पिछली सरकारों में एक समय ऐसा भी था कि भगोड़ों की पांचों उंगलियां घी में थीं, आज इस मोदी सरकार में सिर कढ़ाई में है। इस सरकार ने संगीन अपराध कर देश से भाग जाने वालों को वापस लाकर कानून के अनुसार सजा दिलाने के लिए 2018 में नया कानून बनाया था, तब से अब तक भारत ने विदेशों से प्रत्यर्पण कराने के मामले में एक नया रिकार्ड कायम किया है। पिछले छह साल में 274 भगोड़ों को अलग-अलग देशों से लाकर जेल में डालने का आंकड़ा बताता है कि बाहर जाकर छुपे अपराधियों के लिए दुनिया की कोई भी जगह सुरक्षित नहीं है।
कुछ साल पहले तक यह मान्यता थी कि भारत में नियम और कानून सिर्फ़ गरीबों के लिए होते हैं, अमीर तो सिस्टम की कमी का फायदा उठाकर बच निकलते हैं लेकिन मोदी-शाह के युग में यह कहावत बदल चुकी है। अपराधी कोई भी हो, उसे कानून के दायरे में आना ही होगा। उल्लेखनीय है कि भारत की प्रत्यर्पण प्रक्रिया में गृह मंत्रालय की एक बहुत बड़ी भूमिका है, बल्कि यह मुख्य समन्वयक और नोडल एजेंसी है। गृह मंत्रालय ही राज्य पुलिस और सीबीआई जैसी सरकारी संस्थाओं को अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं से जोड़ता है।
यह मंत्रालय ही कानूनी दस्तावेज़ों (डोसियर) को तैयार करवाता है और अपराधियों को बाहर के देशों से लाने के लिए रणनीति बनाता है। विदेशी समकक्षों के साथ प्रत्यर्पण से जुड़े दस्तावेज़ों के आदान-प्रदान के लिए भी अधिकारियों का चयन गृह मंत्रालय ही करता है। प्रत्यर्पण का औपचारिक अनुरोध भेजने से पहले, भगोड़े अपराधियों के खिलाफ इकट्ठा किए गए कानूनी और जांच संबंधी सबूतों का आंकलन और सत्यापन भी इसी मंत्रालय से होता है। प्रत्यर्पण का सारा दारोमदार इन्हीं सबूतों और दस्तावेजों पर होता है। गृहमंत्री ही इंटरपोल जैसे वैश्विक नेटवर्क की निगरानी करते हैं। अलर्ट व ट्रैकिंग को तेज करने के लिए मंत्रालय ने भारतपोल नाम का एक प्लेटफॉर्म तैयार किया है।
गृह मंत्री अमित शाह की विशेष कार्य पद्धति का उदाहरण यह एक रिकार्ड है कि पिछले पांच साल में मोदी सरकार ने विभिन्न विदेशी सरकारों को 137 प्रत्यर्पण अनुरोध भेजे, जिनमें 134 अनुरोधों को बाहर के देशों ने स्वीकार कर लिया है। गृह मंत्रालय के जरिए 2019 से हाल तक 36 अलग-अलग देशों से भगोड़े अपराधियों को अपने यहां लाया गया। इन अपराधियों में वित्तीय अपराध एवं धोखाधड़ी के अलावा हत्या, डकैती, यौन अपराध, बच्चों के खिलाफ यौन अपराध, संगठित आपराध, मानव तस्करी, आतंकवाद, ड्रग्स तस्करी, नकली मुद्रा कारोबार से जुड़े लोग थे।
केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के नेतृत्व में ही इंटरपोल के साथ भारत का जुड़ाव अब नए वैश्विक सहयोग का प्रतीक बन गया है। भारतपोल पोर्टल के माध्यम से राज्य पुलिस और केंद्रीय एजेंसियों को सीधे इंटरपोल के ग्लोबल नेटवर्क से जुडने का अवसर मिल रहा है। पहले सिर्फ़ सीबीआई ही इन्टरपोल के संपर्क में रहता था। भारतपोल प्लेटफ़ॉर्म से इस समय 1400 से ज़्यादा राज्य और केंद्रीय कानून प्रवर्तन की इकाइयां जुड़ी हुईं हैं। इससे अपराधियों की ट्रैकिंग और जानकारी आसान और वास्तविक समय से हो जाती है। अब 3 से 20 दिन के अंदर क्रिमिनल्स की सारी गतिविधियां प्लेटफॉर्म पर आ जाती हैं और उनके प्रत्यर्पण की कारवाई शुरू हो जाती है। अब आरोपी की गैर-मौजूदगी में भी मुकदमे की प्रक्रिया चलती रहती है।
