दिल्ली-पैरिस सपनों की उड़ान

Summary :

भारत और फ्रांस ने 1947 में ही भारत की स्वतंत्रता के तुरंत बाद राजनयिक संबंध स्थापित कर लिए थे। वर्ष 1998 में शुरू हुई फ्रांस के साथ रणनीतिक साझेदारी भारत की किसी पश्चिमी देश के साथ पहली और फ्रांस की यूरोपीय संघ से बाहर पहली साझेदारी थी। इस रणनीतिक साझेदारी में दोनों देशों का दृष्टिकोण शामिल रहा जिसके तहत वे मजबूत द्विपक्षीय सहयोग के माध्यम से अपनी-अपनी रणनीतिक स्वायत्तता को बढ़ाना चाहते थे। रक्षा एवं संरक्षा, नागरिक परमाणु मामले और अंतरिक्ष इस रणनीतिक सहयोग के प्रमुख स्तम्भ रहे। अब इस साझेदारी का विस्तार काफी व्यापक हो चुका है। फ्रांसीसी राष्ट्रपति…

भारत और फ्रांस ने 1947 में ही भारत की स्वतंत्रता के तुरंत बाद राजनयिक संबंध स्थापित कर लिए थे। वर्ष 1998 में शुरू हुई फ्रांस के साथ रणनीतिक साझेदारी भारत की किसी पश्चिमी देश के साथ पहली और फ्रांस की यूरोपीय संघ से बाहर पहली साझेदारी थी। इस रणनीतिक साझेदारी में दोनों देशों का दृष्टिकोण शामिल रहा जिसके तहत वे मजबूत द्विपक्षीय सहयोग के माध्यम से अपनी-अपनी रणनीतिक स्वायत्तता को बढ़ाना चाहते थे। रक्षा एवं संरक्षा, नागरिक परमाणु मामले और अंतरिक्ष इस रणनीतिक सहयोग के प्रमुख स्तम्भ रहे। अब इस साझेदारी का विस्तार काफी व्यापक हो चुका है।

फ्रांसीसी राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने मुम्बई में दोनों देशों के रिश्तों को स्पेशल ग्लोबल स्ट्रैटजिक पार्टनरशिप की और ऊंची उड़ान पर ले जाने का ऐलान किया। दोनों देश अब एक ऐसी ताकत बन गए हैं जो ग्लोबल आर्डर को बदलने की ताकत रखते हैं। दोनों देशों की दोस्ती अब समंदर की गहराइयों से लेकर आसमान की ऊंची उड़ान तक विस्तार पा चुकी है। भारत और फ्रांस में राफेल से लेकर पनडुब्बी निर्माण समेत 21 समझौते हुए हैं। मैक्रों की यह यात्रा केवल आपसी संबंध बढ़ाने तक सीमिति नहीं है।

यह भारत की उस खोज को दर्शाती है जिसे “बहुध्रुवीय पश्चिम” कहा जा सकता है। यूरोप को अब केवल वाशिंगटन का सहयोगी या अमेरिका-चीन प्रतिद्वंद्विता के मैदान में एक निष्क्रिय खिलाड़ी के रूप में नहीं देखा जाता है। यह अपने आप में एक महत्वपूर्ण वैश्विक शक्ति है जो भारत के आर्थिक और तकनीकी परिवर्तन में योगदान देने के साथ-साथ दिल्ली के लिए विदेशों में अपनी रणनीति को व्यापक बनाने में सक्षम है। यह याद रखना महत्वपूर्ण है कि रूस और चीन द्वारा इसे अपनी कूटनीति का मुख्य विषय बनाने से बहुत पहले ही फ्रांस “बहुध्रुवीय विश्व” के पक्ष में राजनीतिक सक्रियता के शुरुआती समर्थकों में से एक था।

पेरिस ने लगातार यूरोपीय “रणनीतिक स्वायत्तता” की वकालत भी की है। इस साझा शब्दावली ने दिल्ली और पेरिस के बीच कुछ हद तक सहजता का माहौल बनाया है। डिफेंस के क्षेत्र में भारत और फ्रांस का साथ अब तक का सबसे सफल मॉडल रहा है। साझा बयान में इस बात पर जोर दिया गया कि अब सहयोग सिर्फ खरीद-बिक्री तक सीमित नहीं रहेगा। अब फोकस को-डिजाइन, को-डेवलपमेंट और को-प्रोडक्शन पर होगा। सबसे बड़ी खबर यह है कि दोनों देशों ने जेट इंजन और हेलीकॉप्टर इंजन के लिए बड़े स्तर पर हाथ मिलाया है। 26 राफेल-मैरीन फाइटर जेट्स के कॉन्ट्रैक्ट की पुष्टि के साथ ही अब फाइटर एयरक्राफ्ट इंजन बनाने की दिशा में भी बात आगे बढ़ी है।

