एक और समिट

Summary :

जब तक नरेंद्र मोदी ने भारत के प्रधानमंत्री का पद नहीं संभाला था, तब तक देश में होने वाले अंतर्राष्ट्रीय आयोजन, शिखर सम्मेलन और वैश्विक सम्मेलन आम भारतीयों की नजरों से प्रायः ओझल ही रहते थे। लोग अपने रोजमर्रा के कामकाज में व्यस्त रहते और इनमें से कई आयोजनों के बारे में या तो उन्हें जानकारी नहीं होती थी या फिर वे इनके घटनाक्रम में कोई विशेष रुचि नहीं रखते थे। मोदी सरकार के दौर में तस्वीर कुछ बदली है। लोगों की उदासीनता भले ही बरकरार हो लेकिन इन आयोजनों से अनजान रहना अब आसान नहीं है। इसकी दो प्रमुख…

जब तक नरेंद्र मोदी ने भारत के प्रधानमंत्री का पद नहीं संभाला था, तब तक देश में होने वाले अंतर्राष्ट्रीय आयोजन, शिखर सम्मेलन और वैश्विक सम्मेलन आम भारतीयों की नजरों से प्रायः ओझल ही रहते थे। लोग अपने रोजमर्रा के कामकाज में व्यस्त रहते और इनमें से कई आयोजनों के बारे में या तो उन्हें जानकारी नहीं होती थी या फिर वे इनके घटनाक्रम में कोई विशेष रुचि नहीं रखते थे। मोदी सरकार के दौर में तस्वीर कुछ बदली है। लोगों की उदासीनता भले ही बरकरार हो लेकिन इन आयोजनों से अनजान रहना अब आसान नहीं है। इसकी दो प्रमुख वजहें हैं। पहली मोदी सरकार हर अंतर्राष्ट्रीय आयोजन को बड़े स्तर का आयोजन बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ती। दूसरी, प्रधानमंत्री मोदी ऐसे आयोजनों के माध्यम से भारत की छवि और उसकी बढ़ती वैश्विक भूमिका को प्रमुखता से सामने रखना चाहते हैं, जिसका असर आम जनजीवन तक दिखाई देता है। यातायात मार्गों में बदलाव से लेकर कई प्रमुख संस्थानों के बंद रहने तकए ऐसे आयोजन शहर की सामान्य रफ्तार को प्रभावित करते हैं। हाल ही में नई दिल्ली में संपन्न हुए ब्रिक्स शिखर सम्मेलन का उदाहरण लिया जा सकता है। सम्मेलन के मद्देनजर पूरी राजधानी में कड़ी सुरक्षा व्यवस्था लागू की गई और यातायात पर कई तरह की पाबंदियां लगाई गईं।
आयोजन से पहले राजधानी में बुनियादी ढांचे से जुड़े कई बदलाव और विकास कार्य किए गए थे। मोदी सरकार ने यह सुनिश्चित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी कि सम्मेलन अपने निर्धारित उद्देश्यों को पूरा करने के साथ-साथ भारतीय संस्कृति, परंपरा और आतिथ्य को भी दुनिया के सामने प्रभावी ढंग से प्रस्तुत करे। अब लौटते हैं इस वर्ष भारत में आयोजित ब्रिक्स शिखर सम्मेलन पर जिसमें चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग और रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन समेत कई प्रमुख देशों के नेता शामिल हुए।
ब्रिक्स के बढ़ते महत्व को रेखांकित करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि यह समूह अब ‘परिपक्वता के दौर’ में पहुंच चुका है। उन्होंने वैश्विक दक्षिण के देशों से आह्वान किया कि वे केवल दूसरे देशों द्वारा बनाए गए नियमों को स्वीकार करने के बजाय वैश्विक व्यवस्था के नियम-निर्माता बनने की दिशा में आगे बढ़ें। मोदी ने इस बात पर भी जोर दिया कि ब्रिक्स को केवल पश्चिम विरोधी परियोजना के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।
उन्होंने कहा-​ब्रिक्स किसी के खिलाफ नहीं है। साथ ही उन्होंने वैश्विक शासन व्यवस्था को आकार देने में वैश्विक दक्षिण की बड़ी भूमिका की वकालत की। मोदी के शब्दों में -इसके बजाय, हमारा प्रयास सबको साथ लेकर आगे बढ़ने का है। नेताओं ने मध्य-पूर्व में लगातार बढ़ते तनाव पर ‘गहरी चिंता’ व्यक्त की और सभी पक्षों से ‘अधिकतम संयम’ बरतने का आह्वान किया। उन्होंने देशों से ऐसे कदम उठाने से बचने को कहा जो स्थिति को और गंभीर बना सकते हैं। हालांकि बयान में अमेरिका, इजरायल, ईरान या खाड़ी देशों का स्पष्ट रूप से उल्लेख नहीं किया गया।
यूक्रेन युद्ध भी ब्रिक्स के भीतर तनाव का एक अन्य मुद्दा बना हुआ है, खासकर इसलिए क्योंकि रूस इस समूह के संस्थापक सदस्यों में शामिल है। शी जिनपिंग ने कहा कि ब्रिक्स देशों को अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्था को अधिक ‘समानता और न्याय’ की दिशा में ले जाने में मदद करनी चाहिए। वहीं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वैश्विक दक्षिण से नियमों को केवल स्वीकार करने वाले पक्ष से आगे बढ़कर ‘नियमों को आकार देने वाले’ पक्ष की भूमिका निभाने का आह्वान किया। मोदी ने शिखर सम्मेलन में कहा-हमें विशेषाधिकारों की इस पिरामिडनुमा व्यवस्था को साझेदारी के मंच में बदलना होगा।
