पिछले दिनों कई लोगों ने मुझे फोन करके यह जानना चाहा कि चुनाव आयोग में क्या चल रहा है। मुख्य चुनाव आयुक्त और बाकी चुनाव आयुक्तों के बीच खींचतान की जो खबरें आ रही हैं, उसके पीछे का सच क्या है? मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार का इस्तीफा मांगने के पीछे मूल मुद्दा क्या है? और क्या वे इस्तीफा देंगे? इन सारे सवालों के जवाब की इतनी परतें हैं कि उन्हें सुलझा पाना बहुत आसान नहीं है। जिस तरह धागा उलझ जाए तो उसे सुलझाने के लिए बहुत सब्र की जरूरत होती है, इसी तरह यह मामला भी लगता है।
मगर मेरे मन में जो सबसे बड़ा सवाल है, वह ये है कि जब आप सफेद कपड़ा पहनते हैं तो आपको पता होता है कि इस पर दाग दिखाई देना बहुत आसान हो जाता है। तो फिर काले छींटों से बचने की हर संभव कोशिश भी तो करनी चाहिए। चुनाव आयोग संवैधानिक संस्था है और जब उस पर काले छींटे पड़ते हैं तो इस देश का व्याकुल होना लाजमी है। लोकतंत्र में चुनाव की पवित्रता सबसे महत्वपूर्ण बात होती है और यह पवित्रता दिखनी भी चाहिए। ऐसा कोई भी कदम जो पारदर्शिता को बाधित करे, उसे लोकतंत्र को क्षति पहुंचाने वाले तत्व की तरह ही देखा जाना चाहिए।
टी.एन. शेषन के पहले कौन चुनाव आयुक्त बना और कब हट गया, शायद ही किसी को पता होगा। मगर टीएन शेषन जब मुख्य चुनाव आयुक्त बने तो पहली बार देश को मालूम चला कि भारतीय संविधान ने चुनाव आयुक्त को क्या हैसियत दी है। वास्तव में किसी पद की गरिमा का और हैसियत का अंदाजा तभी लगता है जब उस पद पर आसीन व्यक्ति खुद को उसके लिए समर्पित कर देता है, अब महाराष्ट्र के एक अधिकारी तुकाराम मुंढे का ही प्रसंग देखिए। वे जहां भी जाते हैं, वह पद चर्चा में आ जाता है, उनके आने के पहले क्या किसी को अंदाजा था कि फूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन के पास कितनी शक्तियां हैं? कहने का आशय यह है कि अधिकारी को अपने पद की गरिमा के लिए हर प्रकार से समर्पित होना चाहिए।
चुनाव आयोग के पास अथाह शक्तियां हैं, चुनाव आयुक्तों को हटाने के लिए भी पार्लियामेंट की शक्ति ही लगती है। चुनाव के समय आयोग चीफ सेक्रेटरी तक को बदल सकता है। उम्मीदवारी खारिज कर सकता है, राजनीतिक पार्टियों को डिसमिस कर सकता है। मगर इसका मतलब यह नहीं कि अधिकारी बेलगाम हो जाएं। यदि नए प्रावधान करना है तो इसके लिए सर्वोच्च शक्ति पार्लियामेंट में निहित है। वहां से जो कानून पास हुआ है, उसका पालन करना होगा। उसके साथ छेड़छाड़ नहीं की जा सकती।
नए मतदाताओं के नाम जोड़ने वाले फॉर्म-6 में अलग से जो प्रावधान जोड़े गए उससे निश्चय ही करोड़ों युवा प्रभावित हुए होंगे। बहुत से लोग ऐसे हो सकते हैं जिनके माता-पिता का नाम पहले की वोटर लिस्ट में नहीं हो। ग्रामीण भारत में यह सामान्य बात रही है। पहले राजनीतिक दल के लोग इस बात का ख्याल रखते थे कि किसी का नाम वोटर लिस्ट में है या नहीं, वो पकड़ कर ले जाते थे कि नाम दर्ज कराओ। बहुतों के नाम छूट भी जाते थे। इसलिए यह बहुत जरूरी है कि मतदाता सूची में नाम जोड़ने की प्रक्रिया इतनी सरल होनी चाहिए कि किसी को परेशान न होना पड़े। यह बात सामने आई है कि दोनों चुनाव आयुक्तों सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने इस प्रावधान का विरोध किया था मगर ज्ञानेश कुमार ने उनकी नहीं सुनी।
यहां मैं टीएन शेषन के समय का एक प्रसंग बताना चाहूंगा। टीएन शेषन पर लगाम कसने के लिए तत्कालीन सरकार ने जब दो चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति की तो शेषन ने उन्हें दरकिनार किया। सरकार के निर्णय के खिलाफ वे सर्वोच्च न्यायालय भी चले गए। सर्वोच्च न्यायालय ने तब यह फैसला सुनाया था कि मुख्य चुनाव आयुक्त और दोनों चुनाव आयुक्त निर्णय लेने की प्रक्रिया में समान हैं। तो अभी चुनाव आयोग के भीतर क्या कुछ मसला चल रहा है, उसमें यह सवाल तो है ही कि कौन सी गतिविधि संवैधानिक और कौन सी असंवैधानिक है। आम आदमी बहुत व्याकुल है। जाहिर सी बात है कि राजनीतिक दल अपने हिसाब से उसे परिभाषित करने की कोशिश कर रहे हैं।
मैं एक बात जरूर कहना चाहूंगा कि जिन लोगों ने इन्हें बिठाया है, उन्हें इन लोगों ने धक्का पहुंचाया है। बैठाने वालों ने ये नहीं कहा होगा कि तुम ये करो, तुम वो करो, राजनीतिक पार्टियां क्या आरोप लगाती हैं, यह अलग बात है। मैं तो बिल्कुल गैर राजनीतिक बात कर रहा हूं। शाबाश स्मित ! हमें गर्व है आप पर भारतीय पायलट कैप्टन स्मित मच्छार ने दुबई से तेल अवीव जाने वाली फ्लाई दुबई की उड़ान में विमान में इमरजेंसी के लिए रखी जाने वाली कुल्हाड़ी से घायल होने के बावजूद 180 यात्रियों की जान बचाने का जो अद्भुत कारनामा किया है, उसके लिए तहेदिल से शाबाशी।
उन्होंने यात्रियों की जान तो बचाई ही है, भारत का मान भी बढ़ा दिया, जरा सोचिए कि को-पायलट द्वारा हमले में बुरी तरह घायल होने के बाद वे कॉकपिट का दरवाजा न खोल पाते और कुछ अनहोनी हो जाती तो दुनिया सवाल उठाने से नहीं चूकती। भारतीय पायलटस का समर्पण संदेह के घेरे में लाने की कोशिश की जाती। मगर मेरे मन में यह सवाल घूम रहा है कि को-पायलट ओमान का नागरिक था तो उसे तेल अवीव की उड़ान में जगह कैसे मिली? ओमान के नागरिकों के लिए तेल अवीव बंद है, और यह सवाल भी कि इतने संवेदनशील मार्ग पर को-पायलट के रूप में सर्विस पाने में वह कामयाब कैसे रहा? षड्यंत्र वाकई बहुत गहरा था। इसका राज खुलना ही चाहिए।


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