अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के सनकी रवैये को देखते हुए कोई भी अनुमान लगाना मुश्किल है। पिछले कुछ दिनों से वे लगातार भारत विरोधी बयान देते आ रहे हैं लेकिन पिछले दो दिनों में अमेरिका का जो रुख देखने को मिला उससे ऐसा लगता है कि दिल्ली और वाशिंगटन के बीच कूटनयिक सम्पर्क फिर से कायम हो गया है। दोनों देशों के बीच व्यापार वार्ता को लेकर सक्रियता नजर आ रही है। पहले भारत में नियुक्त अमेरिकी राजदूत सर्जियो गोर ने सकारात्मक रुख अपनाते हुए कहा था कि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के बीच दोस्ती बहुत मजबूत है और दोनों के रिश्ते सबसे ऊंचे राजनीतिक स्तर पर बहुत मजबूती से टिके हुए हैं।
असली दोस्ती में कभी-कभी मतभेद हो जाते हैं लेकिन वे दोनों मिलकर मतभेदों को अच्छे से सुलझा लेते हैं। उन्होंने चौंकाने वाला बयान यह भी दिया कि राष्ट्रपति ट्रंप जल्द भारत आ सकते हैं। अमेरिका के लिए भारत से ज्यादा अहम साझेदार कोई नहीं है। अब एक अच्छी खबर यह है कि विदेश मंत्री एस. जयशंकर और अमेरिकी विदेशी मंत्री और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार मार्को रूबियो में फोन पर बातचीत हुई। दोनों ने द्विपक्षीय व्यापार वार्ता दुर्लभ खनिजों, रक्षा, परमाणु सहयोग, ऊर्जा और अगले महीने होने वाली संभावित बैठक पर चर्चा की। इस बात की उम्मीद लगाई जा रही है कि दोनों देशों में व्यापार वार्ता में काफी प्रगति हो चुकी है लेकिन अन्य विषयों के महत्व को कम नहीं आंका जा सकता।
मार्को रूबियो ने हाल ही में भारत द्वारा परमाणु ऊर्जा दोहन एवं विकास विधेयक यानि परमाणु ऊर्जा कानून पारित करने पर भारत की सराहना की और कहा कि इससे अमेरिकी कम्पनियों के लिए अवसरों का विस्तार करने और साझा ऊर्जा लक्ष्यों को आगे बढ़ाने में मदद मलेगी। अमेरिकी राजदूत सर्जियो गोर ने अपने बयान में अमेरिका द्वारा पैक्स सिलिका रणनीतिक पहल के लिए भारत को आमंत्रित करने की बात कही थी जो अपने आप में बहुत महत्वपूर्ण है। पैक्स सिलिका एक ऐसी पहल है जो चीन का मुकाबला करने के लिए शुरू की गई है जिसका उद्देश्य महत्वपूर्ण खनिजों और ऊर्जा स्रोतों से लेकर उन्नत विनिर्माण, सभी कंडक्टर, एआई विकास और लोजिस्टिक तक एक सुरक्षित समृद्ध और नवाचार संचालित सिलिकान आपूर्ति शृंखला का निर्माण करना है।
इस पहल में जापान, दक्षिण कोरिया, ब्रिटेन और इजराइल पहले ही शामिल हो चुके हैं। भारत को इस समूह में पूर्ण सदस्य के रूप में शामिल किया जाएगा। विदेश मंत्री एस.जयशंकर और मार्को रूबिय में पिछले वर्ष भी मुलाकातें होती रही हैं। भारत ने सितंबर 2025 से रूस से तेल आयात कम कर दिया है जिससे वाशिंगटन को यह संकेत मिला है कि अमेरिका को 25 प्रतिशत दंडात्मक टैरिफ हटा देना चाहिए। सूत्रों ने कहा कि 25 प्रतिशत टैरिफ जुर्माने की छूट एक ऐसा कदम है जो दोनों पक्षों के बीच संबंधों में तनाव को कम कर सकता है, जबकि दोनों पक्ष शेष 25 प्रतिशत कम टैरिफ प्राप्त करने के लिए व्यापार समझौते पर बातचीत जारी रखते हैं।
