2006 में जब केन्द्र में मनमोहन सरकार के रहते अपने समय के राजनेता (स्टेट्समैन) भारत रत्न स्व. प्रणव मुखर्जी देश के रक्षामन्त्री से विदेश मन्त्री बने तो अक्तूबर महीने में संयुक्त राष्ट्र संघ की महासभा के सम्मेलन में भाग लेने न्यूयाॅर्क गये। उन्होंने वहां जाकर अमेरिका व पश्चिमी यूरोपीय देशों के वैश्विक वित्त संस्थाओं पर पारंपरिक दबदबे को देखा जबकि इन देशों की अर्थव्यवस्थाओं का अन्तर्राष्ट्रीय आर्थिक विकास में योगदान लगातार क्षीण हो रहा था तो उन्होंने दुनिया के तीन महाद्वीपों एशिया, यूरोप व लैटिन अमेरिका के चार सबसे तेज गति से अग्रसर होती अर्थव्यवस्थाओं वाले देशों भारत, ब्राजील, रूस व चीन का एक संगठित समूह बनाने का प्रस्ताव इन देशों के विदेश मन्त्रियों की बैठक में रखा। इन देशों के विदेश मन्त्री भी राष्ट्रसंघ सम्मेलन में भाग लेने के लिए आये हुए थे। बैठक में संगठन गठित करने पर सहमति बनी और इसे ब्रिक (ब्राजील, रूस, इंडिया, चीन) का नाम दिया गया। 2010 में इसमें अफ्रीका महाद्वीप का सबसे तेज विकास करता दक्षिण अफ्रीका देश भी शामिल हो गया जिससे यह ‘ब्रिक्स’ कहलाने लगा। इससे यह स्पष्ट हो जाना चाहिए कि ब्रिक्स के गठन का लक्ष्य व उद्देश्य वैश्विक आय व वित्तीय स्रोतों का न्यायोचित बंटवारा इस प्रकार करना था जिससे अन्तर्राष्ट्रीय आर्थिक विकास में सर्वाधिक योगदान करने वाले देशों को उनका वाजिब हिस्सा मिल सके।
इसके बाद ही प्रणव दा ने अन्तर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष व विश्व बैंक जैसी संस्थाओं में तेज गति से दौड़ती अर्थव्यवस्थाओं वाले देशों के महाद्वीपों को समुचित प्रतिनिधित्व देने की पुरजोर मांग भी उठाई। इससे साफ हो जाना चाहिए कि ब्रिक्स का गठन एेसी विश्व व्यवस्था की संरचना करना था जो िद्वतीय विश्व युद्ध के बाद 1945 में स्थापित तन्त्र का स्थान वर्तमान परिस्थितियों के यथार्थ के सापेक्ष ले सके। जाहिर तौर पर इसको विकसित करने में भारत की ही महत्वपूर्ण भूमिका थी अतः 2026 में यह परखा जाना आवश्यक है कि ब्रिक्स की उपयोगिता इसके सन्दर्भ में कितनी लाभदायी रही है। यहां यह बात ध्यान देने योग्य है कि 2026 के आते-आते ब्रिक्स में छह और देश शामिल हो चुके हैं जिससे इनकी संख्या अब 11 हो चुकी है। 2024 में इसमें मिस्र, इथियोपिया, ईरान, सऊदी अरब व संयुक्त अरब अमीरात शामिल हुए और 2025 में इंडोनेशिया इसका सदस्य बना जिससे इसकी संरचना अब भू-राजनीतिक ज्यादा हो गई है क्योंकि एशिया के नये बने सदस्यों के बीच ईरान-अमेरिका व इजराइल युद्ध के चलते आपसी मतभेद भी कम नहीं हैं। अतः इन युद्ध निहित हितों के टकराव से उपजे मतभेदों को दूर करते हुए किसी सर्वसम्मत निर्णय पर पहुंचना भी इसके लिए अब एक चुनौती है। परन्तु इन सब चिन्ताओं से ऊपर खुशखबरी यह है कि रूस के राष्ट्रपति व्लादिमिर पुतिन व चीन के राष्ट्रपति शी-जिनपिंग ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में भाग लेने दिल्ली आये हुए हैं। निश्चित रूप से रूस व चीन विश्व की दो महाशक्तियां हैं। इनमें से चीन भारत का एेसा निकटतम पड़ोसी है जिसकी जल-थल सीमाएं इससे छह ओर से मिलती हैं और रूस एेसा रणनीतिक सदाबहार मित्र देश है जिसने हर मुसीबत के समय भारत का साथ दिया है।
