पाकिस्तान का सिख श्रद्धालुओं की आस्था से खिलवाड़ करने का कथित घटनाक्रम एक बार फिर यह सोचने पर मजबूर करता है कि आखिर धार्मिक आस्था को राजनीति और भारत विरोध की मानसिकता से कब तक जोड़ा जाता रहेगा। भारत मोहब्बत का हाथ बढ़ाता रह जाता है लेकिन पाकिस्तान की नफरत की दीवारें ऐसी हैं कि टूटने का नाम ही नहीं लेती। भारत ने हमेशा इंसानियत, धार्मिक स्वतंत्रता और श्रद्धा का सम्मान करते हुए हाथ बढ़ाया हो, पाकिस्तान की ओर से बार-बार ऐसे घटनाक्रम सामने आते हैं जो दोनों देशों के बीच अविश्वास और कटुता को और गहरा करते हैं। दुर्भाग्यपूर्ण बात यह है कि इस कटुता का निशाना इस बार वह सिख श्रद्धालु बने जिनका उद्देश्य राजनीति, विवाद और न ही किसी देश के खिलाफ कोई अभियान का था। वह तो केवल अपने गुरुओं के पवित्र स्थानों पर माथा टेकने और अरदास करने के लिए भारत आना चाहते थे। जानकारी के अनुसार भारत सरकार ने 104 श्रद्धालुओं को भारत आने के लिए वीजा जारी किए थे और इनमें से 92 श्रद्धालु भारत स्थित ऐतिहासिक गुरुद्वारा साहिबानांे, श्री दरबार साहिब और श्री हेमकुंड साहिब के दर्शन के लिए रवाना होने वाले थे लेकिन फैसलाबाद एयरपोर्ट पर उड़ान से ठीक पहले कथित तौर पर एनओसी की मांग रख दी गई।
यह घटना केवल एक उड़ान रुकने की नहीं है। यह उस मानसिकता पर गंभीर प्रश्न खड़ा करती है जिसमें धार्मिक यात्रा तक को राजनीतिक नियंत्रण और भारत विरोधी सोच से जोड़ दिया जाता है। यदि सिख श्रद्धालु अपने गुरु के पवित्र स्थान के दर्शन के लिए जा रहे हैं तो उन्हें रोकने की जरूरत आखिर क्यों पड़ी? क्या उनकी श्रद्धा भी पाकिस्तान की राजनीतिक व्यवस्था के लिए खतरा बन गई है? यां फिर पाकिस्तानी हकूमत को यह डर सताने लगा था कि जिस प्रकार वह भारतीय श्रद्धालुओं के वहां पहुंचने पर उन्हें नफरती सामग्री परोसते हैं कहीं भारत में भी ऐसा कुछ न हो जाए। दिल्ली सिख गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी की ओर से भी इन श्रद्धालुओं के लिए एयरपोर्ट से लाने, रहने और लंगर सहित सुविधाओं की व्यवस्था की गई थी। यानी भारत में इन श्रद्धालुओं के स्वागत की तैयारी थी, उनके लिए सेवा की भावना थी और उनके धार्मिक उद्देश्य का सम्मान था। ऐसे में यदि उन्हें भारत आने से रोका गया तो यह सवाल और भी गंभीर हो जाता है कि आखिर किसके आदेश पर और किस उद्देश्य से यह सब किया गया। इस प्रकरण से जुड़े कुछ ऐसे आरोप भी सामने आ रहे हैं जिन्हें नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। कथित तौर पर श्रद्धालुओं से भारत विरोधी वीडियो बनाने के लिए कहा गया और उन्होंने ऐसा करने से इनकार कर दिया। यदि यह आरोप सत्य है तो यह बेहद गंभीर विषय है। किसी धार्मिक यात्री को उसकी इच्छा के विरुद्ध किसी देश के खिलाफ प्रचार सामग्री तैयार करने के लिए दबाव में लाना धार्मिक स्वतंत्रता और मानवीय गरिमा दोनों पर प्रश्नचिह्न है, हालांकि इस आरोप की स्वतंत्र पुष्टि आवश्यक है लेकिन पाकिस्तान सरकार को स्वयं आगे आकर इस पर स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए। चुप्पी ऐसे सवालों को और मजबूत ही करती है।
