दीपावली अब विश्व धरोहर है

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विरासत चाहे वह मूर्त हो या अमूर्त, सांस्कृतिक हो या प्राकृतिक वास्तव में प्राचीन और आधुनिक सभ्यताओं के बीच एक महत्वपूर्ण पुल का काम करती है। ये पुल संस्कृतियों के बीच संवाद को बढ़ावा देते हैं, जिससे विभिन्न सभ्यताओं के बीच समझ और सम्मान बढ़ता है। इसमें दो राय नहीं है कि विरासतें केवल अतीत के अवशेष नहीं हैं, बल्कि वे जीवित प्रेरणा स्रोत हैं जो वर्तमान को आकार देते हैं और भविष्य की राह रोशन करते हैं। इसी आलोक में भारत का प्रमुख त्याैहार दिवाली अब यूनेस्को की अमूर्त सांस्कृतिक धरोहर सूची में शामिल हो गया है। यह भारत…

विरासत चाहे वह मूर्त हो या अमूर्त, सांस्कृतिक हो या प्राकृतिक वास्तव में प्राचीन और आधुनिक सभ्यताओं के बीच एक महत्वपूर्ण पुल का काम करती है। ये पुल संस्कृतियों के बीच संवाद को बढ़ावा देते हैं, जिससे विभिन्न सभ्यताओं के बीच समझ और सम्मान बढ़ता है। इसमें दो राय नहीं है कि विरासतें केवल अतीत के अवशेष नहीं हैं, बल्कि वे जीवित प्रेरणा स्रोत हैं जो वर्तमान को आकार देते हैं और भविष्य की राह रोशन करते हैं। इसी आलोक में भारत का प्रमुख त्याैहार दिवाली अब यूनेस्को की अमूर्त सांस्कृतिक धरोहर सूची में शामिल हो गया है। यह भारत के लिए एक ऐतिहासिक और गर्व का क्षण है, क्योंकि अब दिवाली को एक वैश्विक पहचान मिल गई है। जो संस्कृति और विरासत के संरक्षण में अग्रणी इस सम्मान का यूनेस्को ने खुद ऐलान किया है । यूनेस्को ने ट्वीट कर के बताया, “अमूर्त विरासत सूची में नया शिलालेखः दीपावली, भारत। बधाई!”

दीपावली भारत में सबसे बड़े और सबसे प्रिय त्याैहारों में से एक है। यह त्यौहार मुख्य रूप से हिंदू धर्म के अनुयायी मनाते हैं, हालांकि अन्य धर्मों के लोग भी इसे अपने-अपने तरीके से मनाते हैं। दीपावली का अर्थ होता है ‘दीपों की पंक्ति’, और यह अंधकार से प्रकाश की ओर जाने का प्रतीक है। दीपावली के दिन, लोग घरों को साफ करते हैं, दीयों और मोमबत्तियों से सजाते हैं, और अपनों के साथ मिठाइयों का आदान-प्रदान करते हैं। भगवान श्रीराम के अयोध्या लौटने की खुशी, दीपों की रोशनी, और अंधकार पर प्रकाश की जीत, दिवाली का यही संदेश आज पूरी दुनिया तक पहुंच रहा है। यह सिर्फ एक त्यौहार नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति की उस चमक का प्रतीक है जो सदियों से प्रकृति, विज्ञान और संतुलन को साथ लेकर चलती आई है।

दिवाली प्रकृति के अहसासों के अनुरूप अंधेरे के खिलाफ उजाले की जंग की प्रतीक। समाज में समता का संदेश की गरीब के घर भी भरपूर रोशनी पहुंचे। किसी भी समाज में कुम्हार, मूर्तिकार,खील बताशे वाले से लेकर व्यापारी के घर तक लक्ष्मी पहुंचे। उल्लेखनीय है कि दिवाली को यह स्थान मिलने से पहले कुंभ मेले समेत देश की 15 धरोहरें इस सूची में शामिल हैं। यहां इस बात का उल्लेख करना भी प्रासंगिक है कि इस वर्ष 19 अक्तूबर को दीपोत्सव पर अयोध्या में सरयू की राम पैड़ी पर जब 26.17 लाख दीये जलाये गए थे तो इस उपलब्धि का प्रकाश पूरी दुनिया में फैला था। गिनीज बुक आफ विश्व रिकॉर्ड में आयोजन दर्ज हुआ था। इस के बाद ही संयुक्त राष्ट्र शैक्षिक, वैज्ञानिक तथा सांस्कृतिक संगठन यानी यूनेस्को ने अमूर्त विश्व धरोहर सूची में दिवाली को शामिल किया है। इससे पहले कुंभ मेला, वैदिक मंत्रोच्चार, रामलीला,छाऊ नृत्य, दुर्गा पूजा आदि इस सूची में शामिल है।

उल्लेखनीय है कि भारत यूनेस्को की इंटर-गवर्नमेंटल कमेटी फॉर इनटेंजिबल हेरीटेज की बीसवीं बैठक की दिल्ली में मेजबानी कर रहा है, जो 13 दिसंबर को समाप्त होगी। दिवाली को संस्कृति और प्रकृति से जुड़ा मानकर देश के विभिन्न भागों में दस दिसंबर को दीपावली समारोह आयोजित करने का भी फैसला लिया गया था। मकसद यही था कि ताकि विश्व के सामने इस पर्व को मजबूत सांस्कृतिक पहचान के रूप में पेश किया जा सके। निस्संदेह, दिवाली न केवल संस्कृति-प्रकृति से जुड़ी है बल्कि ज्ञान व सनातन धर्म की भी पर्याय है। निस्संदेह, इस घोषणा से इस पर्व को वैश्विक मान्यता मिल सकेगी। दरअसल, यूनेस्को ऐसी सांस्कृतिक व पारंपरिक चीजों को इस सूची में शामिल करता है जो मूर्त रूप में तो नहीं होती, मगर किसी समाज में उसकी व्यापक मान्यता होती है। वास्तव में, यूनेस्को के ऐसे प्रयासों का मकसद यही रहा है कि आने वाले समय में दुनिया की महत्वपूर्ण सांस्कृतिक धरोहरें सुरक्षित रहें। जिससे भविष्य की पीढ़ियों को इसका लाभ मिल सके।

