अमेरिकी शुल्क का डर !

Summary :

अमेरिका जिस तरह विश्व व्यवस्था (वर्ल्ड आर्डर) को अपने पक्ष में झुकाये जाने पर आमादा दिखता है उससे यही सन्देश जा रहा है कि उसने द्वितीय विश्व युद्ध के बाद पूरी दुनिया के शक्ति क्रम में आये बदलाव का कोई संज्ञान नहीं लिया है और वह संसार के विभिन्न आय व प्राकृतिक स्रोतों के दोहन पर अपना एकाधिकार चाहता है। 1990 में सोवियत संघ के टूट कर 14 देशों में बिखर जाने के बाद जिस प्रकार पूरी दुनिया में आर्थिक उदारीकरण के आवरण में पूंजीवाद की हवा बही उससे एक बारगी एेसा लगा कि पूरा विश्व एकल ध्रुवीय होकर रह…

अमेरिका जिस तरह विश्व व्यवस्था (वर्ल्ड आर्डर) को अपने पक्ष में झुकाये जाने पर आमादा दिखता है उससे यही सन्देश जा रहा है कि उसने द्वितीय विश्व युद्ध के बाद पूरी दुनिया के शक्ति क्रम में आये बदलाव का कोई संज्ञान नहीं लिया है और वह संसार के विभिन्न आय व प्राकृतिक स्रोतों के दोहन पर अपना एकाधिकार चाहता है। 1990 में सोवियत संघ के टूट कर 14 देशों में बिखर जाने के बाद जिस प्रकार पूरी दुनिया में आर्थिक उदारीकरण के आवरण में पूंजीवाद की हवा बही उससे एक बारगी एेसा लगा कि पूरा विश्व एकल ध्रुवीय होकर रह जायेगा जिसका सिरमौर अमेरिका होगा परन्तु इस आर्थिक बदलाव में जिस प्रकार साम्यवादी देशों रूस व अमेरिका ने खुद को ढाला उससे इन देशों में प्रजातान्त्रिक व्यवस्था न होने के बावजूद सरकारी संरक्षण में पूंजीवाद को बढ़ावा मिला और ये देश भी अपनी-अपनी अर्थव्यवस्थाओं में व्यक्तिगत पूंजी निर्माण की दिशा में आगे बढ़ने लगे। इसमें चीन ने बहुत तेज चाल चली और वह प्रारम्भ में विश्व व्यापार संगठन का सदस्य बनने के बाद दुनिया का सबसे बड़ा उत्पादन केन्द्र बनने की ओर अग्रसर हुआ और 21वीं सदी में दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थ व्यवस्था बन बैठा और सामरिक क्षेत्र में भी अमेरिका का मुकाबला करने की होड़ में शामिल हो गया जबकि रूस पहले से ही इस क्षेत्र में अमेरिका के सामर्थ्य के समानान्तर था। अतः यह बेवजह नहीं था कि 2006 में अमेरिकी शहर न्यूयार्क में ही राष्ट्रसंघ के साधारण अधिवेशन की बैठक की प्रतिछाया में रूस, चीन, भारत व ब्राजील के विदेश मन्त्रियों ने आपसी बातचीत के बाद ब्रिक संगठन के गठन का फैसला लिया जिससे एकल विश्व को संगठित प्रयासों से बहु ध्रुवीय किया जा सके।
बाद में इसमें दक्षिण अफ्रीका के भी शामिल होने के बाद यह ब्रिक्स बन गया और 2025 के आते-आते ब्रिक्स संगठन के देशों की संख्या 11 हो गई जिनमें ईरान भी शामिल हो गया। मगर 2025 में ही परमाणु अस्त्र होने की आशंका के आधार पर अमेरिका व इजराइल ने जिस प्रकार ईरान के विरुद्ध 12 दिवसीय युद्ध किया उससे यह स्पष्ट हो गया कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की नजर इस देश के विपुल कच्चे पैट्रोलियम तेल भंडार पर है और वह इसे बूते पर ईरान को अपनी आर्थिक क्षमता बढ़ाने का अवसर नहीं देना चाहते। हालांकि 1979 में ही जब ईरान में शहंशाह रजा पहलवी के शासन का तख्ता पलट कर इस्लामी क्रान्ति हुई थी तो अमेरिका ने भविष्य की इसी आशंका के चलते ईरान पर विभिन्न आर्थिक प्रतिबन्ध थोप दिये थे परन्तु इसके बाद रूस व चीन ने ईरान की तरफ आर्थिक सहयोग का हाथ बढ़ाया और इजराइल के इसके प्रति दुश्मनी के रवैये को देखते हुए सामरिक क्षेत्र में भी इसकी सैनिक क्षमता बढ़ाने में सहयोग किया किन्तु 2023 में जिस प्रकार सोवियत संघ से ही अलग हुए रूस से लगे देश यूक्रेन ने पश्चिमी देशों के सामरिक संगठन ‘नाटो’ की सदस्यता ग्रहण करने की चाल चली, उससे रूस क्रुद्ध हो गया और उसने इसके खिलाफ सैनिक संघर्ष छेड़ दिया जो कि अभी भी जारी है। इससे अमेरिका को रूस के विरुद्ध सीधे अभियान छेड़ने का अवसर मिला क्योंकि नाटो संगठन पश्चिमी यूरोपीय देशों का एेसा सामरिक समूह है जो अमेरिका के रहमो-करम पर ही चलता है।
