काठमांडू, 10 मई (आईएएनएस)। नेपाल में बालेंद्र शाह की सरकार और न्यायपालिका के बीच खुले तौर पर टकराव शुरू हो गया है। संवैधानिक परिषद ने वरिष्ठता क्रम में चौथे स्थान पर मौजूद सुप्रीम कोर्ट के एक जज को मुख्य न्यायाधीश पद के लिए नामित किया है। इस वजह से सरकार और न्यायपालिका आमने-सामने आ गई हैं।
नेपाल के प्रधानमंत्री बालेंद्र शाह की अगुवाई वाली काउंसिल ने 7 मई को जस्टिस मनोज शर्मा को चीफ जस्टिस के पद पर नियुक्त करने के लिए राष्ट्रपति राम चंद्र पौडेल की सिफारिश की थी। हालांकि, मनोज शर्मा सुप्रीम कोर्ट के जजों में वरिष्ठता के क्रम में चौथे नंबर पर थे। नेपाल में मुख्य न्यायधीश के पद पर सबसे सीनियर जस्टिस को नियुक्त करने की दशकों पुरानी परंपरा है। ऐसे में मनोज शर्मा को चीफ जस्टिस के पद पर नियुक्त करने से ये परंपरा टूट गई।
राष्ट्रीय सभा के चेयरपर्सन नारायण दहल और प्रतिनिधि सभा में विपक्ष के नेता भीष्म राज अंगदेम्बे ने इस सिफारिश के खिलाफ असहमति जताते हुए नोट लिखे और इस बात पर जोर दिया कि लंबे समय से चली आ रही परंपरा को नहीं तोड़ा जाना चाहिए।
एक्टिंग चीफ जस्टिस सपना प्रधान मल्ला ने शनिवार को संवैधानिक परिषद के फैसले पर कड़ी प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि न्यायपालिका को सरकार के कंट्रोल में लाने की कोशिशें की जा रही हैं।
74वें नेशनल लॉ डे के मौके पर एक कार्यक्रम के खत्म होने के बाद, सुप्रीम कोर्ट की सबसे सीनियर जस्टिस मल्ला ने कहा, “यह न्यायपालिका को एक ऐसे संस्था में बदलने की कोशिश है जो एग्जीक्यूटिव बॉडी के सामने सरेंडर कर दे और समझौता कर ले।”
उन्होंने कहा कि सीनियरिटी की लंबे समय से चली आ रही परंपरा टूट गई है। उन्होंने मीडिया से कहा, “यह जरूरी नहीं है कि किस पर असर पड़ा है लेकिन यह सरकार की अपनी मर्जी से न्यायपालिका को कंट्रोल करने की कोशिश है।”
सरकार का कहना है कि मनोज शर्मा ने दूसरे सीनियर जजों के मुकाबले ज्यादा काबिलियत दिखाई है। इस पर जस्टिस मल्ला ने कहा, “काबिलियत किस आधार पर टेस्ट की गई, मुझे नहीं पता। काबिलियत को कॉम्पिटिशन और काम से टेस्ट किया जा सकता है। काबिलियत के बारे में जो भी डिटेल्स दी गई हैं, वे सही नहीं हैं। आप पूरी काबिलियत को कैसे जज करते हैं, यह सवाल जरूरी है।”
हालांकि, सरकार ने डेटा पेश किया था कि शर्मा ने इवैल्यूएशन के टाइम में बाकी तीन सीनियर जजों के मुकाबले ज्यादा फैसले दिए।
इससे पहले, 74वें लॉ डे के मौके पर ऑर्गनाइज एक स्पेशल सेरेमनी में मल्ला ने कहा कि दो-तिहाई बहुमत वाली सरकार के प्रेशर या इंपीचमेंट की धमकियों से इंसाफ के मतलब को कम नहीं किया जाना चाहिए।
कार्यक्रम में आए जजों को संबोधित करते हुए मल्ला ने कहा, “डर या किसी के प्रभाव में इंसाफ नहीं मिल सकता। चाहे वह किसी ताकतवर सरकार का डर हो या इंपीचमेंट का खतरा, जजों को ऐसी छोटी-छोटी रुकावटों से ऊपर उठना होगा।”
उन्होंने न्यायपालिका के सदस्यों से हिम्मत और बिना भेदभाव के इंसाफ की पवित्रता बनाए रखने की अपील की और इस बात पर जोर दिया कि न्यायपालिका की आजादी और इज्जत बनाए रखने के लिए बिना डरे फैसले लेना जरूरी है।
