Dissatisfaction Among AYUSH Doctors : प्रस्तावित राष्ट्रीय फार्मेसी आयोग अधिनियम के मसौदे को लेकर आयुष चिकित्सकों में रोष व्याप्त है। ऑल इंडिया डॉक्टर्स एसोसिएशन ऑफ आईएसएम ने इसे आयुष चिकित्सकों के अधिकारों के लिए नुकसानदायक बताते हुए केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जे. पी. नड्डा को पत्र लिखकर इस मामले में तत्काल हस्तक्षेप की मांग की है।
संस्था के राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ. आर. पी. पाराशर और संरक्षक डॉ. युवराज त्यागी ने कहा कि सरकार फार्मेसी एक्ट 1948 को निरस्त कर नेशनल फार्मेसी कमिशन एक्ट लागू करने की प्रक्रिया में है, लेकिन प्रस्तावित मसौदे में कई अहम प्रावधानों को शामिल नहीं किया गया है, जिससे आयुष चिकित्सकों के अधिकार प्रभावित हो सकते हैं। डॉ. पाराशर के अनुसार, नए एक्ट में ‘मेडिकल प्रैक्टिशनर’ शब्द की स्पष्ट परिभाषा नहीं दी गई है, जबकि फार्मेसी एक्ट 1948 की धारा 2 में यह परिभाषा मौजूद है, जिसमें आयुष चिकित्सक भी शामिल हैं।
इसके अलावा, पुराने कानून की धारा 42 के तहत रजिस्टर्ड फार्मासिस्ट को मेडिकल प्रैक्टिशनर की प्रिस्क्रिप्शन के आधार पर दवा देने का प्रावधान था, जिसे प्रस्तावित विधेयक में हटा दिया गया है। उन्होंने कहा कि इन प्रावधानों के हटने से आयुर्वेदिक और यूनानी चिकित्सकों के कार्यक्षेत्र पर सीधा असर पड़ सकता है। वर्तमान व्यवस्था में आयुष चिकित्सक एलोपैथिक दवाएं प्रिस्क्राइब कर सकते हैं और अपने क्लीनिक में दवाओं का स्टॉक भी रख सकते हैं, लेकिन नए मसौदे में इस संबंध में स्थिति स्पष्ट नहीं है।
डॉ. पाराशर ने चेतावनी दी कि यदि फार्मेसी एक्ट 1948 की धारा 2 और 42 को नए कानून में शामिल नहीं किया गया, तो आयुष चिकित्सकों के अधिकारों पर अनिश्चितता की स्थिति बन सकती है। उन्होंने यह भी बताया कि सुप्रीम कोर्ट में आयुष चिकित्सकों द्वारा एलोपैथिक दवाओं के प्रयोग के अधिकार से जुड़ा मामला विचाराधीन है, जिसमें इन धाराओं का हवाला दिया गया है। ऐसे में नए कानून में इन प्रावधानों की अनुपस्थिति न्यायिक प्रक्रिया पर भी असर डाल सकती है। संस्था ने सरकार से मांग की है कि आयुष चिकित्सकों के हितों को ध्यान में रखते हुए प्रस्तावित अधिनियम में आवश्यक संशोधन किए जाएं, ताकि स्वास्थ्य सेवाओं पर किसी प्रकार का नकारात्मक प्रभाव न पड़े।


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