अतः अमेरिका ने रूस पर भी आर्थिक प्रतिबन्ध लगाने चालू किये जिन्हें चालू वर्ष 2026 में अमेरिका और कड़े करना चाहता है और उसके साथ ईरान को भी रख कर पूरी दुनिया में इन्हें अलग-थलग करना चाहता है। (ईरान से उसका युद्ध अभी भी चल रहा है) इस मामले में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प सनकी समझे जाते हैं परन्तु उनकी नीति को अमेरिकी सकल नीति से अलग रख कर नहीं देखा जा सकता है क्योंकि रूस व ईरान के मामले में अमेरिका की दोनों प्रमुख डेमोक्रेटिक व रिपब्लिकन पार्टियों का रुख लगभग एक जैसा ही है। इसका प्रमाण यह है कि अमेरिकी संसद के दोनों सदनों में यह प्रस्ताव बहुमत से पारित हुआ जिसमें विपक्षी डेमोक्रेटिक पार्टी के भी कुछ सांसदों ने प्रस्ताव के पक्ष में मत दिया। प्रस्ताव में कहा गया है कि रूस से दुनिया का जो भी देश तेल या गैस खरीदेगा उसके माल पर अमेरिका 100 प्रतिशत आयात शुल्क लगायेगा। जबकि ईरान से तेल खरीदने पर अमेरिका ने पहले से ही प्रतिबन्ध लगाया हुआ है। इसका सबसे बड़ा असर चीन व भारत पर पड़ेगा। चीन अमेरिका को भारी मात्रा में आधुनिक सामान निर्यात करता है जबकि भारत भी पारंपरिक इजीनियरिंग सामान से लेकर कपड़ा व हीरे-जवाहरात आभूषणों आदि का निर्यात करता है जिससे भारत के पक्ष में व्यापार सन्तुलन 400 अरब डालर से अधिक का बैठता है।
भारत के लिए अमेरिका बहुत बड़ा बाजार है जिसके बन्द होने का जाहिराना तौर पर भारत पर विपरीत असर पड़ेगा किन्तु पेंच यह है कि अमेरिका व भारत के बीच व्यापार समझौता होने वाला है जिसकी फौरी शर्तों के अनुसार भारत अमेरिका से पांच सालों में 500 अरब डालर का आयात करेगा। इस आयात में कुछ कृषि उत्पाद भी शामिल हैं जिसका विरोध भारत की विपक्षी पार्टियां कर रही हैं। अतः अमेरिका के लिए भी भारत एक आकर्षक बाजार है जबकि दूसरी ओर भारत रूस से कच्चा तेल भी खरीदता आ रहा है। फिलहाल भारत रूस से अपने कुछ आयातित तेल की 50 प्रतिशत के लगभग आपूर्ति कर रहा है। क्योंकि दोनों देशों के बीच एेतिहासिक रूप से बहुत घनिष्ठ व दोस्ताना सम्बन्ध रहे हैं। पूरी दुनिया में रूस ही भारत का पक्का व परखा हुआ सच्चा मित्र समझा जाता है। अतः अमेरिकी संसद द्वारा रूस व ईरान से तेल खरीदने वाले देशों पर 100 प्रतिशत आयात शुल्क लगाने को मंजूरी मिल जाने के बाद यह सिद्ध होता है कि रूस व ईरान के मामले में अमेरिका में लगभग राजनैतिक मतैक्य है परन्तु भारत के साथ अपने सम्बन्धों को देखते हुए डोनाल्ड ट्रम्प को यह सोचना होगा कि इसका भारत के साथ अभी व्यापार समझौता होना है जिसमें यह भारत पर कोई एेसी शर्त नहीं लाद सकता जिससे इसकी संप्रभुता से समझौता होता हो। भारत किस देश के साथ व्यापार करे और किसके साथ न करे, यह उसका विशिष्ट निजी मामला है, हालांकि 2019 से भारत ईरान से तेल नहीं खरीद रहा है और यह फैसला अमेरिकी दबाव की वजह से ही हुआ था परन्तु हाल ही में जिस तरह नई दिल्ली में हुए ब्रिक्स देशों के शिखर सम्मेलन में इसके सदस्य देशों ने आपसी कारोबार को मजबूत करने का अहद किया है और फिलिस्तीन के प्रति अपने रुख को स्पष्ट किया है उससे साफ हो गया है कि भारत पर अमेरिकी दबाव कारगर नहीं होगा अतः अमेरिका को 100 प्रतिशत शुल्क मामले में भारत को छूट देनी ही होगी परन्तु भारत को इसके लिए कड़ी कूटनीतिक मशक्कत करनी होगी क्योंकि अमेरिकी संसद में पारित प्रस्ताव लागू करने का अधिकार अब राष्ट्रपति ट्रम्प के हाथ में है।

Aditya Chopra

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