भारतीय पौराणिक और मिस्टीरियस कहानियों का बॉलीवुड फिल्मों से पुराना रिश्ता रहा है। वहीं जब कहानी में देवी-देवताओं से जुड़ी मान्यताएं, घना जंगल, गांव की संस्कृति और डिवाइन घटनाएं शामिल हों। तो दर्शकों की एक्साइटमेंट नेचुरली बढ़ जाती है। ‘द वान: फोर्स ऑफ द फॉरेस्ट’ भी कुछ इसी तरह के अट्रैक्टिव आईडिया के साथ रिलीज़ हुई है।
इस फिल्म में एक पवित्र जंगल है, जिसे स्थानीय लोग वन देवी का निवास मानते हैं। इसके साथ छठ पूजा, गांव का जीवन, जमीन का विवाद, डेवेलपमेंट और नेचर के साथ मिस्टीरियस शक्तियों को कहानी में जोड़ा गया है। सुनने में यह कॉम्बीनेशन काफी दिलचस्प लगता है, लेकिन पर्दे पर आते-आते कहानी इन सभी पहलुओं को संभाल नहीं पाती। वहीं नतीजा यह होता है कि शुरुआत में जो फिल्म क्यूरोसिटी पैदा करती है, वह आगे बढ़ने के साथ अपना चार्मिंग इफैक्ट खो देती है।
क्या है फिल्म की कहानी?
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कहानी ऋषि के इर्द-गिर्द घूमती है, जिसका किरदार सिद्धार्थ मल्होत्रा ने निभाया है। ऋषि मुंबई में रहने वाला एक इंजीनियर है और अपनी पत्नी ममता के साथ जिंदगी बिता रहा है। दोनों पर्सनल लाइफ में एक मुश्किल दौर से गुजर रहे हैं और लंबे समय से माता-पिता बनने की उम्मीद कर रहे हैं। इसी बीच ऋषि को अपने पुश्तैनी गांव देवांचल लौटना पड़ता है। जहां गांव में उसकी जमीन से जुड़ी एक समस्या है, जिसे वह सुलझाना चाहता है। लेकिन वहां पहुंचने के बाद उसका सामना ऐसी मान्यता से होता है, जो उसके रेशनलिस्ट नजरिए को चैलेंज करती है।
गांव के लोग एक जंगल को बेहद पवित्र मानते हैं। मान्यता है कि वहां वन देवी का वास है और सूर्यास्त के बाद किसी को भी जंगल में जाना मना है। हालांकि ऋषि इन बातों को अंधविश्वास मानता है, लेकिन जंगल से जुड़ी कुछ अजीब घटनाएं उसके विश्वास को धीरे-धीरे हिलाने लगती हैं। इसी बीच जंगल के रास्ते पर सड़क बनाने की प्लानिंग सामने आती है। इससे डेवेलपमेंट और लोगों की आस्था के बीच टकराव शुरू होता है। ऋषि भी धीरे-धीरे उन घटनाओं का हिस्सा बन जाता है, जिन्हें वह शुरुआत में सिर्फ अंधविश्वास समझ रहा था। कहानी का यह बेस काफी मजबूत हो सकता था, लेकिन फिल्म इस सेटअप को आगे उतनी मजबूती से नहीं संभाल पाती।
शुरुआत में बनती है दिलचस्पी, लेकिन रहस्य कमजोर पड़ता है

