उत्तर भारतीय राज्यों में भाजपा की राजनीति

उत्तर भारत के प्रमुख राज्य बिहार में जनता दल(यू) पार्टी के मुख्यमन्त्री श्री नीतीश कुमार के पद त्याग करने की घोषणा के बाद से देश की फिलहाल सत्तारूढ़ पार्टी भारतीय जनता पार्टी की राजनीति में निर्णायक बदलाव आने की संभावना इस प्रकार है कि यह पार्टी अब भारत के इस क्षेत्र की सर्व विस्तारित वैचारिक पार्टी हो गई है। बिहार एेसा राज्य रहा है जहां यह पार्टी अपने बूते पर कभी सत्ता में नहीं आ सकी है, जबकि उत्तर भारत के शेष सभी अन्य राज्यों (केवल पंजाब को छोड़ कर) में इस पार्टी के मुख्यमन्त्री रहे हैं, यदि हम भारत की राजनीति का वैज्ञानिक विश्लेषण करें तो पाएंगे कि 1967 एेसा वर्ष है जिससे भारत में संघीय ढांचे की राजनीति होनी शुरू हुई और विभिन्न राज्यों में क्षेत्रीय दलों ने अपना बर्चस्व दिखाना शुरू किया। इस क्रम में अव्वल नम्बर पर दक्षिण भारत रहा जहां के मद्रास (अब तमिलनाडु) राज्य में पहली बार एक क्षेत्रीय पार्टी द्र​विड़ मुन्नेत्र कषगम के हाथ में सत्ता आई और इसके नेता स्व. सी.एन. अन्नादुरै मुख्यमन्त्री बने।
इसके साथ ही देश के अन्य आठ राज्यों में भी कांग्रेस पार्टी का दबदबा खत्म हुआ और इस पार्टी से नेताओं का पलायन शुरू हुआ। इस मामले में इसकी कमान उत्तर प्रदेश के हाथ में रही जहां कांग्रेस के टिकट पर ही चुनकर आये स्व. चौधरी चरण सिंह ने विद्रोह किया और अन्य 14 पार्टी विधायकों के साथ कांग्रेस छोड़कर ‘जन कांग्रेस’ का गठन किया (बाद में 1969 में उन्होंने अपनी अलग भारतीय क्रान्ति दल पार्टी बनाई )। उनकी देखा-देखी मध्य प्रदेश में भी कांग्रेस के नेता स्व. तख्त मल जैन ने विद्रोह करके जन कांग्रेस को विस्तार दिया।
1967 के चुनावों की सबसे खास बात यह रही कि दिल्ली महानगर से लेकर हरियाणा, पंजाब, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश , बिहार व पूर्व में प. बंगाल व ओडिशा में गैर कांग्रेसी सरकारों का गठन हुआ जिनमें कुछ राज्यों में क्षेत्रीय दलों का भी प्रभावी अविर्भाव शामिल था। इनमें पंजाब में अकाली दल का शानदार प्रदर्शन रहा और ओडिशा में स्वतन्त्र पार्टी का। हालांकि स्वतन्त्र पार्टी उस समय देश की प्रमुख दक्षिण पंथी विपक्षी पार्टी हो चुकी थी, मगर ओडिशा राज्य में इस पार्टी में इससे बहुत पहले उड़िया गणतन्त्र परिषद पार्टी का विलय हो चुका था जिसे राज्य के राजे-रजवाड़ाें की पार्टी माना जाता था। बिहार में स्व. डा. राम मनोहर लोहिया की संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी का विशेष स्थान था जिसने राज्य में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी को पीछे छोड़कर प्रमुख विपक्षी दल का स्थान ले लिया था, किन्तु इन चुनावों की सबसे उल्लेखनीय व महत्वपूर्ण घटना यह थी कि अपनी हिन्दू मूलक राष्ट्रवादी विचारधारा के लिए जानी जाने वाली भारतीय जनसंघ पार्टी को पहली बार एेसी सफलता मिली थी कि विचारधारा के स्तर पर वह कांग्रेस पार्टी के समक्ष डटकर खड़ी होने की स्थिति में आ गई थी, हालांकि इसी वर्ष विधानसभा के साथ ही हुए लोकसभा चुनावों में स्वतन्त्र पार्टी को सभी विपक्षी दलों में सर्वाधिक 44 सीटें मिली थीं मगर जनसंघ भी 33 सीटें पाने में कामयाब रही थी, जहां तक राज्यों का सवाल है तो जनसंघ देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश समेत मध्य प्रदेश व हरियाणा में कांग्रेस के बाद सर्वाधिक सीटें पाने वाली पार्टी बनी थी। विचारधारा के स्तर पर यह जनसंघ की बहुत बड़ी जीत मानी जा रही थी।
