RBI ATM Refund Rules: सूरत से एक दिलचस्प मामला सामने आया है। जहां ATM ट्रांजैक्शन की गलती बैंक ऑफ बड़ौदा को भारी पड़ गई. मामला करीब 9 साल पुराना है। इस मामले में ग्राहक को राहत न मिलने पर उपभोक्ता आयोग ने सख्त रुख अपनाते हुए बैंक पर लाखों रुपये का जुर्माना लगाया है.
उपभोक्ता आयोग ने लिखा है कि बैंक ने ग्राहक को समय पर राहत नहीं दी और सेवा में गंभीर कमी बरती. मामला Bank of Baroda से जुड़ा है जब सूरत के उधना इलाके में एक ग्राहक State Bank of India के एटीएम से 10,000 रुपये निकालने गया। मशीन से न तो कैश निकला और न ही रसीद मिली, लेकिन कुछ देर बाद खाते से रकम डेबिट होने का मैसेज आ गया। अब ऐसा अक्सर हो जाता है पर कुछ समय बाद पैसे वापस क्रेडिट हो जाते हैं, मगर यहां ऐसा नहीं हुआ।
RBI ATM Refund Rules: शिकायतों के बावजूद नहीं मिली राहत

ग्राहक ने 21 फरवरी को बैंक ऑफ बड़ौदा की डुंभाल शाखा में लिखित शिकायत दर्ज कराई। इसके बाद मार्च से मई 2017 के बीच कई बार ईमेल के जरिए फॉलो-अप किया। उसने Reserve Bank of India समेत संबंधित अधिकारियों से भी गुहार लगाई और यहां तक कि CCTV फुटेज के लिए RTI भी दायर की, लेकिन उसे कोई ठोस जवाब नहीं मिला। अंततः परेशान होकर उसने 20 दिसंबर 2017 को उपभोक्ता फोरम का रुख किया।
सुनवाई के दौरान बैंक ऑफ बड़ौदा ने कहा कि एटीएम SBI का था और ट्रांजैक्शन उनके रिकॉर्ड में सफल दिखा रहा है, इसलिए उनकी जिम्मेदारी नहीं बनती। हालांकि, उपभोक्ता आयोग ने इस तर्क को खारिज करते हुए कहा कि ग्राहक को इससे कोई मतलब नहीं है और लेन-देन का सही प्रमाण देना बैंक की जिम्मेदारी है। साथ ही आयोग ने यह भी स्पष्ट किया कि RBI के नियमों के अनुसार 5 दिनों के भीतर रकम वापस की जानी चाहिए थी, जो नहीं की गई।
RBI New Rules: लाखों का जुर्माना और मुआवजा देने का आदेश
आयोग ने बैंक को 10,000 रुपये की मूल राशि 9% वार्षिक ब्याज के साथ लौटाने का निर्देश दिया। इसके अलावा देरी के लिए 100 रुपये प्रतिदिन के हिसाब से मुआवजा देने को कहा गया। 26 फरवरी 2026 तक 3,288 दिनों की देरी के चलते यह राशि 3,28,800 रुपये पहुंच गई। साथ ही 3,000 रुपये मानसिक पीड़ा और 2,000 रुपये मुकदमे के खर्च के रूप में भी देने का आदेश दिया गया।
आदेश में स्पष्ट किया गया है कि यह फैसला अंतिम माना जाएगा और बैंक को 30 दिनों के भीतर सभी भुगतान करने होंगे। यह मामला साफ संदेश देता है कि ग्राहकों की शिकायतों को नजरअंदाज करना बैंकों को महंगा पड़ सकता है और देर से ही सही, न्याय मिलना तय है।
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