम’ का मसौदा जल्द ही सार्वजनिक सुझावों के लिए जारी किया जाएगा। इस पूरी कवायद का उद्देश्य गांवों की सभी आंतरिक सड़कों के नामकरण, कोडिंग और डिजिटल मानचित्रण के लिए एक ढांचा तैयार करना है।

खास बात ये है कि सरकार की तरफ से तैयार किए गए इस प्रस्ताव में पहले से ही चल रही स्वामित्व और डीजीपिन योजना को एक साथ लाया गया है। इसके जरिए भारत के करीब छह लाख गांवों के लिए सड़कों का डेटाबेस तैयार किया जाएगा। पंचायती राज मंत्रालय के अधिकारियों के अनुसार, अभी तक गांवों में ऐसी कोई सुविधा नहीं है, जिसके चलते एंबूलेंस व दूसरे आपातकालीन वाहनों को गांवों के भीतर जाने में दिक्कतों का सामना करना पड़ता है।

अधिकारियों का दावा है कि गांवों के भीतर की सड़कों के नामकरण व उनकी कोडिंग के बाद सड़क से जुड़ी हर जानकारी मिल जाया करेगी, जिससे आपात परिस्थितियों मुश्किलों का सामना नहीं करना पड़ेगा।

कैसे काम करेगा कोडिंग और मैपिंग सिस्टम?

सरकारी योजनाओं के तहत, निर्मित राजमार्गों और ग्रामीण सड़कों का मानचित्रण और दस्तावेजीकरण तो किया जाता है, लेकिन गांवों के भीतर की गलियां अक्सर किसी भी आधिकारिक रिकॉर्ड से बाहर रहती हैं। अधिकारियों ने बताया कि व्यापक रूप से उपयोग की जाने वाली डिजिटल मानचित्र सेवाएं भी इस परत को उपयोगी विवरण के साथ प्रदर्शित नहीं करती हैं। यहां तक कि गूगल मैप्स पर भी गांव ठीक से नहीं दिखता।

इलाका तो दिखता है, लेकिन साफ ​​नहीं। व्यावसायिक मैपिंग प्लेटफॉर्म मुख्य सड़कों और राजमार्गों को पार करके गांव की बस्तियों में प्रवेश करने के बाद सड़कों को ट्रैक करना बंद कर देते हैं, जिससे अंदरूनी गलियां लगभग अदृश्य हो जाती हैं। अधिकारियों ने बताया कि इसका नतीजा यह है कि गांवों में पहचान अब भी पतों के बजाय व्यक्तिगत संदर्भों पर निर्भर करती है।

प्रस्तावित ढांचे के तहत, ग्रामीण सड़कों को उनकी चौड़ाई और कनेक्टिविटी के आधार पर वर्गीकृत किया जाएगा और उन्हें राज्य, जिले और गांव से जुड़े विशिष्ट अल्फान्यूमेरिक कोड दिए जाएंगे। यह कोडिंग प्रणाली प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना (पीएमजीएसवाई) के मौजूदा डेटाबेस के साथ संरेखित करने के लिए तैयार की जा रही है, जिससे एक समान राष्ट्रीय रिकॉर्ड बनाने में मदद मिलेगी। यह पहल डाक विभाग की भू-स्थानिक पता प्रणाली डीजीपिन से जुड़ी होगी, जिससे सड़कों को सटीक भौगोलिक निर्देशांकों से जोड़ा जा सकेगा।

कैसे किया जाएगा सड़कों का वर्गीकरण?

यह सिस्टम एक गांव की सभी सड़कों का त्रिस्तरीय वर्गीकरण करेगा। जिसके तहत गांव से गुजरने वाली या गांव के एक छोर से दूसरे छोर तक जाने वाली मुख्य सड़क होगी। दूसरी वे सड़कें होंगी जो जो मेन रोड को काटती हैं। वहीं, तीसरी श्रेणी में मेन रोड से निकलने वाली छोटी गलियां और रास्ते होंगे।

क्यूआर कोड से मिलेगी सड़क के बारे में हर जानकारी

पीएमजीएसवाई सड़कों के लिए मंत्रालय के आदेश के मुताबिक, फिजिकल रोड साइनबोर्ड पर क्यूआर कोड होंगे और इसे स्कैन करने पर ग्राम मानचित्र के जरिये सड़क की जानकारी, मरम्मत रिकॉर्ड और नेविगेशन डेटा देखा जा सकेगा। मंत्रालय के अनुसार, ग्राम पंचायत (गांव परिषद) अपने अधिकार क्षेत्र में सड़कों की पहचान, नामकरण और ग्रेडिंग के लिए मुख्य अथॉरिटी होगी।

बता दें कि ग्राम मानचित्र मंत्रालय द्वारा बनाया गया एक जियोस्पेशियल प्लानिंग और मॉनिटरिंग एप्लीकेशन है. यह सेंट्रल डिजिटल प्लेटफॉर्म के तौर पर काम करेगा, जहां सभी रोड कोड, डीजीपिन कोड, एलजीडी कोड और पीएमजीएसवाई डेटा एक साथ जोड़े जाएंगे।

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Avinay