दिल्ली में मतदाता सूची में सुधार के लिए चलाए गए गहन पुनरीक्षण यानि एसआईआर के बाद जारी की जाने वाली ड्राफ्ट वोटर लिस्ट से 47.7 लाख नाम फिलहाल बाहर कर दिए गए हैं। दिल्ली के करीब 1.45 करोड़ पुराने मतदाताओं में से लगभग 97.5 लाख लोगों के नाम ड्राफ्ट में शामिल किए गए हैं। जिन मतदाताओं के नाम ड्राफ्ट सूची में शामिल नहीं किए गए उन लोगों को 31 अगस्त से 30 सितम्बर तक अपने दावे और आपत्तियां दर्ज कराने का समय दिया गया है। इन लोगों के फार्म या तो जमा नहीं हो पाए या उनसे सम्पर्क नहीं हो सका है। इन लोगों को अनुपस्थित, स्थानांतरित, मृत और दोहरे नाम तथा अन्य कारणों वाली श्रेणी में रखा गया है। राजधानी दिल्ली को लघु भारत कहा जाता है, क्योंकि यहां देश के विभिन्न राज्यों के लोग रोजी-रोटी की तलाश में आए और यहीं के होकर रह गए। यहां के मतदाताओं को काफी प्रबुद्ध माना जाता है। दिल्ली के जनादेश को भारत के जनादेश का संकेत माना जाता है लेकिन एसआईआर के आंकड़ों में दिल्ली के अलग-अलग विधानसभा क्षेत्रों में एसआईआर के आंकड़ों में काफी अंतर मिला। कुछ अल्पसंख्यक इलाकों में एसआईआर के आंकड़ों में बड़ा अंतर देखने को मिला। इन इलाकों में लाखों नाम ड्राफ्ट सूची से बाहर कर दिए गए हैं। कहा जा रहा है कि इनके फार्म जमा ही नहीं हो पाए। विभिन्न राज्यों में हुए एसआईआर को लेकर पहले ही विवाद हो चुका है।
पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनावों से पहले काफी लोगों के नाम काटे गए थे। एसआईआर में 27 लाख लोगों के नाम हटा दिए गए थे। ऐसे लोगों को अपना दावा और आपत्तियां दर्ज कराने का मौका दिया गया था। मामला सुप्रीम कोर्ट तक जा पहुंचा था। शीर्ष अदालत ने निर्वाचन आयोग को कड़े निर्देश भी दिए थे। मामला अब भी सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन है। अब आरटीआई के माध्यम से आए जवाब से पता चलता है कि चुनाव आयोग द्वारा गठित न्यायाधिकरणों के पास जिन लोगों ने अपना दावा पेश किया उनमें से करीब 91 प्रतिशत दावे सही साबित हुए और उनके नाम वोटर लिस्ट से जोड़ दिए गए हैं। चुनाव आयोग द्वारा दिए गए आंकड़ों के मुताबिक न्यायाधिकरणों ने अब तक 82782 अपीलों का निपटारा किया है। इनमें से 91 फीसदी यानि 7544 नाम मतदाता सूची में बहाल कर दिए गए हैं। यह जानकारी मिलते ही विपक्ष भड़का हुआ है और इसे भयंकर वोट चोरी करार दिया गया है। अभी न्यायाधिकरणों के पास काफी अपीलें लम्बित पड़ी हुई हैं। निपटाए गए मामलों में 91 प्रतिशत लोगों के नाम वापिस जुड़ना यह दर्शाता है कि योग्य और वास्तविक मतदाताओं के नाम गलत तरीके से हटाए गए और उन्हें मताधिकार से वंचित किया गया। सुप्रीम कोर्ट ने भी इस पर कड़ी टिप्पणी की है। सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम सवाल उठाते हुए पूछा है कि क्या न्यायापालिका नए चुनाव का निर्देश दे सकती है? खासकर तब जब कई सीटों पर हटाए गए वोटरों की संख्या जीत के अंतर का ज्यादा होने का दावा किया जा रहा है। याचिकाकर्ता ने 31 विधानसभा क्षेत्रों का ब्यौरा दिया, जिनमें भाजपा उम्मीदवारों की जीत का अंतर एसआईआर के दौरान हटाए गए वोटरों की संख्या से कम था। जस्टिस जॉयमाल्या बागची ने उदाहरण देते हुए कहा कि अगर 100 नाम हटे और जीत का अंतर 50 रहा हो और 60-70 लोगों ने अपील की तो मामला अहम बन जाता है।
