अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की नीतियां भारत के लिए दोमुही सांप साबित हो रही हैं। एक तरफ अमेरिका भारत से ट्रेड डील पर वार्ता कर रहा है तो दूसरी तरफ वह नए-नए शुल्क लगा रहा है। जिसके चलते भारतीय अर्थव्यवस्था और उद्योग जगत में अनिश्चितता का वातावरण बना हुआ है। दरअसल ट्रंप की आर्थिक नीतियां शुल्कों के दायरे में घूम रही हैं। जो भू- राजनीतिक और अन्य मुद्दों पर काम करने का उनका पसंदीदा जरिया है। भू-राजनीति में दोस्ती की जुबान अक्सर ताकत के दांव-पेच को पर्दे के पीछे छुपा देती है। ट्रंप ऐसी ही नीति अपना रहे हैं। अब सवाल यह है कि ट्रंप के निशाने पर सीधे भारत है या फिर रूस या चीन।
भारत को लम्बे समय से अमेरिका अपना सामरिक साझेदार और चीन के विस्तारवाद के मुकाबले खड़ी मजबूत दीवार बताता रहा है लेकिन भारत अब उसकी दंडात्मक कार्रवाई के निशाने पर है। यह सबको हैरान कर देने वाला है। मामला न केवल व्यापार नीति का है, बल्कि वैश्विक शक्ति संतुलन में आ रहे बदलाव की गहरी दरार का भी संकेत देता है। अमेरिकी सीनेट ने रूस और उसके पैट्रोलियम उत्पादों के प्रमुख खरीदार देशों को दंडित करने वाले विधेयक को भारी बहुमत से पारित कर दिया है। सीनेट का दावा है कि रूस से तेल की खरीद यूक्रेन युद्ध को बढ़ावा दे रही है। इस विधेयक का नाम बदलकर लिंडसे ओ ग्राहम सैंक्शनिंग रूस एंड ईरान एक्ट ऑफ 2026 कर दिया गया है।
इसे अमेरिकी सीनेट ने 86-11 मतों से मंजूरी दी है। इससे भारत समेत कई देशों पर 100 प्रतिशत अमेरिकी टैरिफ की तलवार लटकने लगी है, जो रूस से तेल की खरीद करते हैं। सीनेट से पारित होने के बाद विधेयक को सदन में आगे बढ़ाने में देरी होगी, क्योंकि सदन में फिलहाल ग्रीष्मकालीन अवकाश चल रहा है। इस विधेयक के तहत राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प को रूस से तेल और गैस के शीर्ष पांच आयातकों से आने वाले सामानों पर 100 प्रतिशत टैरिफ लगाने की अनुमति मिल जाएगी।
इसके साथ ही यह विधेयक ईरान प्रतिबंध अधिनियम 1996 की वैधता अवधि को भी 2031 तक बढ़ा देगा, जिसके तहत ईरान के ऊर्जा क्षेत्र में निवेश करने वाली कंपनियों को दंडित किया जाता है। कूटनीतिक क्षेत्रों में यह सवाल उठाया जा रहा है कि ट्रंप ने रूस से तेल और गैस आयात करने वाले अन्य देशों को इस तरह निशाना क्यों नहीं बनाया। जबकि यूरोपीय देश खुद अमेरिका आज भी रूस से गैस आयात जारी रखे हुए है। सीनेट में पारित विधेयक पूरी तरह से भारत विरोधी है। अगर भारत रूस से तेल या गैस का आयात कम करता है तो इससे वैश्विक स्तर पर तेल की कीमतें बढ़ेंगी आैर चीन रूस से अधिक तेल खरीदने लगेगा।
अभी तक भारत रूस से लगातार तेल खरीद रहा है। जून-जुलाई में भारत ने रूस से तेल की खरीद में रिकार्ड बनाया है। जुलाई में भारत ने रूस से 28 लाख बैरल तेल प्रतिदिन खरीदा है जिससे अमेरिका चिढ़ा बैठा है। हाल ही में अमेरिका ने बंधुआ मजदूरी से निर्मित उत्पादों के मामले में भारत पर शुल्क लगाया है। भारत से होने वाले आयात पर 10 फीसदी शुल्क और लगेगा। यूएसटीआर ने पहले भारत पर 12.5 फीसदी शुल्क का प्रस्ताव रखा था किंतु बंधुआ मजदूरी से जुड़ा आयात रोकने के लिए जरूरी बदलाव होने के बाद अमेरिका ने शायद भारत के लिए शुल्क की दर कम कर दी।
बांग्लादेश, पाकिस्तान, श्रीलंका और यूनाइटेड किंगडम जैसे देशों पर भी 10 फीसदी शुल्क ही लागू रहेगा। चीन जैसे देशों को 12.5 फीसदी शुल्क के दायरे में रखा गया है और जापान, दक्षिण कोरिया जैसे कुछ देशों तथा यूरोपीय संघ आदि को सार्वधिक तरजीही देश की दर पर शुल्क देना होगा। अतिरिक्त क्षमता की जांच के बाद शुल्क लगा तो कुल दर जवाबी शुल्क के बराबर हो जाएगी। अमेरिका भारत के दवा उद्योग और पेटेंट कानूनों पर लगातार सवाल उठा रहा है। अमेरिकी कृषि और डेयरी उत्पादों के लिए भारतीय बाजार को खोलने के लिए लगातार दबाव भी बना रहा है। ट्रंप की अप्रवासन नीतियां भी भारतीय हितों पर कुठाराघात कर रही हैं।
अगर पाकिस्तान की बात करें तो अमेरिका उसके प्रति मूकदर्शक बना हुआ है। भारत ने मानवाधिकार उल्लंघन मामलों में लगातार ढिंढोरा पीटने वाला अमेरिका पीओके, ब्लूचिस्तान और सिंध में पाकिस्तानी सेना के नरसंहार पर खामोशी धारण किए हुए बैठा है। भारत की विदेश नीति स्वतंत्र है और वह अमेरिकी दबाव में नहीं आने वाला। ऊर्जा सुरक्षा के मामले में भारत-अमेरिकी उक्सावे में नहीं फंसा है। महत्वपूर्ण सवाल यह है कि भारत और अमेरिका एक हाथ से ले और दूसरे हाथ से दे वाली सौदेबाजी कब तक स्वीकार करता रहेगा।
अमेरिका को भारत जवाब दे तो किस तरह से दे। अमेरिका अपना भरोसा खो चुका है। भारत को उसे मुंहतोड़ जवाब देने के लिए लम्बी रेस पर दांव लगाना होगा। टैरिफ को कुंद करने के लिए भारत ने आसियान, अफ्रीका और यूरोपीय संघ के साथ संबंधों को विस्तार देकर निर्यात के नए केन्द्र तलाश लिए हैं। भारत को वैश्विक आपूर्ति शृंखलाओं में खुद को बेहतर विकल्प के रूप में पेश करना होगा और टुकड़ों में बटी दुनिया में लोकतांत्रिक देशों के साथ साझा सोच स्थापित करनी होगी।



Download Android App
Download iOS App