दरअसल, इस घोषणा के बाद भारत दीपावली के निहितार्थ अंधकार से प्रकाश की ओर जाने के संदेश को पूरी दुनिया को दे सकेगा। इस बार की सूची में दुनिया की जीवित परंपराओं, सामाजिक प्रथाओं, त्योहारों, लोककला व पारंपरिक ज्ञान प्रणालियों को सुरक्षित रखने वाली दुनिया की बीस अमूर्त विरासतों को इस सूची में जगह दी गई। कई पीढ़ियों से सहेजी गई विरासत को नई पीढ़ी तक पहुंचाने का एक सार्थक प्रयास है यूनेस्को की पहल। निस्संदेह, ये धरोहरें विश्व के विभिन्न समुदायों की पहचान का हिस्सा हैं। सही मायनों में वैश्वीकरण के दौर में सांस्कृतिक विविधता को अक्षुण्ण बनाये रखने में मददगार साबित होंगी।

यूनेस्को की अमूर्त सांस्कृतिक धरोहर सूची में अब केवल भारत का दिवाली त्यौहार ही शामिल नहीं हुआ है, बल्कि कई अन्य देशों के सांस्कृतिक प्रतीकों को भी सम्मानित किया गया है। उदाहरण के लिए, आइसलैंड की स्विमिंग पूल संस्कृति, हैती के कॉम्पस संगीत, और मिस्र का कोशरी व्यंजन भी इस सूची में शामिल किए गए हैं। यह सूची दुनिया भर की उन सांस्कृतिक धरोहरों को मान्यता देती है जो मानवता की धरोहर का हिस्सा हैं, और जिन्हें आने वाली पीढ़ियों तक संरक्षित किया जाना चाहिए। भारत इस समय अमूर्त सांस्कृतिक धरोहर के संरक्षण पर ध्यान केंद्रित कर रहा है और इसके लिए भारत 2025 में यूनेस्को के सत्र की मेजबानी करेगा। भारत के राजदूत और स्थायी प्रतिनिधि विशाल वी शर्मा इस सत्र की अध्यक्षता करेंगे। इससे भारत को अपनी सांस्कृतिक धरोहर और भी मजबूत तरीके से वैश्विक मंच पर प्रस्तुत करने का अवसर मिलेगा।

यूनेस्को की सूची में दीपावली का स्थान भारत के लिए ही नहीं, बल्कि दुनिया भर के उन देशों के लिए गर्व का कारण है, जो इस त्यौहार को मनाते हैं। भारत में दीपावली के दिन त्यौहार की रंगीनी और उल्लास हर गली-गली में दिखता है। वहीं, दुनिया के कई देशों में भी भारतीय समुदाय दीपावली मनाते हैं, जिससे यह त्योहार एक वैश्विक घटना बन चुका है। दीपावली का सांस्कृतिक महत्व केवल भारत तक ही सीमित नहीं है, बल्कि यह दुनियाभर के कई समुदायों के बीच भाईचारे और एकता का प्रतीक बन गया है। निश्चय ही भारतीय संस्कृति की अमिट धरोहर वाले पर्व दीपावली का विश्व धरोहर की सूची में शामिल होना भारतीयों के लिए गर्व की बात है। यह सम्मान न केवल दीपावली के महत्व को प्रमाणित करता है, बल्कि भारतीय संस्कृति की समृद्धि और विविधता को भी विश्वस्तर पर स्थापित करता है। जिसकी बानगी दिल्ली व देश के अन्य भागों में दूसरी दिवाली मनाने के रूप में नजर आई।

निश्चय ही इस फैसले से भारतीय सांस्कृतिक पहचान को वैश्विक स्तर पर नई मान्यता मिलेगी। दुनिया इस पर्व की भावनात्मकता के इतर इसकी आध्यात्मिकता व सामाजिक समरसता के संदेश से रूबरू हो सकेगी। दिवाली की इस नई अंतर्राष्ट्रीय मान्यता ने न केवल भारतीय संस्कृति की प्रतिष्ठा को बढ़ाया है, बल्कि यह भी संदेश दिया है कि सहस्राब्दियों से चली आ रही भारतीय परंपराएं आज भी विश्व समुदाय के लिए प्रेरणा और आकर्षण का केंद्र बनी हुई हैं। यह उपलब्धि उस सांस्कृतिक आत्मा को वैश्विक स्वर देती है, जो हर दीपक की लौ में उजाला, आशा और नई शुरूआत का संदेश समेटे हुए हैं। निस्संदेह, यह पर्व भारतीय संस्कृति और लोकाचार से गहरे तक जुड़ा है। अब हमारी भी जिम्मेदारी यह सुनिश्चित करना है कि दीपावली हमेशा समृद्ध विरासत बनी रहे। दुनिया में उजाले की अंधेरे पर जीत का संदेश निरंतर जाता रहे। जो शाश्वत मानवीय मूल्यों की रक्षा का संदेश भी है। विश्वास किया जाना चाहिए कि भारत की इस अमूर्त सांस्कृतिक विरासत के गहरे संदेश का पूरी दुनिया अंगीकार कर सकेगी।

Team Desk