पोप फ्रांसिस ने सोमवार को एक विशेष सामूहिक प्रार्थना में कहा कि प्रवासी वैश्वीकरण द्वारा खारिज किए जा चुके लोगों के प्रतीक बन गए हैं। उन्होंने कहा कि प्रवासी ‘‘सबसे कमजोर हैं और सबसे संवेदनशील लोगों की निश्चित तौर पर मदद की जानी चाहिए।
पोप की लैम्पेडूसा यात्रा की छठी वर्षगांठ के अवसर पर उन्होंने सामूहिक प्रार्थना में शामिल हुए लोगों से कहा, ‘‘इन्हें छोड़ दिया गया है, रेगिस्तान में मरने के लिए छोड़ दिया गया है।’’ गौरतलब है कि लीबिया से दुरूह समुद्री रास्ता तय करके शरण चाहने वाले कई लोग लैम्पेडूसा आते हैं। पोप ने कहा कि इन प्रवासियों को बंधक शिविर में यातनाएं दी जाती हैं, उनका शोषण किया जाता है और उनसे दुष्कर्म होता है। उन्हें भयावह समुद्री लहरों का सामना करना पड़ता है।
इस सामूहिक प्रार्थना में प्रवासियों, शरण के आकांक्षी लोगों और बचाव कर्मियों सहित 250 लोगों ने हिस्सा लिया। पोप ने कहा, ‘‘वे महज सामाजिक या पलायन के मुद्दे नहीं, बल्कि इंसान हैं।’’ उन्होंने कहा, ‘‘प्रवासी सबसे पहले इंसान हैं…और वे आज के वैश्वीकृत समाज द्वारा खारिज किए जा चुके सभी लोगों के प्रतीक बन गए हैं।’’ पोप फ्रांसिस ने जुलाई 2013 में लैम्पेडूसा की यात्रा की थी।


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