दूसरी ओर 2006 के बाद से भारत व अमेरिका के सम्बन्धों में गुणात्मक परिवर्तन व सुधार हुआ है। दोनों देशों के सम्बन्धों में सबसे बड़ा बदलाव तब आया जब 2008 के अक्तूबर महीने में भारत-अमेरिका के बीच परमाणु समझौता हुआ। यह दीगर प्रश्न खड़ा हुआ है कि इस समझौते के फलितार्थ में भारत को टैक्नोलॉजी स्थानान्तरण से लेकर अन्य क्षेत्रों में कितना लाभ पहुंचा? परन्तु जहां तक ब्रिक्स का सवाल है तो इसके विस्तार के साथ यह देखना होगा कि इन देशों के बीच आर्थिक कारोबार की क्या स्थिति है और विभिन्न क्षेत्रों में एक-दूसरे पर निर्भरता कितनी है। जहां तक चीन का प्रश्न है तो इससे भारत बहुतायत में आयात करता है और इसके साथ इसका विदेशी व्यापार घाटा 118 अरब डाॅलर के करीब है। रूस के बारे में एेसा नहीं कहा जा सकता क्योंकि यह ऊर्जा से लेकर सैनिक साजो-सामान व परमाणु तक के क्षेत्र में भारत के साथ पूरा सहयोग करता है। रूस के साथ भारत का व्यापार इन देशों की स्थानीय मुद्राओं में ही होता है। नये सदस्य देश ईरान के साथ भी पारंपरिक रूप से व्यापार स्थानीय मुद्रा में ही होता रहा है।
ब्रिक्स का अन्तर्निहित लक्ष्य यह भी था कि इसके सदस्य देशों के बीच कारोबार डाॅलर की जगह यूरोपीय संघ की सांझा मुद्रा ‘यूरो’ जैसी में हो। 2012 में जब नई दिल्ली में ब्रिक्स का सम्मेलन हुआ था तो इसमें ब्रिक्स विकास बैंक की स्थापना का प्रस्ताव पारित किया गया था। इस परिकल्पना को 2026 के आते-आते मूर्त रूप दिया गया और इसका नाम ‘न्यू डेवलेपमेंट बैंक’ रखा गया। इसी से अन्दाजा लगाया जा सकता है कि ब्रिक्स देश भविष्य में आपसी कारोबर के लिए डाॅलर की जगह वैकल्पिक मुद्रा की खोज करने में सफल होंगे। हालांकि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प एेसा करने के खिलाफ सख्त चेतावनियां देते रहते हैं और इस राह पर बढ़ने वाले देशों पर अनाप-शनाप आयात शुल्क लगाने की चेतावनी भी देते रहते हैं। परन्तु यह नहीं भूला जाना चाहिए कि ब्रिक्स का गठन ही अमेरिका की दादागिरी खत्म करने के लिए किया गया था। भारत जो कि ब्रिक्स समेत जी-20, क्वाड व शंघाई सहयोग संगठन का भी सदस्य है, उसे अपने राष्ट्रीय हित अमेरिका से सन्तुलन बनाते हुए साधने होंगे और पश्चिम एशिया में अमेरिका के दुश्मन ईरान के साथ अपने एेतिहासिक-सांस्कृतिक सम्बन्ध दुरुस्त इस प्रकार रखने होंगे कि वह वैश्विक स्तर पर विकास के लिए आतुर दक्षिणी राष्ट्रों का सिरमौर बनकर उसी प्रकार चमके जिस प्रकार वह गुटनिरपेक्ष देशों का रहता था। निश्चित रूप से यह कार्य आसान नहीं है मगर ब्रिक्स शिखर सम्मेलन इस ओर दिशा सूचक का काम कर सकता है। आज दुनिया के सर्वाधिक विकसित जी-7 देशों की प्रति व्यक्ति आय 53 हजार डाॅलर वार्षिक की है जबकि ब्रिक्स देशों के लोगों की प्रति व्यक्ति आय 8200 डाॅलर वार्षिक की ही है। विरोधाभास यह है कि जी-7 देशों का विश्व सकल उत्पाद में हिस्सा 2024 तक घटकर 29 प्रतिशत रह गया है और ब्रिक्स देशों का बढ़कर 36.8 प्रतिशत हो गया है जिससे सांझा मुद्रा में कारोबार करने की रणनीति को बल मिलता है। अतः ब्रिक्स देशों को इस राह पर आगे बढ़ना ही होगा।
ब्रिक्स देशों में भारत की महत्ता
Summary :
2006 में जब केन्द्र में मनमोहन सरकार के रहते अपने समय के राजनेता (स्टेट्समैन) भारत रत्न स्व. प्रणव मुखर्जी देश के रक्षामन्त्री से विदेश मन्त्री बने तो अक्तूबर महीने में संयुक्त राष्ट्र संघ की महासभा के सम्मेलन में भाग लेने न्यूयाॅर्क गये। उन्होंने वहां जाकर अमेरिका व पश्चिमी यूरोपीय देशों के वैश्विक वित्त संस्थाओं पर पारंपरिक दबदबे को देखा जबकि इन देशों की अर्थव्यवस्थाओं का अन्तर्राष्ट्रीय आर्थिक विकास में योगदान लगातार क्षीण हो रहा था तो उन्होंने दुनिया के तीन महाद्वीपों एशिया, यूरोप व लैटिन अमेरिका के चार सबसे तेज गति से अग्रसर होती अर्थव्यवस्थाओं वाले देशों भारत, ब्राजील, रूस…


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