नई दिशा देने वाला बजट

वित्तमन्त्री श्रीमती निर्मला सीतारमन द्वारा लोकसभा में रखा गया आगामी वित्त वर्ष 2026-27 का बजट वास्तव में एेतिहासिक बजट कहा जा सकता है क्योंकि इसमें भविष्य के भारत की तस्वीर का सपना संजोया गया है और 2047 तक विश्व व्यापार में भारत के दस प्रतिशत हिस्से की कल्पना की गई है। अतः यह जरूरी था कि वित्तमन्त्री बजट के माध्यम से एेसी अर्थव्यवस्था बनाने का सपना पालतीं जिसमें भारत के खेतों से लेकर अन्तरिक्ष तक के क्षेत्र में विकास की गंगा बहे और आने वाली पीढि़यों के लिए समृद्ध व विकसित भारत का मार्ग प्रशस्त हो सके। वास्तव में यह बजट दूरगामी आर्थिक लक्ष्यों को प्राप्त करने का एेसा दस्तावेज है जिसमें युवा पीढ़ी के सपनों को मूर्त रूप देने की कोशिश की गई है। इस सिलसिले में वित्तमन्त्री ने जिस प्रकार परमाणु ऊर्जा के क्षेत्र से लेकर कृत्रिम मेधा (आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस) तक के क्षेत्र में विभिन्न उपायों की व्यवस्था की है उससे यही साबित होता है कि भारत अब विश्व के मानचित्र पर अपनी विशिष्ट पहचान बनाने के मार्ग से पीछे नहीं हटेगा मगर इस लक्ष्य को तात्कालिक आवश्यकताओं की आपूर्ति किये बिना हासिल नहीं किया जा सकता है और इस सन्दर्भ में सबसे बड़ी चुनौती यह है कि 140 करोड़ की जनसंख्या वाले देश में रोजगार के साधनों में प्रचूरता आये।
इस दृष्टि से यह बजट घरेलू अर्थव्यवस्था के अार्थिक मानकों को मजबूती देने वाला कहा जायेगा क्योंकि इसमें ग्रामीण क्षेत्र से लेकर शहरी क्षेत्र तक में पूंजीनिवेश को बढ़ावा देने के उपाय किये गये हैं और साथ ही बदलते भारत की हकीकत को ध्यान में रखा गया है। इस मामले में वित्तमन्त्री ने मध्यम व औसत दर्जे के बढ़ते शहरों की संख्या को देखते हुए म्युनिसिपल बांड जारी करने की प्रथा को गति देने के लिए जो उपाय किये हैं वे इस तथ्य की ओर इंगित करते हैं कि 2030 तक भारत की 40 प्रतिशत आबादी के शहरों में बसने से जीवन की सहजता बरकरार रह सके। इसीलिए शायद सबसे ज्यादा जोर बजट में आम आदमी के जीवन को सुगम बनाने पर दिया गया है और पेचीदा आयकर के नियमों में इस प्रकार संशोधन किये गये हैं जिससे आयकर देने वाले लोगों के सिर से भारी सजा व जुर्माने का डर समाप्त हो सके। यह कदम देश में आयकरदाताओं की संख्या बढ़ाने में कारगर होगा और ईमानदारी के साथ कर जमा कराने वालों की संख्या में वृद्धि होगी।
बजट इस बात का भी सबूत है कि भारत सच्चे अर्थों में वैश्विक अर्थव्यवस्था का अंग बनने की दिशा में अग्रसर हो रहा है क्योंकि इसमें भारत में व्यापार करने वाले लोगों को सहज व सुगम वातावरण देने के व्यापक उपाय किये गये हैं। कुछ लोग इस बात की आलोचना कर सकते हैं। संसद में बजट पेश होते ही शेयर बाजार धड़ाम हो गया और इसमें भारी मुनाफा वसूली शुरू हो गई। एेसा मूलतः शेयरों की खरीद-फरोख्त