स्कूल में पढ़ा करते थे कि ‘माइट इज़ राइट’, जिसका हिन्दी अनुवाद ‘जिसकी लाठी उसकी भैंस’ बताया गया। जो ताकतवार है वह कुछ भी कर सकता है। इसी सिद्धांत का नया संस्करण हम नए वर्ष में देख रहे हैं। अमेरिका ने अपने सैनिक भेज कर वेनेज़ुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो तथा उनकी पत्नी को उनकी राजधानी कराकस में अपने महल के बेडरूम से उठा लिया और उन्हें न्यूयार्क ले आए जहां हथकड़ी लगे निकोलस मादुरो को अदालत के सामने पेश किया गया। उन पर आरोप है कि वह ‘नार्को-टैरेरिजम’ अर्थात नशे के आतंकवाद में संलिप्त हैं। डाेनाल्ड ट्रम्प कह रहे हैं कि अब वह वेनेज़ुएला को चलाएंगे और उसके विशाल तेल भंडार जो दुनिया में सबसे अधिक है, को सम्भालेंगे।
वेनेज़ुएला का तेल भंडार 303 अरब बैरल है जो तेल की वर्तमान क़ीमतों के अनुसार 17 ट्रिलियन डालर का है। ट्रम्प का कहना है कि यह सब हमारा है। लाठी (सेना) भी, (भैंस) वेनेज़ुएला भी, और अब तेल भी। बाक़ी दुनिया, भारत समेत, चुपचाप या ठंडी प्रतिक्रिया जता कर बैठ गई है। आख़िर ट्रम्प की लाठी से सब डरते हैं। कोई उनसे पंगा नहीं लेना चाहता। विशेषज्ञ सी. उदय भास्कर ने इसे ‘रणनीतिक बुज़दिली’ कहा है। अमेरिका की ऐसी एक पक्षीय कार्रवाई दुनिया ने पहले भी देखी है। जनवरी 1990 में वह पनामा के सैनिक लीडर मैनुअल नौरईगा जिसे कभी अमेरिका का आदमी समझा जाता था, को वहां से उठा लाए थे। उस पर भी नशे का धंधा करने का आरोप था। उसे अमेरिका में 40 साल की सजा दी गई थी।
मई 2011 में अमेरिका ने पाकिस्तान की सैनिक छावनी एबटाबाद में घुस कर ओसामा बिन लादेन को मार दिया था और उसकी लाश समुद्र में फेंक दी थी। इन दो घटनाओं और वेनेज़ुएला की घटना में अंतर है। तब अमेरिका ने दुनिया को समझाने की कोशिश की थी कि कार्यवाही क्यों की गई। औचित्य समझाया था। जब इराक़ में कार्यवाही की गई तो बताया गया कि सद्दाम हुसैन के पास सामूहिक विनाश के हथियार हैं, चाहे निकला कुछ नहीं। वेनेज़ुएला के राष्ट्रपति को उठाते हुए ट्रम्प की सरकार ने कोई स्पष्टीकरण देने की ज़हमत नहीं उठाई। ट्रम्प ने कहा भी है कि वह किसी अंतर्राष्ट्रीय क़ानून में विश्वास नहीं रखते। उनका विश्वास केवल “अपनी विचारधारा और अपनी अंतरात्मा में हैं”। अर्थात हम अब साम्राज्यवाद का नया रूप देख रहे हैं। केवल रणनीतिक मामलों में ही नही, आर्थिक मामलों में भी दिख रहा है।
हम पर भी 50% टैरिफ़ लगाया हुआ है और 500% लगाने की धमकी दी जा रही है। द इकानमिस्ट ने लिखा है कि, “डाेनाल्ड ट्रम्प रोज़ाना प्रदर्शित कर रहें हैं कि दुनिया में जो मायने रखता है वह अंतर्राष्ट्रीय क़ानून नहीं, नंगी ताक़त है”। निकोलस मादुरो एक क्रूर तानाशाह था जो पिछले 13 वर्ष से चुनावी धांधली,भ्रष्टाचार, मानवीय अधिकारों के घोर उल्लंघन और सैंसरशिप के द्वारा सत्ता पर क़ाबिज़ था। आर्थिक तंगी के कारण लोग उसके ख़िलाफ़ थे। अलोकप्रियता का यह हाल था कि अपनी सुरक्षा के आंतरिक घेरे में उसने अपनी सेना के अधिकारी नहीं, बल्कि क्यूबा के कमांडो रखे हुए थे जो सब अमेरिकी कार्यवाही में मारे गए। पर यह सारी कहानी मादुरो की तानाशाही की नहीं है, अमेरिका की एकतरफीय कार्यवाही की है।
