Switzerland Blocks Arms Exports to US: मिडिल ईस्ट में ईरान से जारी जंग के बीच अमेरिका को तगड़ा झटका लगा है। अमेरिका के करीबी सहयोगी देश स्विट्जरलैंड ने साफ कर दिया है कि वह अब अमेरिका को हथियार निर्यात के लिए कंपनियों को लाइसेंस जारी नहीं करेगा। इस फैसले के पीछे उसकी तटस्थ नीति और मौजूदा युद्ध की स्थिति को जिम्मेदार बताया गया है।
Switzerland Blocks Arms Exports to US: स्विट्जरलैंड का तटस्थ रुख
मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक, स्विट्जरलैंड ने कहा है कि वह किसी भी युद्ध का समर्थन नहीं करता और हमेशा से तटस्थ रहा है। ऐसे में ईरान के साथ जारी संघर्ष के दौरान वह किसी भी पक्ष को हथियार देने की अनुमति नहीं दे सकता। सरकार की ओर से जारी बयान में कहा गया है कि जब तक अंतरराष्ट्रीय सशस्त्र संघर्ष जारी रहेगा, तब तक उसमें शामिल देशों को युद्ध सामग्री का निर्यात नहीं किया जाएगा। इसका मतलब साफ है कि फिलहाल अमेरिका को स्विट्जरलैंड से हथियार नहीं मिल पाएंगे।
अमेरिका के लिए बढ़ी मुश्किलें
स्विट्जरलैंड का यह फैसला ऐसे समय पर आया है जब अमेरिका को अपने सहयोगियों की जरूरत है। लेकिन इस कदम से अमेरिका की सैन्य सप्लाई चेन पर असर पड़ सकता है। स्विट्जरलैंड जैसे देश का पीछे हटना अमेरिका के लिए एक कूटनीतिक झटका माना जा रहा है।
होर्मुज स्ट्रेट बना बड़ा मुद्दा
इस बीच, ईरान ने एक और बड़ा कदम उठाते हुए होर्मुज स्ट्रेट को बंद कर दिया है। यह समुद्री रास्ता वैश्विक तेल आपूर्ति के लिए बेहद अहम माना जाता है। दुनिया का लगभग 20 प्रतिशत तेल इसी रास्ते से गुजरता है। होर्मुज स्ट्रेट के बंद होने से अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल और गैस की सप्लाई प्रभावित हुई है। इसका असर सीधे कीमतों पर पड़ा है और दुनियाभर में तेल के दाम तेजी से बढ़ रहे हैं।
स्थिति को संभालने के लिए अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अपने यूरोपीय सहयोगियों से मदद मांगी है। उन्होंने होर्मुज स्ट्रेट को फिर से खोलने के लिए एक संयुक्त मिशन बनाने का प्रस्ताव रखा। हालांकि, इस मुद्दे पर यूरोपीय देशों का रुख पूरी तरह एक जैसा नहीं है। ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी, इटली, नीदरलैंड और जापान ने इस दिशा में योजना बनाने की बात जरूर कही है, लेकिन सभी देश इस मिशन में शामिल होने के लिए तैयार नहीं हैं।
जर्मनी और नीदरलैंड ने बनाई दूरी
जर्मनी और नीदरलैंड ने साफ कर दिया है कि वे इस मिशन का हिस्सा नहीं बनेंगे। उनका कहना है कि जब तक युद्धविराम नहीं होता या हालात सामान्य नहीं होते, तब तक किसी भी सैन्य कार्रवाई में शामिल होना सही नहीं होगा। इन देशों का मानना है कि पहले तनाव कम करने और बातचीत के जरिए समाधान निकालने की कोशिश की जानी चाहिए। सीधे सैन्य हस्तक्षेप से स्थिति और बिगड़ सकती है।
ईरान-अमेरिका के बीच बढ़ते तनाव और सहयोगी देशों के अलग-अलग रुख ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चिंता बढ़ा दी है। तेल सप्लाई में बाधा और कूटनीतिक मतभेदों का असर वैश्विक अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है। एक्स्पर्ट्स का मानना है कि अगर जल्द ही इस संकट का समाधान नहीं निकला, तो इसका असर सिर्फ मध्य-पूर्व ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया पर देखने को मिल सकता है।
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