पाकिस्तान गुरुद्वारा कमेटी के अध्यक्ष रमेश सिंह अरोड़ा और एटीपीपी बोर्ड के डिप्टी डायरेक्टर सहित अन्य संबंधित अधिकारियों की भूमिका पर भी सवाल उठ रहे हैं। यदि श्रद्धालुओं की यात्रा बाधित हुई तो क्या इन संस्थाओं ने उनकी मदद करने का प्रयास किया? क्या उन्होंने पाकिस्तान सरकार या संबंधित अधिकारियों के सामने श्रद्धालुओं की आवाज उठाई? क्या उन्हें पहले से एनओसी की कथित मांग की जानकारी थी? यदि थी तो श्रद्धालुओं को अंतिम समय तक अंधेरे में क्यों रखा गया? और यदि जानकारी नहीं थी तो धार्मिक यात्राओं के प्रबंधन की जिम्मेदारी निभाने वाली संस्थाओं की कार्यप्रणाली पर सवाल क्यों न उठें? यहां भारत सरकार से भी एक असहज लेकिन जरूरी सवाल पूछा जाना चाहिए, यदि पाकिस्तान में भारतीय श्रद्धालुओं की धार्मिक यात्राओं के साथ इस तरह की बाधाएं खड़ी होती हैं तो क्या भारत को अपनी मौजूदा वीजा और धार्मिक यात्रा नीति पर पुनर्विचार नहीं करना चाहिए?
पंथक नेताआंे की मर्यादा सीमा आखिर कौन तय करेगा?: गुरुद्वारों के प्रबंधन को व्यवस्थित ढंग से चलाने के लिए गुरुद्वारा कमेटियों का गठन किया जाता है। शिरोमणि गुरुद्वारा कमेटी, दिल्ली गुरुद्वारा कमेटी, हरियाणा कमेटी सहित देशभर में अनेक छोटी-बड़ी गुरुद्वारा कमेटियां हैं जिनमें संगत द्वारा चुने गए प्रतिनिधि गुरुद्वारों की सेवा और प्रबंधन की जिम्मेदारी संभालते हैं। चुनाव के दौरान एक-दूसरे के खिलाफ आरोप-प्रत्यारोप, राजनीतिक मतभेद और तीखी बयानबाजी होना कोई असामान्य बात नहीं है लेकिन सवाल यह है कि क्या यह राजनीतिक संघर्ष चुनाव समाप्त होने के बाद भी जारी रहना चाहिए? दरअसल, चुनाव का उद्देश्य सत्ता हासिल करना नहीं, बल्कि संगत की सेवा के लिए जिम्मेदार लोगों का चयन करना होना चाहिए लेकिन दुर्भाग्य से आज तस्वीर इसके विपरीत दिखाई देती है।
पाकिस्तान का सिख श्रद्धालुओं की आस्था से खिलवाड़
Summary :
पाकिस्तान का सिख श्रद्धालुओं की आस्था से खिलवाड़ करने का कथित घटनाक्रम एक बार फिर यह सोचने पर मजबूर करता है कि आखिर धार्मिक आस्था को राजनीति और भारत विरोध की मानसिकता से कब तक जोड़ा जाता रहेगा। भारत मोहब्बत का हाथ बढ़ाता रह जाता है लेकिन पाकिस्तान की नफरत की दीवारें ऐसी हैं कि टूटने का नाम ही नहीं लेती। भारत ने हमेशा इंसानियत, धार्मिक स्वतंत्रता और श्रद्धा का सम्मान करते हुए हाथ बढ़ाया हो, पाकिस्तान की ओर से बार-बार ऐसे घटनाक्रम सामने आते हैं जो दोनों देशों के बीच अविश्वास और कटुता को और गहरा करते हैं। दुर्भाग्यपूर्ण…


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