मैंने फरवरी 2025 में एक लेख लिखा था-‘चिट्ठी लिखना बहुत याद आता हैÓ। उस लेख में मैंने पुराने समय की उन भावनाओं को याद किया था, जब हम अपने प्रियजनों को चिट्ठियां लिखते थे और हर शब्द में अपनापन झलकता था। उसी संदर्भ में आज एक दिलचस्प वीडियो देखने को मिला, जिसमें बताया गया कि फाउंटेन पेन उठाकर कागज पर लिखना न केवल एक भावनात्मक अनुभव है, बल्कि हमारे शरीर और विशेष रूप से दिमाग के लिए अत्यंत लाभदायक भी है। एक जानकारी के अनुसार, 2011 से 2019 के बीच जापान के प्रसिद्ध न्यूरोलॉजिस्ट डॉ. हिरोशी तनाका ने अपने शोध में पाया कि जो बुजुर्ग प्रतिदिन 10-15 मिनट हाथ से लिखते थे, उनमें डिमेंशिया और संज्ञानात्मक गिरावट (cognitive decline) के लक्षण बहुत कम या न के बराबर दिखाई दिए। संज्ञानात्मक क्षमता का हमारे जीवन में अत्यधिक महत्व है-यह न केवल हमारी याददाश्त को प्रभावित करती है, बल्कि हमारे सीखने, निर्णय लेने और नई परिस्थितियों में ढ़लने की क्षमता को भी निर्धारित करती है। इस शोध का एक और रोचक पहलू यह था कि इसमें शामिल लोगों की जीवनशैली एक जैसी नहीं थी। किसी का खान-पान संतुलित था तो किसी का नहीं; कुछ लोग नियमित रूप से व्यायाम करते थे, जबकि कुछ बिल्कुल भी सक्रिय नहीं थे। उनकी नींद की आदतें भी अलग-अलग थीं। लेकिन इन सब भिन्नताओं के बावजूद एक समानता स्पष्ट रूप से सामने आई-वे सभी हाथ से लिखते थे और टाइपिंग या मोबाइल संदेशों पर निर्भर नहीं थे। डॉ. तनाका के अनुसार, लिखना एक साधारण क्रिया नहीं है। यह एक ऐसा अभ्यास है जिसमें प्रयास, ध्यान और उद्देश्य तीनों का समन्वय आवश्यक होता है। जब हम पेन से कागज पर लिखते हैं, तो हर अक्षर हमारे दिमाग को सक्रिय करता है। हम सोचते हैं, शब्दों का चयन करते हैं, उन्हें आकार देते है-और यही पूरी प्रक्रिया हमारे मस्तिष्क के लिए एक प्रभावी व्यायाम बन जाती है। अपने अध्ययन में उन्होंने प्रतिभागियों को दो समूहों में बांटा-एक समूह जो नियमित रूप से टाइप करता था और दूसरा जो हाथ से लिखता था। छह महीने बाद जब दोनों समूहों का मूल्यांकन किया गया, तो यह पाया गया कि हाथ से लिखने वाले लोगों की याददाश्त अधिक तेज और स्पष्ट थी। ब्रेन स्कैन से यह भी स्पष्ट हुआ कि लिखने के दौरान मस्तिष्क के वे हिस्से सक्रिय होते हैं जो गतिशीलता, स्थानिक समझ, भाषा और स्मृति की गहरी प्रोसेसिंग से जुड़े होते हैं। टाइपिंग में यह गहराई अपेक्षाकृत कम होती है। ऐसे लोग न केवल नाम बेहतर याद रखते थे, बल्कि बोलने में भी अधिक सहज और प्रवाहपूर्ण थे। वे नई जानकारी को जल्दी समझकर उसे अपने जीवन में लागू कर लेते थे। उनकी दिनचर्या अधिक व्यवस्थित और कम भ्रमपूर्ण होती थी।
इससे यह स्पष्ट संकेत मिलता है कि उम्र के साथ याददाश्त का कम होना अनिवार्य नहीं है। कई बार इसका कारण केवल दिमाग का कम उपयोग होता है। हमारा मस्तिष्क एक मांसपेशी की तरह है-जितना अधिक हम उसका उपयोग करेंगे, वह उतना ही मजबूत और सक्रिय बना रहेगा। कुछ ही महीने पहले मेरी मुलाकात 97 वर्षीय उद्योगपति लक्ष्मी नारायण झुनझुनवाला जी से हुई। इस आयु में भी वे प्रतिदिन सुबह और शाम तीन-तीन घंटे पढ़ते और लिखते हैं। उनकी डायरी को देखकर उनकी सुंदर और सुस्पष्ट लिखावट ने मुझे आश्चर्यचकित कर दिया। वे आज भी समसामयिक विषयों पर पूरी स्पष्टता और आत्मविश्वास के साथ चर्चा करते हैं। हम अपने स्कूल के दिनों को याद करें तो पाएंगे कि जब भी हम किसी शब्द की वर्तनी भूल जाते थे, तो शिक्षक हमें उसे बार-बार लिखने के लिए कहते थे। वास्तव में वही हमारी स्मृति को मजबूत करने का सबसे प्रभावी तरीका था। आज के डिजिटल युग में, जहां मोबाइल और कंप्यूटर ने हमारे जीवन को आसान बना दिया है, वहीं उन्होंने हमारी कुछ अच्छी आदतों को भी पीछे छोड़ दिया है।
आज बच्चे और युवा लिखने की बजाय टाइपिंग पर अधिक निर्भर हो गए हैं। यहां तक कि परीक्षाओं की पद्धति भी धीरे-धीरे बदल रही है। भविष्य में संभव है कि लिखना और भी कम हो जाए। लेकिन इन सबके बीच यह संकल्प लें-रोजाना संकल्प लें-रोजाना आवश्यक है कि हम अपनी लेखनी को कभी बंद न होने दें। तो आइए, आज से ही एक छोटा सा संकल्प लें-रोजाना पेन से कागज पर लिखें।























