JK High Court Arbitration Order : जम्मू-कश्मीर और लद्दाख हाई कोर्ट ने केंद्र सरकार की वह याचिका लौटा दी है, जिसमें एक निर्माण कंपनी के साथ जारी विवाद में मध्यस्थ को बदलने की मांग की गई थी। हाईकोर्ट ने माना कि प्राइमा फेसी इस मामले में ‘सीट ऑफ आर्बिट्रेशन’ दिल्ली तय हुई थी। ऐसे में इस विवाद पर सुनवाई का अधिकार दिल्ली की सक्षम अदालत के पास ही है।
उच्च न्यायालय के जम्मू विंग में जस्टिस रजनेश ओसवाल ने यह फैसला सुनाया। अदालत ने साफ किया कि वह मध्यस्थ के खिलाफ केंद्र सरकार के आरोपों के मेरिट्स की जांच नहीं करेगी। अदालत ने कहा कि अगर वह ऐसा करती है, तो इसका मतलब यह मान लेना होगा कि जम्मू इस मामले की मध्यस्थता का स्थान है, जो कि अपने अधिकार क्षेत्र का अतिक्रमण करने जैसा होगा।
मामला IIT जम्मू से जुड़ा
यह मामला IIT जम्मू में ट्रांजिट कैंपस के निर्माण, सुरक्षा दीवार और स्टील स्ट्रक्चर के काम से जुड़ा हुआ है। यह ठेका केंद्रीय लोक निर्माण विभाग (CPWD) द्वारा मेसर्स पीएनएससी इंफ्रास्ट्रक्चर प्राइवेट लिमिटेड को दिया गया था। ठेके के बाद दोनों पक्षों के बीच विवाद उत्पन्न हो गया।
इसके बाद, कंपनी ने सीपीडब्ल्यूडी के जनरल कंडीशंस ऑफ कॉन्ट्रैक्ट 2014 के क्लॉज 25 के तहत मध्यस्थता प्रक्रिया शुरू की। सीपीडब्ल्यूडी के अतिरिक्त महानिदेशक (जम्मू) ने 14 मार्च 2023 को अखिलेश कुमार को एकल मध्यस्थ नियुक्त किया था।
केंद्र की दलील
केंद्र सरकार की ओर से डिप्टी सॉलिसिटर जनरल विशाल शर्मा ने दलील दी कि चूंकि कांट्रैक्ट जम्मू में दिया और निष्पादित किया गया था और मध्यस्थ की नियुक्ति भी यहीं हुई थी, इसलिए जम्मू-कश्मीर और लद्दाख का क्षेत्राधिकार बनता है। हालांकि, कोर्ट ने माना कि मध्यस्थता की कार्यवाही और इसकी ‘सीट’ दिल्ली तय होने के कारण यह मामला वहां की अदालत के अधिकार क्षेत्र में आता है।
अधिक कानूनी जानकारी और अदालती आदेशों के लिए नागरिक सीधे जम्मू-कश्मीर और लद्दाख उच्च न्यायालय की आधिकारिक वेबसाइट पर जा सकते हैं। इसके अलावा, मध्यस्थता मामलों के नियमों के लिए कानून एवं न्याय मंत्रालय की वेबसाइट का भी अवलोकन किया जा सकता है।
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