आओ कि इक ख्वाब बुनें

Summary :

चलिए, एक ख्वाब देखें। क्या ख्वाब में भी यह संभावना हो सकती है कि भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश के मध्य आने वाले समय में कोई परिसंघ (कान्फैडरेशन) या महासंघ बनेगा? फिलहाल आज के हालात इसकी गवाही नहीं देते कि आने वाले वक्त में ऐसा कोई परिसंघ या महासंघ इन तीन देशों के बीच बनेगा? साझी विरासत और साझेदारी के अनेक पुल थे जो हमारी अपनी ही सरकारों और अपने ही लोगों ने तोड़ डाले। मगर उन साझे पुलों के खण्डहर एवं निशानियां तो आज भी मौजूद हैं। चलिए, साझे पुलों पर एक नजर तो डाल लें। लाहौर के किले का…

चलिए, एक ख्वाब देखें। क्या ख्वाब में भी यह संभावना हो सकती है कि भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश के मध्य आने वाले समय में कोई परिसंघ (कान्फैडरेशन) या महासंघ बनेगा?
फिलहाल आज के हालात इसकी गवाही नहीं देते कि आने वाले वक्त में ऐसा कोई परिसंघ या महासंघ इन तीन देशों के बीच बनेगा? साझी विरासत और साझेदारी के अनेक पुल थे जो हमारी अपनी ही सरकारों और अपने ही लोगों ने तोड़ डाले। मगर उन साझे पुलों के खण्डहर एवं निशानियां तो आज भी मौजूद हैं।
चलिए, साझे पुलों पर एक नजर तो डाल लें। लाहौर के किले का ‘लव-मंदिर’ गवाही देता है कि यह शहर भगवान राम के बड़े पुत्र लव ने बसाया था। पाकिस्तान की सरकार वहां के इतिहासकार व पुरातत्वविद भी यह मानते हैं कि लाहौर महाराजा लव ने बसाया था और कसूर की स्थापना लव के छोटे भाई कुश ने की थी।
सिख धर्म की पहली पातशाही श्री गुरु नानक देव ने वर्तमान पाकिस्तान स्थित श्री ननकाना साहब में जन्म लिया था और वह जिस स्थान पर ज्योति-ज्योत समाए थे, वह स्थान भी श्री करतारपुर साहब वर्तमान पाकिस्तान में ही है।
हमारे शहीदे आज़म भगत सिंह का जन्म स्थान भी वर्तमान पाक में है और उन्होंने अपने दोनों हमजोलियों सुखदेव व राजगुरु के साथ लाहौर की सेंट्रल जेल में ही फांसी के फंदे पर अंतिम सांस ली थी। यह सिलसिला बहुत लम्बा है। कदम-कदम पर इतिहास के पन्ने साझी विरासत की गवाही देते हैं। कहीं कटासराज के बहाने तो कहीं मुल्तान के आदित्य मंदिर (मुल्तान) के बहाने, कहीं किस्सों, कहानियों, लोकगीतों, साहित्यकारों के बीच साझेदारी खत्म नहीं हो पाई। पिछली सदी में ही सर गंगाराम, सरदार दयाल सिंह मजीठिया, लाला लाजपत राय और उनका गुलाब देवी अस्पताल आदि महान शख्सियतों के नाम साझेदारी में बकायदा बने हुए हैं।