उस समय केवल दिल्ली महानगर ही एेसा था जहां जनसंघ को अपने बूते पर पूर्ण बहुमत महानगर परिषद (उस समय विधानसभा नहीं थी) में मिला था। इसके साथ ही दिल्ली नगर निगम में भी इसे पूर्ण बहुमत प्राप्त हुआ था। दिल्ली से सटे हरियाणा राज्य में भी कांग्रेसी विधायकों ने विद्रोह कर दिया था जिसके नेता स्व. राव वीरेन्द्र सिंह थे। बाद में उन्होंने अपनी अलग से विशाल हरियाणा पार्टी भी बनाई थी। इस प्रकार पहली बार जनसंघ को सत्ता का स्वाद चखने का अवसर तब मिला जब उत्तर भारत के राज्यों में विद्रोही कांग्रेसी नेताओं के नेतृत्व में संयुक्त विधायक दल या संविद सरकारों का गठन हुआ। उत्तर प्रदेश में चरण सिंह सरकार बनी जिसमें उपमुख्यमन्त्री जनसंघ के स्व. राम प्रकाश गुप्त थे और मध्य प्रदेश में विद्रोही कांग्रेसी स्व. गोविन्द नारायण सिंह की सरकार बनी जिसमें उपमुख्यमन्त्री जनसंघ के स्व. वीरेन्द्र कुमार सखलेचा थे, मगर बिहार में कांग्रेस छोड़कर आये स्व. महामाया प्रसाद सिन्हा की सरकार बनी जिसमें उप मुख्यमन्त्री पद सोशलिस्ट पार्टी के स्व. कर्पूरी ठाकुर को मिला और जनसंघ के नेता ठाकुर प्रसाद सिन्हा मन्त्री बनाये गये, मगर पूर्व में प. बंगाल में कांग्रेस नेता स्व. अजय मुखर्जी पार्टी छोड़कर बाहर आ गये थे और उन्होंने अपनी पृथक बांग्ला कांग्रेस बना ली थी। उस समय इस राज्य में जनसंघ की कोई ताकत नहीं थी और इसके राज्य अध्यक्ष स्व. प्रोफे. हरिपद भारती थे, मगर विधानसभा में इस पार्टी के संभवतः पांच विधायक जीत कर आ गये थे।
इसी प्रकार ओडिशा में भी जनसंघ की उपस्थिति नाम मात्र की ही थी। मगर केरल जैसे राज्य में तभी से जनसंघ वैचारिक स्तर पर संघर्ष करने की तरफ बढ़ने लगी थी हालांकि यह नामचारे का ही थी। मगर इसी वर्ष जनसंघ का वार्षिक महाधिवेशन स्व. दीन दयाल उपाध्याय के नेतृत्व में कालीकट शहर में हुआ था जिससे राज्य के लोगों में इस पार्टी की विचारधारा के प्रति जिज्ञासा जागृत हुई थी, लेकिन उत्तर भारत के राज्यों में जनसंघ की स्थिति बिल्कुल अलग थी, क्योंकि इन सभी राज्यों में पार्टी ने विचारधारा के स्तर पर आम जनता के बीच अपनी पैठ बनाई थी, लेकिन बिहार अपवाद के रूप में एेसा राज्य रहा जहां सामाजिक न्याय की राजनीति के चलते 1980 में जनसंघ से भारतीय जनता पार्टी के रूप में बदली इस पार्टी को अपना प्रसार करने के लिए दूसरे राजनीतिक अवलम्ब की जरूरत पड़ी, जबकि उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, हरियाणा , राजस्थान व दिल्ली में इसने अपनी विचारधारा के आधार पर ही अपना विस्तार किया और यह लोगों की पसन्दीदा पार्टी बनती चली गई। 2014 में राष्ट्रीय पटल पर श्री नरेन्द्र मोदी के उदय होने के बाद से इसकी राष्ट्रवादी राजनीति को नई धार मिली और यह वैचारिक स्तर पर कांग्रेस पार्टी को पीछे छोड़ते हुए रिक्त स्थान को भरती गई। बेशक इसमें पंजाब भी अपवाद हो सकता है, क्योंकि इस राज्य में क्षेत्रीय दल अकाली दल व भाजपा दोनों ही हाशिये पर पहुंच गये हैं और नई आम आदमी पार्टी ने कांग्रेस की जगह ले ली है। इसका प्रमुख कारण पंजाब के लोगों का अपना खास राजनीतिक मिजाज भी माना जाता है क्योंकि यहां के लोग नये प्रयोग करने से घबराते नहीं हैं, परन्तु पंजाब का यह स्थायी भाव भी नहीं है। वर्तमान समय में पूरे उत्तर भारत में भारतीय जनता पार्टी के ही मुख्यमन्त्री नजर आते हैं चाहे वह उत्तर प्रदेश हो या राजस्थान अथवा हरियाणा हो या मध्य प्रदेश या फिर दिल्ली।
अब बिहार में भी हमें जल्दी ही भाजपा का मुख्यमन्त्री देखने को मिलेगा। इससे भारतीय राजनीति के वैचारिक पक्ष का वह चक्र पूरा होगा जिसमें दो परस्पर विरोधी सिद्धान्तों के आधार पर मतदाताओं की गोलबन्दी की जाती है। इस मामले में इन राज्यों में क्षेत्रीय दलों की भूमिका स्वयं ही हाशिये पर खिसकती चली जाती है क्योंकि इनके विचार व सिद्धान्त राष्ट्रीय फलक से मेल नहीं खाते जिसकी वजह से जातिगत आधार पर राजनीतिक दल खड़े करने के प्रयास किये जाते हैं। अतः समूचे उत्तर भारत में हमें वैचारिक राजनीति की व्यग्रता नजर आ सकती है।

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