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शिवसेना : टूट-फूट और दल-बदल

महाराष्ट्र विधानसभा के शिवसेना विधायकों का लगभग डेढ़ साल पहले अपने मूल दल से अलग होकर विधानसभा के भीतर पृथक शिवसेना समूह के गठन करने का मामला ‘दल-बदल’ कानून के तहत विधायिका और न्यायपालिका के बीच लटका पड़ा है, वह स्वयं में काफी विस्मयकारी व रोचक है। विधायकों द्वारा दल-बदल कर नया दल बनाने को मान्यता विधानसभा के अदर विधानसभा अध्यक्ष ही देते हैं, अतः शिवसेना विधायकों का मामला उन्ही के ‘न्यायिक’ अधिकारों के तहत आता है परन्तु विधानसभा अध्यक्ष इस मामले को जिस तरह से लगातार टाल रहे हैं उसके राजनैतिक अर्थ निकालने के साथ ही न्यायिक प्रक्रिया से जुड़े सवाल भी उठ रहे हैं। महाराष्ट्र के वर्तमान मुख्यमन्त्री एकनाथ शिन्दे शिवसेना से टूट कर अलग हुए गुट के ही नेता हैं। इससे पहले वह श्री उद्धव ठाकरे की अध्यक्षता वाली शिवसेना पार्टी के ही सदस्य थे। मगर उनके नेतृत्व में शिवसेना में जो टूट हुई उसकी वजह से उन्ही के नेता श्री उद्धव ठाकरे की सरकार गिर गई थी क्योंकि श्री ठाकरे की शिवसेना के अधिसंख्य विधायक श्री शिन्दे के साथ आ गये थे। मगर यह टूट दो किश्तों में हुई थी।
प्रारम्भ में शिवसेना के 16 विधायकों ने ही पार्टी से अलग होने का ऐलान किया था बाद में उनके साथ और विधायक भी आ गये थे। ठाकरे सरकार को उस समय विधानसभा में विश्वासमत प्राप्त करना था परन्तु उन्होंने विश्वासमत का सामना करने से पहले ही इस्तीफा दे दिया था और इस प्रकार महाराष्ट्र की श्री उद्धव ठाकरे के नेतृत्व में बनी तीन दलों शिवसेना, कांग्रेस व राष्ट्रवादी कांग्रेस की महाअघाड़ी सरकार धराशायी हो गई थी। सवाल यह पैदा हो रहा है कि श्री शिन्दे समेत जिन 16 विधायकों ने विधानसभा के भीतर उस समय के शिवसेना के मुख्य सचेतक के निर्देशों का उल्लंघन करते हुए जो कार्रवाई की थी उन पर विधानसभा अध्यक्ष का फैसला क्या रहता है। विधानसभा अध्यक्ष श्री राहुल नार्वेकर के सामने यह सवाल सर्वोच्च न्यायालय ने ही रखा हुआ है कि वे इन विधायकों की सदस्यता के बारे में अपना फैसला जल्दी से जल्दी दें और एक समय सीमा निर्धारित करें। इससे पहले सर्वोच्च न्यायालय के सामने जब यह मामला उद्धव ठाकरे शिवसेना एक याचिका के माध्यम से लाई थी तो उसने स्पष्ट आदेश दे दिया था कि इस बारे में विधानसभा अध्यक्ष को ही अधिकार है और वह ही इसका फैसला करेंगे। मगर राहुल नार्वेकर न जाने किस बात का इन्तजार कर रहे हैं और मामले को आगे टालते ही जा रहे हैं और अपने पक्ष में दलील दे रहे हैं कि जल्दी में किया गया न्याय उसे दफनाने के समान होता है (जस्टिस हरीड जस्टिस बरीड। दरअसल वह विधायकों के दल-बदल करने के मामले में मिले न्यायिक अधिकारों का इस तरह विस्तार करना चाहते हैं कि मामला इस हद तक न पहुंच जाये जिससे मौजूदा शिन्दे सरकार पर ही खतरे के बादल मंडराने लगे। ऐसा राज्य के विपक्षी दलों का विचार है।
महाराष्ट्र में भी अगले साल ही लोकसभा चुनावों के बाद विधानसभा चुनाव होने हैं। वैसे राहुल नार्वेकर भी एक लम्बे अर्से तक शिवसेना में रहे हैं और भाजपा में वह बाद में आये। जिस समय महाराष्ट्र में यह दल-बदल और शिवसेना टूट-फूट खेला चल रहा था तो विधानसभा में अध्यक्ष के पद पर कोई नहीं था और उपाध्यक्ष से ही काम चलाया जा रहा था। परन्तु श्री नार्वेकर की टालमटोल की रणनीति की सर्वोच्च न्यायालय ने कड़ी आलोचना करते हुए टिप्पणी की है कि यदि वह सर्वोच्च न्यायालय के निर्देश की अनदेखी करते हैं तो फिर उसे स्वयं हस्तक्षेप करना पड़ेगा क्योंकि दल-बदल मामले की सुनवाई का मामला विधानसभा के भीतर की कार्यवाही का हिस्सा नहीं होता है। सर्वोच्च न्यायालय का यह कहना कि विधानसभा के अध्यक्ष को देश की सबसे बड़ी अदालत के निर्देशों के अनुसार विधायकों के मामले का फैसला एक निश्चित समय सीमा में करना चाहिए वरना फिर स्वयं न्यायालय को सीमा निर्धारित करनी पड़ेगी, बहुत मायने रखता है।
भारत के संविधान में चुने हुए सर्वोच्च सदनों जैसे विधानसभा या लोकसभा के अध्यक्षों को अपने-अपने सदनों के संरक्षक का दर्जा प्राप्त होता है और इनके सदस्यों के मामले में न्यायिक अधिकार भी प्राप्त होते हैं जिनमें न्यायालय हस्तक्षेप नहीं कर सकता। परन्तु महाराष्ट्र विधानसभा में शिवसेना की टूट-फूट को लेकर जो कुछ भी हुआ उसमे तत्कालीन राज्यपाल से लेकर सदन के पीठासीन अधिकारी भी शामिल हो गये थे। इस बारे में राज्यपाल की भूमिका पर सर्वोच्च न्यायालय ने पहले बहुत तीखी टिप्पणी की थी और कहा था कि उन्हें राजनैतिक दलों की भीतरी राजनीति में शामिल नहीं होना चाहिए था। लेकिन अब देखना यह होगा कि राहुल नार्वेकर सर्वोच्च न्यायालय की ताजा टिप्पणी को किस प्रकार से लेते हैं और अध्यक्ष के रूप में अपनी न्यायिक भूमिका किस प्रकार निभाते हैं। इस मामले की अगली सुनवाई अब 17 अक्तूबर को सर्वोच्च न्यायालय में होनी है। वैसे पहली नजर में यह जरूर कहा जा सकता है कि यदि किसी दल से अलग होने वाले विधायकों की संख्या तीन-चौथाई से कम होती है तो उनकी सदस्यता दल-बदल कानून के तहत समाप्त हो जानी चाहिए। मगर महाराष्ट्र में यह काम दो किश्तों में हुआ और इस प्रकार हुआ कि विधानसभा में शक्ति परीक्षण से पहले ही खुद मुख्यमन्त्री ने इस्तीफा दे दिया। इसके बावजूद सवाल संवैधानिक शुचिता का तो बनता ही है।
आदित्य नारायण चोपड़ा
Adityachopra@punjabkesari.com

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