जब भी मंटो, फैज़, अमृता, साहिर, बड़े गुलाम अली खान, रेशमा व मेहंदी हसन की बात चलती है तो भी साझी विरासत करवटें लेती हैं। इन दिनों राखीगढ़ी की चर्चा के साथ-साथ हड़प्पा व मोहेन्जोदाड़ो की पुरातात्विक सांझेदारी, पुराना तक्षशिला, व्याकरण के धुरंधर विद्वान पाणिनी, सबका जिक्र सांझे पुलों के रूप में हो रहा है। मगर यह भी एक हकीकत है कि इतिहास में ‘रिवर्स-गियर’ नहीं होते। वैसे यह भी हकीकत ही है कि जहां पुराने रूप में लौटना नामुमकिन हो वहां कुछ साझे पुल या नए सब-स्टेशन बनाए जा सकते हैं। इसी अवधारणा को विशेष रूप में समर्थन देने वालों में भाजपा के शिखर पुरुष लालकृष्ण अडवाणी और पूर्व प्रधानमंत्री श्री अटल बिहारी वाजपेयी भी शामिल थे लेकिन पाकिस्तान में सैनिक-जुंडली व आईएसआई सरीखी संस्थाओं ने ऐसे सभी प्रयासों को ‘पंक्चर’ किया। ‘सदा-ए-सरहद’ और ‘समझौता एक्सप्रेस’ सरीखे ईमानदाराना प्रयास भी असफल रहे। अतीत में इससे पूर्व भी सांसद एचवी कामथ, डॉ. राममनोहर लोहिया व आचार्य कृपलानी ने भी प्रयास किए थे। इसी सिलसिले में क्रिकेट, हॉकी व ‘लिटरेचल फैस्टिवल्स’ की भी महत्वपूर्ण भूमिका रही।
उधर ‘ढाके की मलमल’ वाला बांग्लादेश एक अलग राष्ट्र बन गया। आप अनुमान लगाएं एक वक्त का दौर, काज़ी नज़रूल इस्लाम (वर्तमान बांग्लादेश) रवींद्रनाथ टैगोर, बंकिम चंद्र, फैज़, मंटो, कुरर्दल एन हैदर, अमृता प्रीतम, साहिर, इस्मत चुगतई आदि इसी एक 1947 पूर्व वाले एक ही देश का हिस्सा थे। 1947 में मजहब के आधार पर देश के दो टुकड़े हुए और फिर 1971 में पाकिस्तान भी दो हिस्सों में बंट गया, मगर यह दूसरा विभाजन ‘मज़हब’ के आधार पर नहीं हुआ। यह भाषा के आधार पर हुआ। बांग्लादेश के नाम से अस्तित्व में आए इस तीसरे राष्ट्र का गठन बंगला भाषाई व पंजाबी भाषाई क्षेत्र के टकराव के रूप में आया है। ‘टुकड़े-टुकड़े’ होने का यह सिलसिला अभी भी वर्तमान पाकिस्तान में भी जारी है। वहां एक ओर बलूचिस्तान की सुगबुगाहट जारी है तो दूसरी ओर पख्तून भी अलग होने के लिए बेचैन है।
उधर आतंकी संगठनों ने लाहौर, बहावलपुर व पाक-अधिकृत कश्मीर में अपनी-अपनी समानांतर सरकारें चला रखी हैं।
तीनों राष्ट्रों में भारत विकास, नवनिर्माण एवं अर्थव्यवस्था की दृष्टि से मजबूत है मगर भाषा, सम्प्रदाय व मजहब के आधार पर एकरूपता अभी भी एकाध दशक की मोहताज है। यह तो तय है कि इस देश के और टुकड़े अब नामुमकिन हैं। देश तो एक ही रहेगा मगर खींचतान कुछ अवधि तक चल सकती है। वर्तमान ढांचे में यह तो स्पष्ट हो ही गया है कि फिलहाल इसका कोई विकल्प नहीं है। जो विकल्प हैं वो भी ‘भोथरे’ हो चुके हैं।
इस पूरे उपमहाद्वीप में देर-सवेर एक ‘कान्फैडरेशन’ या ‘महासंघ’ की आवश्यकता शिद्दत से महसूस होने लगेगी। इस दिशा में जाने का थोड़ी पहलकदमी का रास्ता साहित्य, पुरातत्व, क्रिकेट व हॉकी से ही निकलेगा। तब बिस्मिल्लाह खान की शहनाई, बड़े गुलाम अली खान, पंडित ओंकारनाथ ठाकुर व किशोरीबाई अमोनकर का आलाप ही काम आएगा। लता ताई, नूरजहां, मुहम्मद रफी, किशोर दा, आशा भोंसले, आबिदा, रेशमां इस उपमहाद्वीप की साझी संस्कृति की खुशबू को कब तक दबाकर रखेंगे।
लव-कुश के बिना रामकथा अधूरी है। चलिए पंडित रवि शंकर व एआर रहमान (अब शायद पछता रहे होंगे) का साझा सुर-संगम भी इस माटी की सोंधी गंध में रचा बसा है।

Dr. Chander Trikha