मुफ्त-मुफ्त-मुफ्त चुनाव आते ही सत्तारूढ़ दल हो या विपक्षी दल सभी सेल लगा देते हैं। रस्ते का माल सस्ते में की तर्ज पर मतदाताओं को आकर्षित करने के लिए बड़े-बड़े वायदे किए जाते हैं। मुफ्त की रेवडि़यां बांटने का सिलसिला वर्षों पहले दक्षिण भारतीय राज्यों से शुरु हुआ था जो लगभग अब हर राज्य में फैल चुका है। अब ऐसी आशंकाएं व्यक्त की जाने लगी हैं कि अगर ऐसे ही चलता रहा तो एक दिन राज्यों का दिवाला पिट जाएगा। आदमी जब मुफ्त भोगी बन जाता है तो कामचोर बनना उसकी आदत बन जाती है। मुफ्त में कोई भी पिलाए, पीने वालों की कोई कमी नहीं भले ही व जहर क्यों न हो।
जनता को भी मुफ्त की रेवड़ियों की घोषणा का बेसब्री से इंतजार रहता है। जब महाराष्ट्र और झारखंड के चुनाव होने वाले थे तो वहां भी मुफ्त की रेवडि़यों का ऐलान किया गया। महाराष्ट्र चुनाव के लिए लाड़ली बहन योजना पर जबरदस्त जोर दिया गया। राज्यों के चुनावों की छोड़ दें तो देश की राजनीति में मुफ्त अनाज योजना, मुफ्त गैस योजना और अन्य कई योजनाओं ने भाजपा की जीत में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। ऐसे में विपक्ष शासित राज्य भी कैसे पीछे रह सकते हैं। सुप्रीम कोर्ट ने एक बार फिर चुनावों से ठीक पहले राजनीतिक दलों द्वारा फ्री बीज की घोषणा करने पर सख्त नाराजगी व्यक्त करते हुए स्पष्ट कहा है कि जरूरतमंद और सक्षम लोगों में फर्क किए बिना सबको मुफ्त सुविधाएं बांटना तुष्टिकरण है जो देश की अर्थव्यवस्था को बर्बाद कर सकता है।
चीफ जस्टिस सूर्यकांत की पीठ ने बहुत ही कड़वा लेकिन व्यावहारिक सवाल उठाया है। कोर्ट ने पूछा कि अगर सरकार हर चीज मुफ्त देगी और सीधे खाते में पैसे भेजेगी, तो लोग मेहनत और काम क्यों करेंगे? चीफ जस्टिस ने कहा कि लोगों को काम के अवसर देना ज्यादा जरूरी है ताकि वे सम्मान के साथ जी सकें। मुफ्त राशन, गैस और बिजली की आदत लोगों से काम करने की प्रेरणा छीन सकती है, जो किसी भी देश के भविष्य के लिए अच्छा संकेत नहीं है। सुनवाई के दौरान तमिलनाडु में सबके बिजली बिल राज्य सरकार द्वारा भरने की नीति पर सवाल उठे। कोर्ट ने पूछा कि क्या यह वाकई जनहित में है कि जो लोग बिल भरने में सक्षम हैं, उनका बोझ भी सरकार उठाए? जज साहब ने स्पष्ट किया कि एक कल्याणकारी राज्य का कर्त्तव्य गरीब बच्चों की पढ़ाई और बीमारों की मदद करना है लेकिन जो लोग भुगतान कर सकते हैं, उनसे लागत वसूलना राष्ट्र निर्माण के लिए बेहद जरूरी है।
सुप्रीम कोर्ट ने घाटे में चल रहे राज्यों की वित्तीय स्थिति पर भी चिंता जताई। बजट से ठीक पहले आई रिजर्व बैंक की रिपोर्ट काफी चिंताजनक है कि देश के ज्यादातर राज्य और केंद्र शासित प्रदेश कर्ज के बोझ से दबे हुए हैं। यह रिपोर्ट बताती है कि राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों की वित्तीय आवश्यकताएं बढ़ती जा रही हैं, ऐसे में, ये अपनी फंडिंग के लिए बाजार से लिये जाने वाले कर्ज पर अधिक से अधिक निर्भर होते जा रहे हैं। रिपोर्ट में बताया गया है कि राज्यों के कुल राजकोषीय घाटे का लगभग 76 प्रतिशत हिस्सा इसी उधारी से पूरा किया जायेगा। आंकड़ों के मुताबिक, मार्च, 2024 में राज्यों का कुल कर्ज घटकर जीडीपी के 28.1 प्रतिशत पर आ गया था, लेकिन अनुमान लगाया गया है कि मार्च, 2026 तक यह बढ़कर लगभग 29.2 प्रतिशत हो जायेगा। कई राज्यों का कर्ज तो उनकी अपनी