परिषद के फैसले की सबसे कड़ी आलोचना पूर्व प्रधानमंत्री सुशीला कार्की ने की है। बता दें, पूर्व पीएम कार्की नेपाल की पहली महिला चीफ जस्टिस भी थीं। सिफारिश के बाद न्यूज पोर्टल ऑनलाइन खबर से बात करते हुए, उन्होंने कहा कि एक काबिल महिला जस्टिस को देश का चीफ जस्टिस बनने का मौका नहीं दिया गया।
उन्होंने कहा, “सपना प्रधान मल्ला जितना काबिल कोई नहीं है। उनकी काबिलियत मुझसे भी ज्यादा है। यह 15 मिलियन महिलाओं (देश की आधी आबादी) के मुंह पर तमाचा है।”
कार्की ने शनिवार को संवैधानिक परिषद के फैसले पर भी गुस्सा जताया। लॉ डे इवेंट के खत्म होने के बाद मीडिया से बातकीत के दौरान, एक पत्रकार ने उन्हें मां कहकर संबोधित किया, जिसपर कार्की नाराज हो गईं। दरअसल, प्रधानमंत्री शाह ने पहले उनके लिए इस शब्द का इस्तेमाल किया था।
उन्होंने कहा, “मुझे मां मत कहो। तुम्हारी मां अब बदल गई है। बालेंद्र शाह की पत्नी (सबीना काफले) अब मां हैं, देश की मां।” बता दें, पिछले साल सितंबर में जेन-जी आंदोलन के बाद कार्की को अंतरिम प्रधानमंत्री के तौर पर नियुक्ति किया गया था। इस नियुक्ति में वर्तमान पीएम बालेंद्र शाह ने अहम भूमिका निभाई थी।
कार्की ने पहले कहा था कि काउंसिल के फैसले से न्यायिक आजादी पर असर पड़ेगा। उन्होंने कहा, “जिस तरह से कोर्ट को कंट्रोल करने की कोशिशें की गई हैं, उससे यह सरकार अच्छी स्थिति में नहीं आएगी। कोर्ट में दखल देना अच्छी बात नहीं है।”
संवैधानिक वकील बिपिन अधिकारी ने न्यूज एजेंसी आईएएनएस को बताया कि हालांकि संविधान काउंसिल को चीफ जस्टिस के पद के लिए जूनियर जस्टिस की सिफारिश करने से नहीं रोकता है, लेकिन चिंता है कि सबसे सीनियर जस्टिस को नियुक्त करने की परंपरा तोड़ने से सरकार को सुप्रीम कोर्ट में टॉप पोस्ट के लिए अपने पसंदीदा उम्मीदवार को चुनने और पैंतरेबाजी करने का मौका मिल सकता है।
उन्होंने कहा, “इससे न्यापालिका की आजादी पर असर पड़ सकता है, जो राज्य की एग्जीक्यूटिव ब्रांच को चेक और बैलेंस करने के लिए जिम्मेदार है।” अधिकारी के मुताबिक, सरकार का यह तर्क कि फैसलों की संख्या के आधार पर जस्टिस शर्मा का ट्रैक रिकॉर्ड बेहतर था, गलत था।
उन्होंने कहा, “सिर्फ संख्या किसी जज के परफॉर्मेंस को जांचने का पैरामीटर नहीं हो सकती। फैसलों की क्वालिटी और न्यायिक मिसाल कायम करने पर उनका असर ज्यादा जरूरी है।”
उनका मानना है कि यह सोच कि मल्ला और दूसरे सीनियर जजों को पहले पॉलिटिकल पावर-शेयरिंग के आधार पर अपॉइंट किया गया था, शायद यही एक बड़ा कारण रहा होगा कि रूलिंग पार्टी के दबदबे वाली संवैधानिक परिषद ने सिर्फ परफॉर्मेंस के आधार पर उनका मूल्यांकन करने के बजाय, चीफ जस्टिस के पद के लिए सीनियर रैंक के जजों की सिफारिश नहीं की।
संविधान, संवैधानिक परिषद को न्याय परिषद द्वारा सुझाए गए छह जजों में से किसी एक को चुनने से नहीं रोकता है; सुप्रीम कोर्ट के सबसे सीनियर जज की सिफारिश करने का रिवाज लंबे समय से रहा है। हालांकि, पहले कुछ जजों को उनके खिलाफ शिकायतों के बाद पार्लियामेंट्री हियरिंग कमेटी ने रिजेक्ट कर दिया था।
नेपाल के संविधान के आर्टिकल 129 के तहत, जो जस्टिस सुप्रीम कोर्ट के जज के तौर पर कम से कम तीन साल काम कर चुका है, वह चीफ जस्टिस बनने के लायक है।
–आईएएनएस
केके/पीएम
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