उड़ी पर आतंकी हमले के बाद प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने पंजाब में एक जनसभा को सम्बोधित करते हुए कहा था कि खून और पानी एक साथ नहीं बह सकते। केन्द्र सरकार ने भी सिंधु नदी पर विकल्पों को आजमाना शुरू कर दिया था। सिंधु जल संधि की समीक्षा के लिए बैठक भी की गई थी। पिछले कुछ वर्षों के दौरान जब भी भारत-पाक में तनाव बढ़ा तब सिंधु जल समझौते को तोड़ने की बात उठती रही है। हमेशा यही कहा जाता रहा कि भारत सिंधु नदी जल संधि को तोड़ दे तो पाकिस्तान सीधा हो जाएगा लेकिन संधि तोड़ना आसान भी नहीं है लेकिन भारत इतना तो कर ही सकता है कि समझौते के तहत मिले पानी को अपने लिए इस्तेमाल करे। भारत अब तक काफी उदारता बरतता आया है और अपने हिस्से का पानी भी पाकिस्तान को देता रहा है। ब्रिटिशकाल के दौरान ही दक्षिण पंजाब में सिंधु नदी घाटी पर बड़ी नहर का निर्माण करवाया गया था। उस इलाके को इसका इतना लाभ मिला कि वो दक्षिण एशिया का एक प्रमुख क्षेत्र बन गया।
भारत और पाकिस्तान के बीच बंटवारे के दौरान जब पंजाब को विभाजित किया गया तो इसका पूर्वी भाग भारत के पास और पश्चिमी भाग पाकिस्तान के पास गया। बंटवारे के दौरान ही सिंधु नदी घाटी और विशाल नहरों को भी विभाजित किया गया। पानी के बहाव को बनाए रखने के उद्देश्य से पूर्व और पश्चिम पंजाब के इंजीनियरों के बीच 20 दिसम्बर 1947 को एक समझौता हुआ। इसके तहत बंटवारे से पहले तय किया गया कि भारत काे पानी का निश्चित हिस्सा 31 मार्च 1948 तक पाकिस्तान को देते रहना है। एक अप्रैल 1948 को जब समझौता लागू नहीं रहा तो भारत ने दो प्रमुख नदियों का पानी रोक दिया और पाकिस्तान के हालात काफी खराब हो गए। उसकी काफी फसल खराब हुई और वह बूंद-बूंद पानी को तरस गया था।
कारण यही था कि भारत कश्मीर मुद्दे पर पाकिस्तान पर दबाव बढ़ाना चाहता था। एक दशक तक चली बैठकों के बाद आखिरकार 19 नवम्बर 1960 को कराची में तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू और पाकिस्तान के तत्कालीन राष्ट्रपति अयूब खान ने सिंधु नदी जल समझौते पर हस्ताक्षर कर दिए। इस संधि के तहत तीन पूर्वी नदियों-ब्यास, रावी और सतलुज के पानी का इस्तेमाल भारत बिना किसी बाधा के कर सकता है वहीं तीन पश्चिमी नदियों-सिंधु, चिनाब और झेलम का पानी पाकिस्तान के हिस्से में आया। भारत हालांकि इन पश्चिमी नदियों के पानी को भी अपने इस्तेमाल के लिए रोक सकता है लेकिन इसकी सीमा 36 लाख एकड़ फीट रखी गई। हालांकि भारत ने अभी तक इसके पानी को रोका नहीं। इसके अलावा भारत इन पश्चिमी नदियों के पानी से 7 लाख एकड़ जमीन में लगी फसलों की सिंचाई कर सकता है।
विशेषज्ञों का कहना है कि इस समझौते से भारत को एकतरफा नुक्सान हुआ और उसे 6 नदियों का महज 20 फीसदी पानी ही मिला है। भारत ने जब भी झेलम और चिनाब नदियों पर जल विद्युत परियोजनाओं के निर्माण की तैयारी की तो पाकिस्तान ने अंतर्राष्ट्रीय पंचाट से मध्यस्थता की मांग की। किशनगंगा, तुलबुल प्रोजैक्ट पर भी पाकिस्तान ने आपत्ति की थी। विशेषज्ञ कई वर्षों से कह रहे हैं कि कम से कम भारत अपने हिस्से का पानी तो पाकिस्तान न जाने दें। पाकिस्तान के लिए यह कड़ा संदेश होगा। समझौते के तहत कोई भी एकतरफा तौर पर संधि को तोड़ नहीं सकता और न बदल सकता है। वियना समझौते के लॉ ऑफ ट्रीटीज के अंतर्गत भी भारत संधि से बंधा हुआ है लेकिन वियना लॉ ऑफ ट्रीटीज की धारा 62 के तहत यह कहकर पीछे हट सकता है कि पाकिस्तान आतंकवादी गुटों का इस्तेमाल कर रहा है। अंतर्राष्ट्रीय अदालत ने भी कहा है कि अगर मूलभूत स्थितियों में परिवर्तन हो तो किसी संधि को रद्द किया जा सकता है लेकिन यह दूर की बात है। भारत इतना अमानवीय नहीं हो सकता। यह समझौता पिछले 59 वर्षों से जारी है।
सिंधु जल समझौते के बाद दोनों देशों के बीच तीन युद्ध 1965, 1971 और 1999 में (कारगिल युद्ध) हुए। पाकिस्तानी आतंकियों ने लगातार हमले किए लेकिन इतना कुछ होने के बावजूद सिंधु जल संधि बदस्तूर कायम है। यह एक अंतर्राष्ट्रीय संधि है। अगर भारत इसे तोड़ता है तो पूरी दुनिया में यह संदेश जाएगा कि भारत कानूनी तौर पर संधि का उल्लंघन कर रहा है। रावी, ब्यास और सतलुज से भारत को अपने हिस्से का 33 मिलियन एकड़ फीट पानी मिलता है। इसका 95 प्रतिशत भारत तीन बांध बनाकर अपने लिए इस्तेमाल कर रहा था। बाकी का 5 प्रतिशत यानी 1.6 मिलियन एकड़ फीट पानी पाकिस्तान के लिए अपनी तरफ से छोड़ रहा था।
अब मोदी सरकार ने यह पानी पूरी तरह बन्द करने का फैसला किया है। केन्द्रीय मंत्री नितिन गडकरी ने भी स्पष्ट कर दिया है कि अपने हिस्से के पानी को इस्तेमाल करने के लिए जम्मू-कश्मीर के शाहपुर कंडी और उझ परियोजनाएं नदी जोड़ो परियोजना के तहत बनाई जा रही हैं। जब पाकिस्तान लगातार हमारा खून बहा रहा है तो उसे सरप्लस पानी भी क्यों दिया जाए? अब भारत इस पानी का इस्तेमाल पंजाब, जम्मू-कश्मीर के लिए करेगा। पंजाब में पानी संकट काफी गम्भीर है। सतलुज, यमुना पानी को लेकर पंजाब और हरियाणा में तलवारें खिंची रहती हैं। इससे यमुना का जलस्तर बढ़ जाएगा तो समस्या का अन्त हो जाएगा। काश! यह काम हमने पहले किए होते।


Download Android App
Download iOS App