बिहार विधानसभा चुनावों से पहले भी काफी विवाद हुआ था। चुनाव आयोग द्वारा संचालित एसआईआर प्रक्रिया देश के कई हिस्सों में मतदाताओं के मताधिकार के हनन का स्पष्ट कारण बन रही है। भारत के सर्वोच्च न्यायालय के फैसले के बाद इस प्रक्रिया को आगे बढ़ाने की अनुमति मिलने के बाद, तेलंगाना और कर्नाटक की मतदाता सूचियों से एसआईआर द्वारा हर पांचवां नाम हटा दिया गया है। क्रमशः लगभग 22 प्रतिशत और 19.5 प्रतिशत, जो देश में सबसे अधिक है। सबसे अधिक कटौती इन राज्यों की राजधानियों में हुई है बेंगलुरू की पांच विधानसभा सीटों से आधे से अधिक मतदाता हटा दिए गए हैं, जबकि हैदराबाद की 15 में से 9 सीटों से 40 प्रतिशत से अधिक नाम हटा दिए गए हैं। इस तरह की कटौती को केवल मतदाता सूचियों में अनावश्यक रूप से किए गए बदलावों की छंटनी नहीं कहा जा सकता। यदि ये आंकड़े सटीक हैं तो चुनाव आयोग की अपनी संक्षिप्त पुनरीक्षण प्रक्रियाओं से हाल के चुनावों में मतदाता सूचियां अव्यवस्थित पाई गईं, और ऐसा उन स्थानों पर हुआ जहां भारत के बाकी हिस्सों से भारी संख्या में लोग मतदाता सूची में आए हैं और यदि नाम हटाने को उचित ठहराया जाए तो मतदाता सूची से हटाए गए लोगों को राज्य छोड़ना होगा। कर्नाटक या तेलंगाना के भीतर स्थानांतरण से मतदाता का नाम केवल उसी राज्य की मतदाता सूची में स्थानांतरित होगा, न कि पूरी तरह से हटाया जाएगा। फिर भी, यह न तो हालिया सर्वेक्षण आंकड़ों से और न ही सरकार के स्वयं के जनसंख्या अनुमानों से समर्थित है।
लोकतंत्र तभी स्वस्थ और मजबूत होगा जब निर्वाचन आयोग अपना काम निष्पक्ष और ईमानदारी से करे। निर्वाचन आयोग पर वोट चोरी के बार-बार आरोप लगाना लोकतंत्र के लिए अच्छे संकेत नहीं हैं। इतनी बड़ी संख्या में मतदाताओं के नाम हटाया जाना और विसंगतिपूर्ण प्रक्रिया के चलते लोगों को मताधिकार से वंचित करना अच्छा नहीं है। इससे चुनाव आयोग की साख प्रभावित हुई है। दिल्ली में एसआईआर को लेकर कोई विवाद न हो तो बेहतर यही होगा कि चुनाव आयोग एसआईआर की प्रक्रिया पारदर्शी ढंग से पूरी करे और दिल्ली के मतदाता को भी चाहिए कि वह जल्दी से जल्दी तय समय में अपना दावा दाखिल करे और जरूरी दस्तावेजों के साथ अपना नाम मतदाता सूची में शामिल कराने की प्रक्रिया पूरी करे।
दिल्ली में एसआईआर
Summary :
दिल्ली में मतदाता सूची में सुधार के लिए चलाए गए गहन पुनरीक्षण यानि एसआईआर के बाद जारी की जाने वाली ड्राफ्ट वोटर लिस्ट से 47.7 लाख नाम फिलहाल बाहर कर दिए गए हैं। दिल्ली के करीब 1.45 करोड़ पुराने मतदाताओं में से लगभग 97.5 लाख लोगों के नाम ड्राफ्ट में शामिल किए गए हैं। जिन मतदाताओं के नाम ड्राफ्ट सूची में शामिल नहीं किए गए उन लोगों को 31 अगस्त से 30 सितम्बर तक अपने दावे और आपत्तियां दर्ज कराने का समय दिया गया है। इन लोगों के फार्म या तो जमा नहीं हो पाए या उनसे सम्पर्क नहीं हो…


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