आइची-नागोया में संपन्न एशियाई खेलों में शानदार प्रदर्शन कर भारत की बेटियां छा गई। बेटियों ने बेटों से ज्यादा पदक जीते। इससे पहले कॉमनवेल्थ गेम्स में भी लड़कियों ने लड़कों से ज्यादा पदक जीते थे और चर्चा में रही थीं। अब लगातार दूसरी बार एशियाई खेलों जैसे बड़े आयोजन में बेहतर प्रदर्शन कर बेटियों ने साबित किया है कि ग्लासगो की उपलब्धि कोई तुक्का नहीं थी। वह लगातार अच्छा प्रदर्शन करने की क्षमता रखती हैं और अब हर बड़े खेल आयोजन में देश को बेटियों से ज्यादा बेहतर प्रदर्शन की उम्मीद होगी।
ये खेल कई रिकॉर्ड टूटने, नए कीर्तिमान स्थापित होने और भारतीय महिलाओं के इतिहास में अपना नाम दर्ज कराने के साथ संपन्न हुए। एशियाई खेलों में भारत ने कुल 85 पदक जीते, जिसमें 21 स्वर्ण, 27 रजत और 37 कांस्य शामिल थे। भारत फिर चौथे स्थान पर रहा। यहां भी बेटियों का दबदबा कायम रहा। महिलाओं ने 14 स्वर्ण पदक जीते। वहीं, पुरुष खिलाड़ी 7 स्वर्ण जीतने में सफल रहे। मिक्स्ड इवेंट में भी 3 स्वर्ण पदक आए और लड़कियों ने लड़कों के साथ कंधा मिलाकर देश का मान बढ़ाया।
महिला क्रिकेट टीम, महिला कबड्डी टीम, महिला हॉकी टीम, नीरू ढांडा (शूटिंग), महिलाओं की 4×400 मीटर रिले, आर्चरी की महिला टीमें, लवलीना बोरगोहेन, परवीन हुड्डा, कुमकुम मोहोद और प्रणावी उर्स जैसी खिलाड़ियों ने स्वर्ण पदक भारत की झोली में डाले। महिलाओं ने व्यक्तिगत और टीम इवेंट्स में कई स्वर्ण जीतकर कुल पदक तालिका में बड़ा योगदान दिया। एशियाई खेल में देश के लिए पहला स्वर्ण पदक महिला क्रिकेट टीम ने जीता था। दूसरा स्वर्ण शूटिंग में मिक्स्ड टीम ने जीता और तीसरा स्वर्ण महिला कबड्डी टीम लेकर आई। शुरुआती तीनों स्वर्ण पदक बेटियों के कारण ही मिले। इसके बाद भी स्वर्ण पदक जीतने का सिलसिला जारी रहा।
सुखद यह भी है कि कुमकुम मोहोद रिकर्व कैटेगरी में भारत की पहली व्यक्तिगत उपलब्धि हासिल करने वाली खिलाड़ी बनीं। भारतीय खिलाड़ियों को बॉक्सिंग और रेसलिंग में क्रमश: तीन और दो स्वर्ण पदक मिले। वहीं दूसरी ओर प्रणवी उर्स एशियाई खेलों में व्यक्तिगत गोल्फ गोल्ड जीतने वाली पहली भारतीय महिला बनी हैं। वहीं दूसरी ओर इस बार भी भारतीय खिलाड़ियों ने क्रिकेट, हॉकी और कबड्डी में अपना वर्चस्व कायम रखा। महिला हॉकी में भारतीय खिलाड़ियों की उपलब्धि बहुत खास रही। उन्होंने अनुशासन और ऊंचे मनोबल के साथ बेहतर खेल का प्रदर्शन किया।
भारतीय महिला हॉकी टीम ने मौजूदा चैंपियन चीन को हराकर एशियाई खेलों में स्वर्ण पदक का 44 साल का हमारा इंतजार खत्म किया। बात अगर कॉमनवेल्थ गेम्स 2026 की करें तो इस आयोजन में भारत ने कुल 39 पदक जीते थे। इनमें 13 स्वर्ण, 17 रजत और 9 कांस्य शामिल थे। भारत पदक तालिका में चौथे स्थान पर रहा था। इन 13 स्वर्ण में से भारतीय महिलाओं ने अकेले 8 स्वर्ण पदक अपने नाम किए थे, जबकि पुरुष खिलाड़ियों ने 5 स्वर्ण जीते थे। बेटियों ने लड़कों से 3 स्वर्ण ज्यादा हासिल किए थे।
मीराबाई चानू, शर्मिला धनकड़, अस्मिता डे और प्रीति पवार, जैस्मिन लम्बोरिया, साक्षी चौधरी, प्रिया घनघस व अरुंधती चौधरी जैसी खिलाड़ियों ने गोल्ड की झड़ी लगाई। बॉक्सिंग में एक दिन में 5 महिलाओं का स्वर्ण जीतना ऐतिहासिक रहा। निस्संदेह आज खेलों के मैदान में भारत की बेटियों का दबदबा लगातार मजबूत हो रहा है। चाहे वह ओलंपिक हो, पैरालंपिक हो, क्रिकेट हो या फिर विश्व चैंपियनशिप, भारतीय महिला खिलाड़ी हर मंच पर तिरंगा लहरा रही हैं। वे न सिर्फ पदक जीत रही हैं बल्कि दुनियाभर में नए कीर्तिमान भी स्थापित कर रही हैं।