लेकिन फिल्म का पहला पार्ट पूरी तरह निराश नहीं करता। क्योंकि मुंबई से देवांचल तक ऋषि का सफर और गांव के माहौल को समझने की कोशिश दर्शकों को कहानी से जोड़ती है। जंगल को लेकर गांव के लोगों का डर भी एक सवाल खड़ा करता है कि आखिर ऐसा क्या है जिसकी वजह से सूर्यास्त के बाद वहां जाने से लोग बचते हैं? यही सवाल शुरुआती हिस्से में फिल्म को आगे बढ़ाता है। हालांकि जैसे-जैसे कहानी आगे बढ़ती है, जंगल से जुड़े रहस्य को जिस गहराई और इफोक्टिवनेस के साथ पेश किया जाना चाहिए था, वह नजर नहीं आता।
फिल्म को जहां एन्वायरमेंट, मिस्ट्री और सस्पेंस को मजबूत करना चाहिए था। वहीं यह कई दूसरे ट्रैक में उलझने लगती है, जिससे मेन कहानी का असर कम होता जाता है।
दूसरे हाफ में कमजोर हो जाती है पकड़

फिल्म की सबसे बड़ी परेशानी उसका दूसरा पार्ट है। यहां स्क्रीनप्ले एक साथ कई मुद्दों को समेटने की कोशिश करता है। कहानियां, पुराना विश्वास, एन्वायरमेंट, जमीन का विवाद, सड़क बनाना, सुपरनैचुरल घटनाएं और कॉमेडी इन सभी को एक ही कहानी में जगह दी गई है। लेकिन इनमें से कोई भी पहलू पूरी तरह विकसित नहीं हो पाता।
शुरुआत में जमीन और सड़क का विवाद कहानी का अहम हिस्सा लगता है, लेकिन बाद में डिवाइन घटनाएं उस ट्रैक पर हावी हो जाती हैं। इसी तरह छठ पूजा और पब्लिक ट्रस्ट को भी कहानी में शामिल किया गया है, लेकिन दोनों के बीच मजबूत रिलेशन नहीं बन पाता। कई जगह ऐसा महसूस होता है कि स्क्रीनप्ले कहानी को नोचुरल तौर से आगे बढ़ाने के बजाय लगातार नए ट्विस्ट जोड़ने में बिज़ी है। जिसकी वजह से इसका असर फिल्म की रफ्तार पर पड़ता है।
वहीं क्लाइमेक्स तक आते-आते फिल्म का अंदाज भी बदल जाता है। शुरुआत में पुरानी कहानियां और मिस्ट्री पर बेस्ड इस फिल्म की कहानी आखिर में बड़े लेवल के सुपरनैचुरल एक्शन में पहुंच जाती है। लेकिन यह बदलाव रोमांच पैदा करने के बजाय थोड़ा हल्का महसूस होता है।
निर्देशन में हुई परेशानी

दीपक कुमार मिश्रा ने भारतीय पब्लिक ट्रस्ट और गांव के माहौल पर बेस्ड एक अलग तरह की फैंटेसी पेश करने की कोशिश की है। फिल्म के विचार से यह साफ है कि उनका मकसद इसे जनरल हॉरर या फैंटेसी फिल्म से अलग रखना था। लेकिन निर्देशन की सबसे बड़ी दिक्कत इसका टोन है।
ये फिल्म कभी सीरियस कहानी बनने की कोशिश करती है, कभी हॉरर का माहौल तैयार करती है, तो कभी फैंटेसी एडवेंचर और कॉमेडी की ओर मुड़ जाती है। एक सीन में मिस्ट्री और तनाव बनता है, जबकि अगले ही पल कॉमेडी शुरू हो जाती है। इससे फिल्म का एन्वायरमेंट बार-बार टूटता है। बिहार के बैकग्राउंड के बावजूद वहां की संस्कृति और लोकल माहौल को उस गहराई से नहीं दिखाया गया, जिसकी उम्मीद की जा सकती थी।
सिद्धार्थ मल्होत्रा की एक्टिंग कैसी है?

सिद्धार्थ मल्होत्रा ने ऋषि का रोल निभाया है। वह एक ऐसे इंसान का किरदार निभाते हैं जो शुरुआत में हर डिवाइन बात को तर्क की कसौटी पर देखता है और बाद में उन्हीं घटनाओं का सामना करता है। सिद्धार्थ एक्शन वाले सीन्स में सिंपल दिखाई देते हैं, हालांकि उनके किरदार में होने वाला मानसिक और इमोशनल बदलाव स्क्रीनप्ले में पूरी मजबूती से नहीं लिखा गया है। इस वजह से उनका किरदार दर्शकों पर उतना गहरा प्रभाव नहीं छोड़ता।
तकनीकी पक्ष कैसा है?