सैफरन ग्रुप और हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड मिलकर इंडियन मल्टी रोल हेलीकॉप्टर के लिए इंजन विकसित करेंगे। इतना ही नहीं, भारत में राफेल विमानों में लगने वाले एम-88 इंजन की मेंटेनेंस, रिपेयर और ओवरहाल सुविधा भी स्थापित की जाएगी। टाटा और एयरबस मिलकर ‘मेक इन इंडिया’ के तहत एच-125 फाइनल असेंबली लाइन शुरू कर चुके हैं। यह प्राइवेट सेक्टर में हेलीकॉप्टर बनाने की भारत की पहली ऐसी सुविधा है। वहीं, स्कॉर्पीन पनडुब्बी प्रोग्राम की सफलता को आगे बढ़ाते हुए नई पनडुब्बियों के निर्माण पर भी सहमति बनी है।

फ्रांस ने भारत के पिनाका मल्टी बैरल रॉकेट लॉन्चर में भी अपनी गहरी रुचि दिखाई है। इसका मतलब है कि भविष्य में भारत के हथियार फ्रांस की सेना की भी ताकत बन सकते हैं। यद्यपि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप फ्रांस और अन्य यूरोपीय देशों पर दबाव डालते रहते हैं और पश्चिमी जगत पर अपना वर्चस्व कायम करना चाहते हैं। इसके बावजूद दिल्ली और पैरिस की साझेदारी अमेरिका के विरोध में न होकर एक अपना नया मार्ग तलाशना है। यह फ्रांस की भू राजनीतिक सोच में परिवर्तन का संकेत देता है। इमैनुएल मैक्रों ने दिल्ली में चल रहे एआई ग्लोबल समिट में भी भाग लिया। एआई में अभी तक अमेरिका और चीन का वर्चस्व है।

अमेरिका के कार्पोरेट सैक्टर और चीन के सत्ता नियंत्रण के बीच भारत-फ्रांस एक ऐसे एआई ढांचे का विकास चाहते हैं जो संप्रभुता की रक्षा करते हुए नवाचार को प्रोत्साहित करें। भारत के पास यूरोप और अन्य देशों के साथ एआई में काम करने की काफी संभावनाएं मौजूद हैं। यही कारण है कि भारत फ्रांस ने आगे बढ़कर आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस क्षेत्र में समझौता किया है। प्रधानमंत्री मोदी और मैक्रों ने एक सुरक्षित और भरोसेमंद एआई बनाने पर जोर दिया है जो मानव के काम आए। आतंकवाद, हिन्द प्रशांत क्षेत्र के मुद्दे पर भी फ्रांस और भारत के विचार एक समान हैं। भारत प्रशांत क्षेत्र में दोनों देश नियम आधारित व्यवस्था चाहते हैं।

इसका सीधा अर्थ यह है कि दक्षिणी चीन सागर और हिन्द महासागर में चीन की दादागिरी नहीं चलने दी जाएगी। फ्रांस ने एक बार फिर संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में भारत की स्थायी सदस्यता का पुरजोर समर्थन किया है। मैक्रों ने भारतीय लोगों और छात्रों के लिए वीजा फ्री ट्रांजिट की सुविधा की घोषणा की है। फ्रांस ने 2030 तक 30 हजार भारतीय छात्रों को बुलाने का लक्ष्य रखा है। यह दोस्ती तकनीकी सुरक्षा और अर्थव्यवस्था के हर मोर्चे पर भारत को ताकतवर बनाने की क्षमता रखती है। भारत राजनीतिक रूप से फ्रांस के साथ एक स्थिर और प्रगतिशील साझेदारी का ​निर्माण कर सकता है। इससे पूरी दुनिया में ग्लोबल आर्डर को नई दिशा मिल सकती है।

Aditya Chopra

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