2014 में मोदी सरकार के सत्ता में आने के बाद से भारत में खेल संस्कृति और प्रदर्शन में एक बड़ा सकारात्मक बदलाव आया है, जिसके कारण देश वैश्विक खेल मंच पर तेजी से एक स्पोर्टिंग पावर हाउस के रूप में उभर रहा है। सरकार ने खेलों को केवल एक मनोरंजन या अतिरिक्त गतिविधि के रूप में न देखकर, इसे राष्ट्रीय गौरव और युवा सशक्तिकरण की एक सोची-समझी रणनीति का हिस्सा बनाया है। हाल के वर्षों में अंतर्राष्ट्रीय खेल मंचों पर भारतीय खिलाड़ियों के बेहतर प्रदर्शन के लिए मोदी सरकार की खेल प्रोत्साहन नीतियों और योजनाओं को एक बड़ा आधार माना जाता है।
सरकार और खेल विश्लेषकों के अनुसार, पिछले एक दशक में भारत के स्पोटर्स इको सिस्टम को जमीनी स्तर से लेकर वैश्विक स्तर तक मजबूत करने के लिए कई नीतिगत सुधार और पहल की गई हैं। खेलो इंडिया की पहल ने जमीनी स्तर पर प्रतिभाओं को खोजने और खेल बुनियादी ढांचे को सुधारने के लिए इस योजना को एक बड़े बदलाव के रूप में देखा जाता है। हाल ही में केंद्र सरकार ने खेलो इंडिया को विस्तार देते हुए राष्ट्रीय खेल महासंघों की सहायता सहित 36,441 करोड़ रुपये का बजट मंजूर किया है।
इसमें कोई दो राय नहीं है यह आजादी के बाद से देश का सबसे महत्वाकांक्षी खेल विकास कार्यक्रम है। मोदी सरकार ने खेलों के प्रति देश के युवाओं की आकांक्षाओं को काफी बढ़ावा दिया गया है और आने वाले दशक में इसका परिवर्तनकारी असर देखने को मिलेगा। टॉप्स योजना के तहत ओलंपिक और पैरालंपिक के लिए संभावित पदक विजेताओं को सीधे वित्तीय सहायता, विश्व स्तरीय प्रशिक्षण, विदेशी कोच और चिकित्सा सुविधाएं दी जाती हैं। वहीं कीर्ति योजना के तहत 9 से 18 वर्ष के बच्चों में शुरुआती स्तर पर ही प्रतिभा की पहचान करने के लिए इस अभियान की शुरुआत की गई है।
वहीं फिट इंडिया मूवमेंट के जरिए देश में समग्र रूप से स्वास्थ्य और खेल संस्कृति को जन आंदोलन बनाने के लिए यह पहल शुरू की गई। इन नीतियों के प्रभाव के रूप में ओलंपिक और पैरालंपिक के प्रदर्शन को सामने रखा जाता है। भारत ने रियो ओलंपिक 2016 के 2 पदकों के मुकाबले टोक्यो 2020 में 7 और पेरिस 2024 में 6 पदक जीते। वहीं पैरालंपिक में रियो 2016 के 4 पदकों के मुकाबले टोक्यो में 19 और पेरिस 2024 में ऐतिहासिक 29 पदक हासिल किए।
मोदी सरकार ने खेल बजट में भारी बढ़ोतरी की है। 2026-27 के केंद्रीय बजट में युवा कार्य और खेल मंत्रालय के बजट आवंटन में 1133 करोड़ रुपये की वृद्धि की गई है, ताकि 2036 तक भारत को शीर्ष 10 खेल राष्ट्रों में और 2047 तक शीर्ष 5 में शामिल करने की कल्पना को पूरा किया जा सके। मोदी सरकार खेल संबंधी महत्वाकांक्षाओं को वास्तविकता में बदलने के लिए लगातार प्रयास कर रही है, और अब सारा ध्यान इन पहलों को अगले स्तर पर ले जाने पर केंद्रित है। देश में खेल संस्कृति को बढ़ावा देने के लिए मोदी सरकार पूरी तरह प्रतिबद्ध है। ‘खेलोगे तो खिलोगे’ यह नारा प्रधानमंत्री मोदी के बार-बार दोहराए जाने वाले संदेशों में से एक बन गया है। इसका उद्देश्य खेलों को रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा बनाना है।
वैसे पिछली बार चीन में हुए एशियाई खेलों से तुलना करें तो इस बार हमारा प्रदर्शन थोड़ा फीका रहा। एशियाई खेलों में भारत चौथे स्थान पर रहा है। हालांकि, यह वक्त हमारे लिये नागोया में मिली कामयाबियों का जश्न मनाने का है। लेकिन हमें अपनी कमजोरियों को लेकर भी आत्ममंथन करने की जरूरत है। हमें एशियाड के बाद ओलंपिक के लिये युद्ध स्तर पर तैयारियां करनी होंगी।
अब हम अभी से वर्ष 2028 में लॉस एंजिल्स के ओलंपिक खेलों की तैयारी में जुट जाएं। 2047 का विकसित भारत यदि दुनिया की अग्रणी अर्थव्यवस्थाओं में शामिल होना चाहता है तो उसे खेलों में भी अग्रणी राष्ट्र बनना होगा। आर्थिक शक्ति और खेल शक्ति एक-दूसरे की पूरक हैं। जिस देश के युवा मैदान में लक्ष्य साधना सीखते हैं, वे जीवन में भी बड़े लक्ष्य हासिल करने की क्षमता रखते हैं।


Download Android App
Download iOS App




