Jammu Kashmir Climate Change: जम्मू-कश्मीर के पहाड़ी क्षेत्रों में लगातार बढ़ता तापमान वैज्ञानिकों और स्थानीय लोगों के लिए चिंता का कारण बनता जा रहा है। बता दें कि पहाड़ों में तापमान बढ़ने का असर सिर्फ मौसम तक सीमित नहीं रहता, बल्कि इसका सीधा प्रभाव ग्लेशियर, नदियों, खेती और पर्यावरण पर भी पड़ता है। हाल ही में IIT खड़गपुर के वैज्ञानिकों की एक रिसर्च में सामने आया है कि पिछले लगभग 20 सालों में जम्मू-कश्मीर के कई ऊंचाई वाले इलाकों का तापमान करीब एक डिग्री सेल्सियस तक बढ़ गया है।
मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, यह रिसर्च भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) खड़गपुर के सेंटर फॉर ओसियन, रिवर, एटमॉस्फियर एंड लैंड साइंसेज (CORAL) के वैज्ञानिकों ने किया। रिसर्च में प्रोफेसर जयनारायणन कुट्टिपुरथ, जी. एस. गोपीकृष्णन और वी. एम. प्रणव चंद्रन शामिल रहे। वैज्ञानिकों ने जम्मू-कश्मीर के बदलते मौसम और तापमान के आंकड़ों का गहराई से विश्लेषण किया।
10 मौसम केंद्रों के आंकड़ों का किया गया विश्लेषण
रिसर्च के दौरान भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (IMD) के जम्मू, कटड़ा, बटोट, भद्रवाह, बनिहाल, काजीगुंड, श्रीनगर, पहलगाम, गुलमर्ग और कुपवाड़ा स्थित 10 मौसम केंद्रों के तापमान रिकॉर्ड का अध्ययन किया गया। इन आंकड़ों के आधार पर वैज्ञानिकों ने तापमान में हो रहे बदलाव को समझने की कोशिश की।
रिसर्च में पता चला कि तापमान में बढ़ोतरी पूरे जम्मू-कश्मीर में एक जैसी नहीं हो रही है। सबसे ज्यादा असर मिडल और अधिक ऊंचाई वाले पर्वतीय क्षेत्रों में देखा गया है। वैज्ञानिक इसे एलिवेशन-डिपेंडेंट वार्मिंग कहते हैं। इसका मतलब है कि जैसे-जैसे ऊंचाई बढ़ती है, जलवायु परिवर्तन का प्रभाव भी ज्यादा दिखाई देता है।
रात का तापमान ज्यादा बढ़ रहा
रिसर्च में एक और महत्वपूर्ण बात सामने आई कि दिन के मुकाबले में रात का तापमान अधिक तेजी से बढ़ रहा है। कई पहाड़ी मौसम केंद्रों पर न्यूनतम तापमान हर दशक में 0.1 से 0.5 डिग्री सेल्सियस तक बढ़ा है। वैज्ञानिकों का कहना है कि हवा में बढ़ती नमी रात के समय धरती से निकलने वाली गर्मी को बाहर नहीं जाने देती, जिससे रातें पहले के मुकाबले में अधिक गर्म हो रही हैं।
रिसर्च के अनुसार तापमान में सबसे अधिक बढ़ोतरी सर्दियों के मौसम में दर्ज की गई है। इसकी एक बड़ी वजह बर्फबारी में कमी और बर्फ से ढकी सतह का कम होना है। जब बर्फ कम होती है तो जमीन अधिक मात्रा में सूर्य की गर्मी को सोख लेती है, जिससे तापमान और बढ़ जाता है।
ग्लेशियर और नदियों पर पड़ सकता है असर
ऐसे में वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी है कि अगर तापमान इसी तरह बढ़ता रहा तो जम्मू-कश्मीर के ग्लेशियर तेजी से पिघल सकते हैं। शुरुआत में इससे नदियों में पानी बढ़ सकता है, लेकिन लंबे समय में ग्लेशियर छोटे होते जाएंगे और गर्मियों में पानी की कमी हो सकती है। झेलम, चिनाब और सिंध जैसी नदियां काफी हद तक ग्लेशियरों से मिलने वाले पानी पर निर्भर हैं। ऐसे में सिंचाई, पेयजल और अन्य जरूरतों पर भी असर पड़ सकता है।
बढ़ता तापमान पहाड़ी फलों की खेती पर भी असर डाल सकता है। सेब, अखरोट और चेरी जैसी फसलों को अच्छी पैदावार के लिए सर्दियों में पर्याप्त ठंड की जरूरत होती है। अगर ठंड का समय कम होता है तो फलों की गुणवत्ता और उत्पादन दोनों पर असर पड़ सकता है। इसके अलावा कीटों और पौधों की बीमारियों का खतरा भी बढ़ सकता है, जिससे किसानों की मुश्किलें बढ़ेंगी।
वैज्ञानिकों ने दी यह सलाह
रिसर्च में बताया गया कि पहलगाम और गुलमर्ग जैसे ऊंचाई वाले क्षेत्रों में तापमान में उल्लेखनीय बढ़ोतरी दर्ज की गई है। वैज्ञानिकों का कहना है कि 3000 मीटर से अधिक ऊंचाई वाले इलाकों में मौसम से जुड़ा लंबी डुरैशन का डेटा अभी भी सीमित है। इसलिए भविष्य में जलवायु परिवर्तन का सही आकलन करने के लिए इन क्षेत्रों में अधिक मौसम केंद्र स्थापित करने की जरूरत है।



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