वेनेज़ुएला अमेरिका पर हमला करने की नही सोच रहा था जिसका जवाब, अंतर्राष्ट्रीय क़ानून के अनुसार, अमेरिका दे सकता था। ऐसा कुछ नहीं था। मादुरो का क्या करना है यह वेनेज़ुएला के लोगों पर छोड़ दिया जाना चाहिए था, पर एक नई ख़तरनाक मिसाल क़ायम कर दी गई है। एक बार अंतर्राष्ट्रीय नियमों की परवाह बंद हो गई तो और भी इस रास्ते पर चल सकते हैं। पर यह डाेनाल्ड ट्रम्प का अमेरिका है। कराकस पर नाइट स्ट्राइक अमेरिका की ताक़त का नंगा प्रदर्शन है और यह भी बताता है कि अमेरिका जहां समझता है कि उसके हित हैं, वहां ताक़त का इस्तेमाल करने को तैयार है। संयुक्त राष्ट्र तो पहले ही अशक्त बन चुका है। डाेनाल्ड ट्रम्प को चिन्ता नहीं कि बाक़ी दुनिया क्या कहती है। वह केवल अमेरिका को अपनी सोच के मुताबिक़ ‘ग्रेट’ बनाने में लगे हैं। यह होता है या नहीं, या अमेरिका अपना प्रभाव खो देता है, यह समय ही बताएगा।
बुद्धिजीवी फ़रीद जकारिया का कहना है कि ऐसी कार्यवाही से अमेरिका “अधिक ताकतवार, पर अधिक अकेला पड़ जाएगा”। अमेरिका को कभी आज़ादी और लोकतंत्र का ध्वजवाहक समझा जाता था, पर आज उसका व्यवहार पुतिन के रूस की तरह है। वेनेज़ुएला बहुत समय से चीन और रूस के नज़दीक जा रहा था। चीन को विशेष धक्का पहुंचा है। वह दक्षिण अमेरिका के देशों में अपना प्रभाव बढ़ा रहा था कि अमेरिका ने ‘नो एंट्री’ का बोर्ड लगा दिया। चीन वेनेज़ुएला के तेल का सबसे बड़ा आयातक है। चीन ने उस क्षेत्र में बहुत निवेश किया हैं जो अमेरिका अपने प्रभाव का क्षेत्र समझता है। यह रुक जाएगा, पर चीन अपने आसपास के क्षेत्र में और सक्रिय हो सकता है। पुराने स्टाइल के साम्राज्यवाद की वापिसी से क्या रूस और चीन को अपने पड़ोस में और दखल का मौक़ा मिल जाएगा? चीन ताइवान या दक्षिण चीन सागर में और दुस्साहसी हो जाएगा? भारत को भी इस में दिलचस्पी होगी कि चीन आगे क्या करता है क्योंकि दोनों देशों में सीमा विवाद है।
भारत को मादुरो में कोई दिलचस्पी नहीं है, पर उसकी दुर्गति को हम मिसाल बनता नहीं देखना चाहते। अभी तक चीन और रूस की प्रतिक्रिया संयत रही है। वह स्थिति का जायज़ा से रहे हैं। ताइवान पर चीन की कार्यवाही बहुत कुछ सैनिक क्षमता, सफलता की सम्भावना, आर्थिक नुक्सान तथा बाहरी दखल के आंकलन पर निर्भर करेगी। चीन अमेरिका की तरह बेधड़क नहीं है और ताइवान वेनेज़ुएला की तरह बेबस नहीं है। जो देश सबसे पहले ट्रम्प के निशाने पर हो सकता है वह ईरान है जहां पहले ही ज़मीन तैयार हो चुकी है। सुप्रीम लीडर आयतुल्ला खमैनी के शासन के खिलाफ देशभर में व्यापक प्रदर्शन हो रहे हैं। कई सौ लोग मारे जा चुके हैं। अमेरिका और इज़राइल के लिए दखल का मौक़ा ज़रूर है, पर ईरान में जवाब देने की क्षमता है। वह उस क्षेत्र में अमेरिकी और इज़राइली हितों को नुक्सान पहुंचा सकता है। हमारे लिए धर्म संकट होगा क्योंकि ईरान के साथ हमारे प्राचीन सम्बंध हैं।
