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नवाज शरीफ की वापसी

पाकिस्तान के तीन बार प्रधानमंत्री रहे नवाज शरीफ की वापसी ने सियासत को गर्मा दिया है। पाकिस्तान में एंट्री करने के कुछ घंटे के भीतर ही उन्होंने लाहौर में एक बड़ी चुनावी जनसभा को भी सम्बोधित किया। 4 साल बाद पाकिस्तान लौटे नवाज शरीफ अपना कोई भी कार्यकाल पूरा नहीं कर सके लेकिन इस समय सियासी हालात उनके पक्ष में दिखाई दे रहे हैं। इस समय पाकिस्तान के आर्थिक हालात डावांडोल हैं और राजनीतिक अस्थिरता का माहौल है। ऐसी स्थिति में नवाज की नाटकीय वापसी बहुत कुछ कहती नजर आ रही है। ए वन फील्ड और अल अजिजिया मामले में दोषी करार दिए जाने के बाद उन्हें सात साल की सजा सुनाई गई थी। वह एक साल तक जेल में रहे फिर मैडिकल आधार पर उन्हें लंदन जाने दिया गया। उन्हें लंदन जाने की अनुमति भी सेना के साथ एक डील के तहत दी गई थी। कानून की नजर में अभी भी उनकी पहचान एक मुजरिम की है। उनकी वापसी इसलिए कराई गई है जब पार्टी कोे यकीन हो गया कि सुप्रीम कोर्ट से उन्हें कोई न कोई राहत मिल जाएगी। उनके पहुंचने से पहले ही अदालत उन्हें राहत दे चुकी थी।
सुप्रीम कोर्ट ने 28 जुलाई 2017 को पनामा केस में कसूरवार मानते हुए आजीवन चुनाव लड़ने से अयोग्य करार दे दिया था। इस फैसले काे सुनाने वाले सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस उमर अता बांदियाल पिछले महीने रिटायर हो चुके हैं। उनके पद पर रहते हुए पाकिस्तान मुस्लिम लीग नवाज को पाकिस्तान आने का रिस्क लेने को तैयार नहीं थी। इसीलिए उनकी वापसी में विलम्ब किया गया। नवाज शरीफ को अब दो मोर्चों पर लड़ना होगा। पहला कानूनी मोर्चा और दूसरा सियासी मोर्चा और सबसे बड़ी चुनौती पाकिस्तान का आर्थिक संकट है।
राजनीतिक क्षेत्रों में इस बात की बड़ी चर्चा है कि क्या नवाज की वापसी सेना से किसी डील के तहत हुई है। राजनीति बड़ी निष्ठुर होती है वह कब किसे फर्श से अर्श पर ले जाए और कब अर्श से फर्श पर पटक दे कुछ कहा नहीं जा सकता। कहते हैं तानाशाह का कार्यकाल एक ही बार का होता है। जबकि राजनीतिज्ञ के दस रूप होते हैं। इस मामले में नवाज शरीफ भाग्यशाली दिखाई दे रहे हैं कि वह वापस लौट आए हैं। इसमें कोई संदेह नहीं कि नवाज शरीफ सियासी माहिर हैं और उनके सेना प्रतिष्ठान से अच्छे संबंध हैं। पाकिस्तान में सैन्य प्रतिष्ठान भी पंजाब के अलावा किसी दूसरे पर भरोसा करने को तैयार नहीं है। पंजाब आज भी पाकिस्तान की राजनीति की धुरी है।
2022 में विश्वास मत हासिल करने में नाकामयाब रहने के बाद पीएम पद खोने वाले इमरान खान की इस समय फौज से बिल्कुल नहीं बन रही है। इमरान ने पाकिस्तानी जनरलों और अमेरिका पर उन्हें राजनीतिक तौर पर खत्म करने की साजिश रचने का आरोप लगाया है। साफ है कि इमरान खान के पास अब सेना का समर्थन नहीं है। दूसरी ओर राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि बीते चुनाव में जबरदस्त जीत हासिल करने वाले इमरान खान का विकल्प पाक सेना भी तलाश रही है। नवाज शरीफ के लिए इस समय फौज की ओर से दिखाई गई गर्मजोशी की यही वजह है। नवाज शरीफ की पाकिस्तान में एंट्री सेना और उनकी पार्टी दोनों के लिए अहम है। सेना चाहती है कि इमरान खान की गिरफ्तारी के बाद पैदा हुए राजनीतिक खालीपन को नवाज शरीफ के जरिए भरा जाए। वहीं पार्टी को भी शरीफ की लीडरशिप की जरूरत है क्योंकि वही एक ऐसा चेहरा हो सकते हैं जो इमरान खान को लोकप्रियता के मामले में टक्कर दे सकें।
नवाज शरीफ चुनावों का नेतृत्व करेंगे। अब जबकि अगले वर्ष जनवरी में पाकिस्तान में चुनाव होने वाले हैं और इन चुनावों में एक बार फिर नवाज शरीफ की सत्ता में वापसी की उम्मीद है। 73 वर्षीय नवाज शरीफ 35 साल से अधिक समय से राजनीति में हैं। उन्हें पाकिस्तान में जनरल जिया-उल-हक का दत्तक पुत्र भी कहा जाता है। इमरान खान तो सार्वजनिक सभाओं में यह कहते रहे हैं कि नवाज शरीफ जनरल जिया-उल-हक के जूते पालिश किया करता था। सियासत में ऐसी बयानबाजी अर्थहीन हो जाती है जब जनता का समर्थन मिल जाए। वर्ष 1998 में पाकिस्तान के परमाणु बम के परीक्षण का श्रेय भी उन्हीं को जाता है। जनरल मुशर्रफ अगर कारगिल युद्ध की साजिश नहीं रचते तो हो सकता था कि भारत-पाक संबंधों पर बर्फ नहीं जमती। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी तो दोस्ती का हाथ बढ़ाने के लिए काबूल से लौटते हुए पाकिस्तान पहुंच गए थे और नवाज शरीफ की नातिन की शादी में शामिल हुए थे। प्रधानमंत्री मोदी ने नवाज शरीफ को जन्मदिन पर बधाई भी दी थी। पाकिस्तान इस समय महंगाई और गरीबी के परमाणु बम पर बैठा हुआ है। देश की जनता को एक ऐसे रहनुमा की जरूरत है जो देश को आर्थिक संकट से निकाल सके। उनकी वापसी से पार्टी की धाक तो बढ़ेगी ही और हो सकता है कि चुनाव में उनकी पार्टी को इसका फायदा भी मिले। नवाज शरीफ के सामने जितनी कानूनी मुश्किलें हैं उनसे ज्यादा चुनौती प्रधानमंत्री बनने के बाद है। देखना होगा कि वह अपनी पार्टी और पाकिस्तान की नैय्या कैसे पार लगाते हैं।

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