फिल्म की तकनीकी खूबियों में सिनेमैटोग्राफी को शामिल किया जा सकता है। जंगल को घने पेड़ों, धुंध और कम रोशनी के जरिए एक रहस्यमयी रूप देने की कोशिश की गई है। कई फ्रेम देखने में अच्छे हैं। बैकग्राउंड म्यूजिक और लोकल धुनें भी फिल्म को मजबूत करने की कोशिश करती हैं। छठ से जुड़े सीन्स में स्थानीय रंग दिखाने की कोशिश साफ नजर आती है। वीएफएक्स में फिल्म ने बड़े लेवल पर अलौकिक दुनिया दिखाने की कोशिश की है, लेकिन इसका रिज़ल्ट हर जगह एक जैसा नहीं है। कुछ सीन अच्छे लगते हैं, जबकि कुछ जगह विजुअल इफेक्ट्स थोड़े बनावटी दिखाई देते हैं।
कहां रह गई कमी?

‘द वान: फोर्स ऑफ द फॉरेस्ट’ की सबसे बड़ी परेशानी इसके विचारों की कमी नहीं, बल्कि विचारों को ज्यादा से ज्यादा दिखाना है। फिल्म के पास कई ऐसे टॉपिक हैं, जिन पर एक मजबूत कहानी बनाई जा सकती थी, लेकिन उन्हें एक साथ पेश करने की कोशिश में किसी भी मुद्दे को पूरी गहराई नहीं मिल पाती। जंगल का रहस्य भरपूर एफेक्ट पैदा नहीं कर पाता। छठ और लोककथा कहानी का हिस्सा तो बनते हैं, लेकिन उनका इस्तेमाल ज्यादा अच्छा नहीं लगता। नेचर और डेवेलपमेंट के बीच स्ट्रगल भी एक मजबूत सामाजिक मैसेज दे सकता था, मगर सुपरनैचुरल घटनाओं के आगे वह पीछे छूट जाता है।
कॉमेडी भी कई जगह कहानी के मूड को इफेक्ट करती है। वहीं सीरियस घटनाओं के बीच अचानक आने वाले मजाक तनाव को कम कर देते हैं। सबसे बड़ी निराशा क्लाइमेक्स से होती है, जो शुरुआत में बनाए गए रहस्य को उतने अच्छें तरीके से खत्म नहीं कर पाती। जितनी उम्मीद फिल्म की शुरुआत कराती है।
फाइनल वर्डिक्ट

‘द वान: फोर्स ऑफ द फॉरेस्ट’ में एक ऐसी फिल्म बनने की पूरी पॉसीबिलिटी थी, जो भारतीय लोककथाओं, गांव की संस्कृति और डिवाइन मिस्ट्री को एक नए अंदाज में दर्शकों के सामने पेश करती। वन देवी, पवित्र जंगल और छठ जैसी चीजें कहानी को अलग पहचान दे सकती थी। फिल्म में कुछ अच्छे विजुअल्स हैं और कलाकारों ने भी अपनी तरफ से अच्छी कोशिस की है, लेकिन कमजोर स्क्रीनप्ले इन खूबियों पर भारी पड़ता है।
रेटिंग: (2/5)
कुल मिलाकर, ‘द वान: फोर्स ऑफ द फॉरेस्ट’ एक ऐसे थॉट्स की फिल्म है, जिसमें पॉसीबिलिटी तो काफी थीं। लेकिन कमजोर कहानी और बिखरी स्टोरीलाइन की वजह से वह अपनी पूरी एबिलिटी तक नहीं पहुंच पाती।


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