इस मामले में तात्कालिकता का भाव ऐसे समय में भी सामने आया है जब भारत और यूरोपीय संघ अपने स्वयं के व्यापार समझौते पर बातचीत कर रहे हैं और कोशिश कर रहे हैं कि 26 जनवरी को गणतंत्र दिवस परेड और समारोहों के लिए मुख्य अतिथि के रूप में यूरोपीय संघ के नेताओं के भारत आने और उसके बाद भारत-यूरोपीय संघ के नेताओं के शिखर सम्मेलन से पहले इसे अंतिम रूप दे दिया जाए। महत्वपूर्ण सवाल यह है कि अमेरिका के रुख में परिवर्तन क्यों आया है। ट्रंप ने तो रूस से तेल खरीदने वाले देशों पर 500 प्रतिशत टैरिफ लगाने का फरमान जारी कर रखा है। सच्चाई तो यह है कि अमेरिका को आज भारत की बहुत जरूरत है। ऐसा नहीं है कि अमेरिका के साथ ट्रेड डील की जरूरत सिर्फ भारत को ही है।
दोनों ही देशों ने द्विपक्षीय कारोबार को लेकर बड़ा लक्ष्य बनाया है। भारत और अमेरिका ने साल 2030 तक अपने द्विपक्षीय कारोबार को 500 अरब डॉलर तक पहुंचाने का लक्ष्य बनाया है। व्यापार के अंतर को कम करने के लिए भारत ने अमेरिका से वादा किया है कि वह एनर्जी और रक्षा उपकरणों की खरीद बढ़ाएगा। भारत ने यह वादा तब किया है, जबकि पिछले साल दोनों के बीच हुई व्यापार वार्ता अभी तक बेनतीजा रही है। ट्रंप के टैरिफ के प्रभाव से बचने के लिए भारत लगातार उपाय कर रहा है। जर्मनी के चांसलर फ्रेडरिक मर्ज भारत आए थे। प्रधानमंत्री मोदी से मुलाकात के बाद दोनों देशों में रक्षा और सेमीकंडक्टर समेत महत्वपूर्ण समझौतों पर हस्ताक्षर हुए। दोनों नेताओं ने भू-राजनीतिक उथल-पुथल और खासतौर पर ट्रंप के मनमाने रवैये पर चर्चा भी की।
भारत और जर्मनी ने द्विपक्षीय व्यापार बढ़ाने का रोड मैप तैयार किया। अमेरिकी दबाव के बावजूद जर्मनी यूरोप में भारत का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार बना हुआ है। भारत ने खाड़ी देशों और कई अन्य देशों के साथ व्यापार को प्राथमिकता दी है। भारत वाशिंगटन तक यह संदेश पहुंचाने में सफल रहा है कि अमेरिका के कदम द्विपक्षी रिश्तों को नुक्सान पहुंचा सकते हैं और इस तरह अमेरिका भारत के रूप में एक अच्छा मित्र खो देगा। युद्ध से लेकर तेल तक ट्रंप हर दिन कोई न कोई नया दावा कर देते हैं। ट्रंप की बातें पारम्परिक कूटनीतिक भाषा से अलग और असामान्य हैं।
ट्रंप के फरमानों से नाटो और यूरोपीय देश भी परेशान हो चुके हैं और ट्रंप अपना भरोसा गंवाते जा रहे हैं। दबाव कितना भी क्यों न हो ट्रंप की तानाशाही को कोई इतना क्यों सहेगा। ट्रंप अपनी विफलताओं को छिपाने के लिए भी ऊटपटांग बातें कर रहे हैं। तमाम जटिलताओं के बावजूद भारत-अमेरिका में समग्र ट्रेड डील पर सहमति बनती है तो यह दोनों देशों के लिए बेहतर होगा।





