अर्थव्यवस्था के 30 प्रतिशत से भी अधिक है। फिलहाल तमिलनाडु और महाराष्ट्र जैसे राज्य बाजार से कर्ज लेने के मामले में अव्वल हैं। वहीं मध्य प्रदेश, झारखंड, उत्तराखंड और कर्नाटक जैसे राज्यों का कर्ज भी तेजी से बढ़ता जा रहा है। रिपोर्ट के अनुसार, जिन राज्यों में युवाओं की आबादी ज्यादा है, वे राज्य कम कर्ज ले रहे हैं, जबकि बुजुर्गों की ज्यादा आबादी वाले राज्यों की आर्थिक चुनौतियां बढ़ रही हैं। अगर राज्यों के पास स्कूलों, अस्पतालों आैर सड़कों के निर्माण के लिए पैसा नहीं है या उन्हें विकास परियोजनाओं के लिए बाजार से पैसा जुटाना पड़ता है तो फिर राज्यों के पास मुफ्त योजनाओं के लिए धन कहां से आता है। जब लोगों को बिना मेहनत किए ही सुविधाएं मिलने लगती हैं तब उनकी कार्यक्षमता और उत्पादकता प्रभावित होती है लेकिन यह सब देश के आर्थिक विकास को बाधित करती हैं और सामाजिक स्थिरता पर भी खतरा बढ़ जाता है। अब हर राज्य लैपटॉप, मोबाइल, फोन, स्कूटी, साइकिल और यहां तक सीधे खातों में कैश ट्रांसफर करने की घोषणाएं कर रहे हैं। अब तमिलनाडु, पश्चिम बंगाल के चुनाव आने वाले हैं। इसलिए फ्री बीज की घोषणाओं की होड़ शुरू हो जाएगी। तमिलनाडु पर पहले ही बहुत कर्ज है। अर्थशशास्त्री भी बार-बार ऐसी नीतियों के खिलाफ चेतावनी दे रहे हैं। आर्थिक विशेषज्ञ आंकड़े देकर सतर्क कर रहे हैं कि अमेरिका का कर्ज 36 ट्रिलियन डालर है। ब्याज चुकाने में उनकी कमाई का 22 प्रतिशत हिस्सा चला जाता है। जबकि भारत का कर्ज 180 लाख करोड़ के लगभग है और उस पर ब्याज चुकाने में 40 प्रतिशत हिस्सा चला जाता है जो अमेरिका से लगभग दो गुणा है। मुफ्तखोरी की संस्कृति आर्थिक तबाही का रास्ता है। यह कहना भी गलत होगा कि सभी मुफ्त योजनाएं समाज के लिए नुक्सानदायक हैं। कुछ योजनाएं वास्तव में गरीबों और जरूरतमंदों की मदद करती हैंै।
जैसे कि शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाएं आैर जी राम जी जैसी रोजगार गारंटी योजनाएं। इनका उद्देश्य समाज के कमजोर वर्गों को लाभ देना है लेकिन चुनावी फायदे के लिए मुफ्त में चीजें बांटना और बिना किसी दीर्घकालिक योजना के संसाधनों को लुटाना स्थायी नीति नहीं हो सकती। फ्री बीज को लेकर बहस जारी है कि चुनावी वायदे जनता की भलाई के लिए हैं या फिर वोट जुटाने के लिए रेवड़ी बांटने की कवायद है। देश में बेरोजगारी का संकट पहले ही है। जबकि लोगों को खैरात नहीं रोजगार चाहिए। बेहतर होगा कि राजनीतिक दल मुफ्त योजननों की बजाय व्यावसायिक प्रशिक्षण और कौशल विकास पर निवेश की तरफ ज्यादा ध्यान दें ताकि लोग अपने पांव पर खड़े हो सकें। राजनीतिक दलों को अपनी यह नीतियां छोड़नी होंगी।
रेवड़ी कल्चर के खतरे
Summary :
मुफ्त-मुफ्त-मुफ्त चुनाव आते ही सत्तारूढ़ दल हो या विपक्षी दल सभी सेल लगा देते हैं। रस्ते का माल सस्ते में की तर्ज पर मतदाताओं को आकर्षित करने के लिए बड़े-बड़े वायदे किए जाते हैं। मुफ्त की रेवडि़यां बांटने का सिलसिला वर्षों पहले दक्षिण भारतीय राज्यों से शुरु हुआ था जो लगभग अब हर राज्य में फैल चुका है। अब ऐसी आशंकाएं व्यक्त की जाने लगी हैं कि अगर ऐसे ही चलता रहा तो एक दिन राज्यों का दिवाला पिट जाएगा। आदमी जब मुफ्त भोगी बन जाता है तो कामचोर बनना उसकी आदत बन जाती है। मुफ्त में कोई भी पिलाए,…


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