2014 से पहले भारत की केवल 37 देशों के साथ प्रत्यर्पण संधियां थीं। इस समय लगभग 60 देशों के साथ भारत प्रत्यर्पण संबंधी समझौते के साथ काम कर रहा है। तब औसतन हर साल केवल चार भगोड़ों का प्रत्यर्पण हो पाता था। अधूरे डॉक्यूमेंटेशन और कमजोर पैरवी के कारण अक्सर विदेशी अदालतें प्रत्यर्पण के अनुरोध को ठुकरा देती थीं। कानूनी मुश्किलों का भी देश को सामना करना पड़ता था। 2004 से 2014 तक विदेशी सरकारों के जरिए भारत में केवल 62 भगोड़ों का ही प्रत्यर्पण कराया गया था, जबकि अर्जियां प्रत्यर्पण की 121 अर्जियां लंबित थीं। 2019 के बाद से भारत ने भगोड़े अपराधियों को वापस लाने के काम में खूब तेज़ी आई है।
पहले गृह मंत्रालय और अन्य विभागों में भी समन्वय की भारी कमी थी, लेकिन गृह मंत्री अमित शाह ने सभी को एक प्लेटफॉर्म पर लाकर प्रत्यर्पण की सारी रुकावटें खत्म कर डाली हैं। गृह मंत्री ने स्पष्ट कहा है कि भगोड़ों को देश में लाकर सजा दिलवाना उनकी राष्ट्रीय प्राथमिकता है। मोदी सरकार ने इसके लिए तीन मंत्र दिए हैं -ग्लोबल आउटरीच बढ़ाना, गृह मंत्रालय के अंतर्गत मज़बूत कोऑर्डिनेशन तैयार करना और स्मार्ट डिप्लोमैसी नीति को आगे बढ़ाना। इस समय भगोड़े अपराधियों को भारत वापस लाने का काम मिशन मोड पर है।
प्रत्यर्पण के ये रिकॉर्ड केवल आकड़े भर नहीं हैं, बल्कि मजबूत घरेलू कानून, बाहर के देशों के साथ सहयोग के द्विपक्षीय समझौते और विश्वसनीय भू-राजनीतिक गठबंधन के भी सबूत हैं। अब भोगोड़ों को अब बाहर शरण नहीं मिल रहे हैं। कम ही देश ऐसे हैं जो सैद्धांतिक मतभेदों के आधार पर प्रत्यर्पण में रुकावट डाल रहे हैं। इसमें पाकिस्तान मुख्य रूप से शामिल है। कुछ हद तक अमेरिका, कनाडा और यूके भी मानवधिकार के नाम प्रत्यर्पण में आनाकानी करते हैं।
जर्मनी, फ्रांस और स्विट्जरलैंड जल्दी अपने नागरिकों को किसी और देश में प्रत्यर्पित नहीं करते, क्योंकि इन देशों ने राष्ट्रीयता संबंधी प्रतिबंध लगा रखे हैं।
गंभीर अपराध के होने पर भी उनकी सरकार उन्हें प्रत्यर्पित करने से इनकार कर देती है। पहले अपराधियों को यूएई एक सुरक्षित ठिकाना लगता था, लेकिन मोदी सरकार ने यूएई के साथ एक मजबूत संबंध स्थापित कर हाल के वर्षों में कई अपराधियों को देश में लाने में बड़ी सफलता हासिल की है। इस साल ही तीन बड़े आर्थिक अपराधियों का वहाँ से प्रत्यर्पण कराया गया। गणेश ज्वैलरी हाउस के प्रमोटर,कमलेश पारेख ने 25 बैंकों के साथ हज़ारों करोड़ की धोखाधड़ी की थी, उसे इस साल मई में यूएई से लाया गया।
मोहम्मद नवाज़ कक्कट इस्माइल, जालसाज़ी, जबरन वसूली का मुजरिम था उसे अभी कुछ ही दिन पहले भारत लाया गया। गौरव हरियाणा में संगठित अपराध सिंडिकेट चलता था, वह भी पुलिस से बचने के लिए यूएई में छुपा था, उसका भी हाल ही में प्रत्यर्पण कराया गया। इसके अलावा बड़े पैमाने पर मनी लॉन्ड्रिंग करने वाले हर्षित बाबूलाल जैन को भी वहां से डिपोर्ट कराया गया है।



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