ट्रम्प उन देशों पर 25% टैरिफ़ लगाने की धमकी दे रहे हैं जो ईरान के साथ व्यापार करते हैं। भारत उन में शामिल है।भारत खुद को ग्लोबल साउथ का लीडर कहता है, पर जब ग्लोबल साउथ के एक देश पर साम्राज्यवादी हमला हुआ तो हमारी प्रतिक्रिया शांत रही। हमने “गहरी चिन्ता” ही व्यक्त की। जैसे पूर्व विदेश सचिव निरुपमा मेनन राव ने भी लिखा है, “भारत जंगल की दुनिया में रहता है जहां ताक़त का साम्राज्य है”। यूक्रेन में रूस की कार्यवाही और गाजा पर इज़राइल के हमले के समय भी हमारी प्रतिक्रिया सावधानी पूर्वक रही थी। डाेनाल्ड ट्रम्प ने दुनिया के तयशुदा नियमों का शीर्षासन कर दिया है। जो पिछला वर्ल्ड आर्डर था,जिसे बनाने में अमेरिका का बड़ा हाथ था, को खुद अमेरिका ने बदल दिया है। द न्यूयार्कर ने लिखा है, “डाेनालड ट्रम्प का दुनिया के प्रति रवैया…अहंकारी और एकतरफ़ा है जो ऊंची आवाज़ में बताता है कि मैं कुछ भी कर सकता हूं, कहीं भी कर सकता हूं और जिस तरह चाहूं कर सकता हूं”। वह बता रहे हैं कि इस जंगल के वह एकमात्र शेर हैं।
इस सारे मामले में हमारी कूटनीति की परीक्षा है। अमेरिका के साथ पहले ही हमारे रिश्ते अनिश्चित बने हुए हैं। ट्रम्प का रवैया हमारे विपरीत बन गया है। वह ख़फ़ा लगते हैं कि भारत उन्हें पाकिस्तान के साथ युद्ध समाप्त करने का श्रेय नहीं दे रहा जबकि शाहबाज़ शरीफ बार-बार उन्हें नोबेल सम्मान के लिए मनोनीत कर रहे हैं। वह विशेष तौर पर प्रधानमंत्री मोदी की स्थिति असुखद बनाने में लगे हुए हैं। वह कह चुके हैं कि “भारत उन्हें ‘हैप्पी’ बनाना चाहता था। नरेन्द्र मोदी अच्छे आदमी हैं जो समझ गए कि ट्रम्प भारत द्वारा रूस से तेल ख़रीदने पर ‘अनहैप्पी’ हैं। ट्रेड करने के लिए मुझे हैप्पी करना ज़रूरी था”। भारत ने भी रूस से तेल आयात को बहुत कम कर दिया है, पर ट्रेड डील अभी लटक रही है।अब फिर ट्रम्प का कहना है कि मोदी ने उन्हें फ़ोन कर कहा कि “सर, प्लीज़ क्या मैं आपको मिलने आ सकता हूं? और मैंने कहा कि हां”।
इसको लेकर विपक्ष को प्रधानमंत्री पर हमला करने का मौक़ा मिल गया। पर मैं समझता हूं कि यहां ट्रम्प अपने अहंकार में कुछ ज़्यादा ही कह रहे हैं। अंतर्राष्ट्रीय कूटनीति में ‘सर’ का प्रयोग नहीं होता। या ‘मिस्टर प्रेज़िडेंट’ या ‘मिस्टर प्राइम मिनिस्टर’ या ‘योर एकसेलैंसी’ कहा जाता है। ट्रम्प जतलाना चाहते हैं कि दुनिया भर के नेता उनके दरबार में नतमस्तक होते हैं। पर उनका रवैया सबक़ सिखा गया है। हमारे लिए वेक-अप कॉल है। हम अकेले हैं। किसी पर निर्भर नहीं हो सकते। प्रधानमंत्री मोदी को व्यक्तिगत कूटनीति का बहुत शौक़ है। उन्हें दुनिया के अधिकतर नेताओं को जप्फी डालते देखा गया है। पर वैश्विक कूटनीति में इसके सीमित फ़ायदे ही होते हैं। आख़िर में हार्ड पावर ही काम आता है। हमें उसी पर ज़ोर देना है। अगर चीन के साथ सम्बंध फिर बिगडते हैं तो ट्रम्प की अमेरिका से कोई आशा नहीं करनी चाहिए।


