ब्रिक्स के सदस्य देश दुनिया की करीब आधी आबादी का प्रतिनिधित्व करते हैं और वैश्विक सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में लगभग 40 प्रतिशत हिस्सेदारी रखते हैं। दो दिन चले इस शिखर सम्मेलन में 12 देशों के नेता, हजारों प्रतिनिधि और दर्जनों कार्यक्रम शामिल हुए। सम्मेलन का समापन सर्वसम्मति से एक संयुक्त घोषणापत्र अपनाए जाने के साथ हुआ। इस सम्मेलन की एक प्रमुख उपलब्धि यह रही कि सभी 11 सदस्य देश संयुक्त घोषणापत्र पर सहमत हुए। यह सहमति ऐसे समय में बनी जब दुनिया कई संघर्षों और बढ़ते भू-राजनीतिक तनावों का सामना कर रही है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी इन दो दिनों के दौरान 15 से अधिक देशों के नेताओं के साथ द्विपक्षीय बैठकें कीं। इनमें रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन, चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग और ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियन प्रमुख रहे।
शी जिनपिंग ने कई वर्षों के अंतराल के बाद भारत का दौरा किया। 12 सितंबर की शाम उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ बैठक की। दोनों नेताओं ने भारत-चीन सीमा विवाद के लिए निष्पक्ष, तर्कसंगत और दोनों पक्षों को स्वीकार्य समाधान की आवश्यकता दोहराई। शी जिनपिंग के साथ अपनी तस्वीर साझा करते हुए प्रधानमंत्री मोदी ने लिखा -हमने भारत-चीन संबंधों के सभी पहलुओं की समीक्षा की। इस बैठक के महत्व का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि 2020 में गलवान घाटी में हुई झड़प के बाद शी जिनपिंग पहली बार भारत आए। उस संघर्ष के बाद दोनों देशों ने सीमा पर बड़ी संख्या में सैनिकों और हथियारों की तैनाती करते हुए सैन्य जमावड़ा बढ़ा दिया था।
पुतिन के साथ बैठक में प्रधानमंत्री मोदी और रूसी राष्ट्रपति ने व्यापार, रक्षा और ऊर्जा से जुड़े मुद्दों पर चर्चा की। पुतिन ने यूक्रेन युद्ध के शांतिपूर्ण समाधान की दिशा में भारत और प्रधानमंत्री मोदी के कूटनीतिक प्रयासों के लिए भी आभार व्यक्त किया।
तो बड़ी तस्वीर क्या है ?
बड़ी तस्वीर यह है कि तीन प्रमुख गैर-पश्चिमी शक्तियां भारत, चीन और रूस लगातार एक ही कूटनीतिक मंच पर साथ दिखाई दे रही हैं। भारत के लिए इसका अर्थ यह है कि उसकी विदेश नीति केवल अमेरिका और यूरोप तक सीमित नहीं है और उसके पास सहयोग तथा कूटनीतिक संबंधों के लिए अन्य विकल्प भी मौजूद हैं। ब्रिक्स देश सीमापार व्यापार में अमेरिकी डॉलर पर अपनी निर्भरता कम करने के तरीकों पर भी चर्चा करते रहे हैं। इन तमाम बारीकियों और महत्वपूर्ण मुद्दों से इतर एक पहलू यह भी है कि ऐसे शिखर सम्मेलनों के दौरान प्रधानमंत्री मोदी और दुनिया के विभिन्न नेताओं के बीच व्यक्तिगत स्तर पर संवाद और संपर्क देखने को मिलता है। इसका एक उदाहरण तब सामने आया, जब मोदी और पुतिन भारत मंडपम परिसर में एक ही कार में साथ यात्रा करते नजर आए।
इसके अलावा, प्रधानमंत्री ने भारत की स्वदेशी डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना (डीपीआई) को दुनिया के सामने प्रस्तुत करने पर भी जोर दिया। इसके तहत यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस (यूपीआई) आधार आधारित डिजिटल पहचान सत्यापन, ओपन नेटवर्क फॉर डिजिटल कॉमर्स (ओएनडीसी) और कोविन तथा आयुष्मान भारत जैसे स्वास्थ्य क्षेत्र के डिजिटल मॉडल की कार्यप्रणाली को प्रदर्शित किया गया।
भारत ने औपचारिक रूप से ​ब्रिक्स डीपीआई रिपॉजिटरी की शुरुआत भी की। इसके माध्यम से भारत ने अपनी मुक्त-स्रोत, मॉड्यूलर डिजिटल सार्वजनिक तकनीकों को सदस्य देशों और साझेदार देशों के लिए बिना किसी लाइसेंस शुल्क के उपलब्ध कराने की पहल की। लेकिन किसी शिखर सम्मेलन को केवल उपलब्धियों, प्रमुख निष्कर्षों या इस सवाल के आधार पर नहीं देखा जाना चाहिए कि इससे हमें क्या हासिल हुआ। निश्चित तौर पर ये महत्वपूर्ण प्रश्न हैं और इन पर बहस होनी चाहिए। लेकिन इसके साथ ही इस तथ्य को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता कि भारत में आयोजित होने वाला प्रत्येक अंतर्राष्ट्रीय शिखर सम्मेलन दुनिया के सामने भारत और उसके प्रधानमंत्री की छवि को प्रस्तुत करने का एक और अवसर बनता है। प्रधानमंत्री मोदी हर ऐसे अवसर को एक नई संभावना में बदलने की कोशिश करते हैं।

Team Desk