पर लागू किये गये नये शुल्क नियमों की वजह से ही हुआ। इससे यही साबित होता है कि कार्पोरेट क्षेत्र ने बजट को आम गरीब व मध्यम वर्ग का बजट समझा। यह बजट एेसे समय में पेश किया गया है जबकि पूरा विश्व भारी उथल-पुथल के मुहाने पर बैठा हुआ है जिसके चलते आर्थिक मानक अस्थिर बने हुए हैं। अतः इस दौर में यदि भारत अपनी अर्थव्यवस्था के मानकों को जड़ से मजबूत बनाने के प्रयास करता है उससे इस देश को आत्मनिर्भर होने में मदद मिलेगी और आने वाली पीढि़यों का भविष्य उज्ज्वल होगा। आम आदमी के लिए यह बजट सबसे ज्यादा खुशी महंगाई के मोर्चे पर लेकर ही आया है। बजट में जो वित्तीय उपाय किये गये हैं और किसी भी क्षेत्र में शुल्क की वृद्धि नहीं की गई है उससे मुद्रास्फीति की दर काबू में रहेगी और आम उपभोक्ता सामग्री के दामों में वृद्धि नहीं होगी। श्रीमती निर्मला सीतारमन ने कुल साढे़ 53 लाख करोड़ का बजट पेश किया है। इसमें 35 लाख करोड़ से अधिक की राजस्व प्राप्तियां होंगी। इसलिए सरकार जरूरत पड़ने पर इसकी भरपाई बाजार से ऋण आदि लेकर करेगी। जरा कल्पना कीजिये जब 1947 में भारत आजाद हुआ था तो इसका कुल बजट (रेलवे के अलावा) केवल 259 करोड़  रुपए का था जो आज बढ़कर 53 लाख करोड़  रुपए ( रेलवे समेत) हो चुका है और इसकी आबादी 30 करोड़ से बढ़कर 140 करोड़ की हो चुकी है। जाहिर है कि इस दौरान हमने चहुंमुखी विकास किया है जिसकी वजह से आज भारत विश्व की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने की ओर अग्रसर है। मगर इस दौरान हम संरक्षित अर्थव्यवस्था से निकल कर बाजार मूलक अर्थव्यवस्था भी बन चुके हैं जिससे भारत की आर्थिक चुनौतियों में गुणात्मक अन्तर आया है। इन चुनौतियों में सबसे बड़ी चुनौती रोजगार की सृजन की होती है अतः वित्तमन्त्री ने मौजूदा बजट में सबसे ज्यादा जोर इसी पक्ष पर देते हुए बदलते युग की उत्पादन आवश्यकताओं पर बल दिया है और पर्यटन के क्षेत्र से लेकर आधुनिकतम उत्पादों के क्षेत्र में निवेश बढ़ाने के उपाय किये हैं। हमें यह भी समझना होगा कि भारत के उत्पादों की विश्व मांग बढ़ाने के लिए हमें जिला स्तर से लेकर राष्ट्रीय स्तर तक अपने उत्पादों की गुणवत्ता बढ़ानी होगी जिससे हम बदलते दौर के आयात-निर्यात कारोबार के प्रतिबन्धों के ढीला होने से अपनी जगह अपने बूते पर बना सकें। बेशक अब बजट का सम्बन्ध सीधे चीजों के सस्ता और महंगा होने से कटता जा रहा है क्योंकि इसके लिए पृथक जीएसटी की व्यवस्था है मगर आम आदमी के लिए बजट रोजी-रोटी के साधन बढ़ाने का जरिया बन चुका है क्योंकि बाजार मूलक अर्थव्यवस्था में सरकार का कर्त्तव्य एेसी नीतियों के निर्माण का होता जिनसे हर क्षेत्र में निवेश को बढ़ावा मिल सके और वह आधुनिकतम होता जाये। इस मोर्चे पर बजट आम भारतीय की अपेक्षाओं की आपूर्ति करता है।

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