ऐसा अकसर होता है जब भी देश में चुनावी मौसम होता है तब आम लोग अपनी सारी समस्या जैसे बिजली,पानी और सड़क के सारे मुद्दे लेकर वापस आ जाते हैं। शहर,नगर और गांव का विकास हो इसके लिए ये तीनों ही आधारभूत जरूरते हैं। जबकि चुनावी वादों का क्या होता है ये सारी चीजे बताने की आप सभी को कोई आवश्यकता नहीं है। आज जो कहानी हम आपको बताने जा रहे हैं वह असम के डिब्रूगढ़ में बोइरगिमोथ की है। यहां पर एक विश्व स्तरीय सड़क का निर्माण किया गया है। लेकिन अफसोस है कि इसका निर्माण राज्य या फिर केंद्र सरकार द्वारा नहीं किया गया है बल्कि एक बेटे ने अपने पापा की याद में करवाया है।
पिता भी थे सामाजिक कार्यकर्ता
ये सड़क हेरम्बा बारदोलोई के नाम पर है। हेरम्बा एक सामाजिक कार्यकर्ता थे वह गौतम बारदोलोई के पिता हैं। इस सड़क को वल्र्ड क्लास इसलिए भी कहा जाता है क्योंकि इस सड़क की खूबसूरती और निर्माण की क्वालिटी ही लजवाब नहीं बल्कि इस सड़क पर सोलर स्ट्रीट लाइट,बेहतर डे्रनेज सिस्टम और दोनों तरफ सुंदरता के लिए पेड़-पौधे लगाए हुए हैं।
कच्चा रास्ता और बरसात के दिनों में लगता था पानी
यहां के लोगों का कहना है कि यह सड़क कभी कच्चा रास्ता हुआ करती थी। बारिश के दिनों में यहां पर घुटनों तक पानी भर जाना बहुत आम बात थी। इस कॉलोनी में हजारों लोग रहते हैं। गौतम के पिता हेरम्बा ने इस इलाके के लिए लोगों के लिए बहुत सेवा की है। गौतम के पिता हेरम्बा को साल 2008 में बारदोलोई का नाम दिया गया और संयोग से उनका उसी साल निधन हो गया था।
सड़क को दिया था नगर पालिका ने नाम
गौतम ने बताया कि जब दिब्रूगढ़ नगर पालिका ने इस सड़क का नाम मेरे पापा के नाम पर रखा तो मुझे बहुत गर्व हुआ था। लेकिन सड़क की हालत बहुत बेकार थी। मेरे पिता हमेशा लोगों की सुविधा और उनकी भलाई का ख्याल रखते थे उनके जाने के बाद ही मैने इस सड़क की कायापलट करने का फैसला किया था।
पुर्निर्माण कार्य 2013 में शुरू हुआ था
बता दें कि गौतम ने सड़क का पुननिर्माण कार्य साल 2013 में शुरू किया था। वो इस दौरान कामकाज के सिलसिले से हांगकांग भी गए। उन्होंने कुछ वहां के रहने वाले लोगों को सड़क को करीब डेढ-फीट तक ऊंचा करने के लिए रास्ते को भरना भी शुरू कर दिया था। इसके बाद उन्होंने व्यक्तिगत घरों के दरवाजे के सामने पीवीसी पाव ब्लॉक का भी उपयोग किया।
ड्रेनेज की सबसे बड़ी समस्या थी
सड़क बनाने निर्माण करने के लिए सबसे बड़ी चुनौती डे्रनेज सिस्टम की थी। वहीं बारिश के दिनों में पानी के ठहराव से निजात पाना बहुत जरूरी था। इसलिए कई सारी रिसर्च के बाद बेहतर डे्रनेज सिस्टम तैयार किया गया। इसके बाद सड़क की दोनों ओर बगीचा लगाने का काम शुरू किया गया। वहीं कुछ स्थानीय लड़कों ने सड़क के साइड में पेंट करने में भी मदद की।
13 लाख रुपये खर्च हुए 5 साल में
सड़क की लागत का वैसे तो कोई हिसाब नहीं रखा गया लेकिन अनुमान है इस सड़क निमार्ण में करीब 13 लाख रुपए का खर्चा आया। इस सड़क को जबरदस्त तरीके से तैयार करने में और इसकी सुंदरता साथ ही सोलर लाइट आदि का सारा काम पूरा करने में 5 साल का समय लग गया। गौतम ने बताया कि जब लोग यह सुनते हैं कि मैंने अकेले इसका सारा खर्च उठाया तो वह चौंक जाते हैं। लेकिन मैं सिर्फ इतना कहता हूं कि जब मेरे पिता ने अपना पूरा जीवन सामाजिक सेवा को समर्पित किया, तो उनके लिए मैं इतना तो कर ही सकता हूं।


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