युद्ध ख़त्म करना मुश्किल होता है

युद्ध

यह बात रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन को अच्छी तरह समझ आ गई होगी कि युद्ध शुरू करना आसान है पर ख़त्म करना मुश्किल। चार साल से वह छोटे यूक्रेन के कुछ हिस्सों पर क़ब्ज़ा करने के लिए युद्ध कर रहे हैं पर यूक्रेन शक्तिशाली रूस का बराबर मुक़ाबला कर रहा है। पुतिन के लिए यह महंगा सौदा रहा है। यही बात सत्ता के नशे में चूर एक और नेता को भी समझ आ रही होगी। ईरान पर हमला करने के वक्त अमेरिका के राष्ट्रपति डानल्ड ट्रम्प ने कहा था कि युद्ध ज़्यादा से ज़्यादा चार सप्ताह चलेगा। चार सप्ताह पूरे हो गए और अब तो लगता है कि युद्ध नए भीषण दौर में प्रवेश कर रहा है।

ट्रम्प की बौखलाहट भी बताती है कि वह हताश हैं कि जिसे ‘ऑफ- रैम्प’ कहा जा रहा है, अर्थात् युद्ध से हटने का रास्ता, वह निकल नहीं रहा। वह बार-बार लक्ष्य बदल रहे हैं और दूसरों के प्रति भद्दी भाषा का इस्तेमाल कर रहे हैं। नाटो देशों को वह ‘कायर’ कह चुके हैं और साउदी अरब के प्रिंस के प्रति उन्होंने वह कहा है जो इतना शर्मनाक है कि दोहराया नहीं जा सकता। ट्रम्प की चिढ़ है कि उनके कई यूरोपीय साथी इस युद्ध में हिस्सा नहीं लेना चाहते। फ्रांस और इंग्लैंड ने तो साफ़ कहा है कि, “यह हमारा युद्ध नहीं है”।

इस युद्ध ने वह शक्ल अख्तियार कर ली है जिसकी कल्पना अमेरिका और इज़राइल को नहीं थी। बताया यह जाता है कि ट्रम्प नेतन्याहू के बहकावे में आ गए कि युद्ध बहुत जल्द समाप्त हो जाएगा। प्रसिद्ध इतिहासकार विलियम डेलरिम्पल, ने कटाक्ष किया है कि, “आख़िरकार नेतन्याहू को एक अमेरिका राष्ट्रपति मिल ही गया जो इतना मूर्ख, कान का कच्चा और इस्लाम विरोधी है कि उनकी लड़ाई लड़ने के लिए तैयार हो गया है”। इज़राइली इतिहासकार अवी शलेम ने और कड़वे शब्दों का इस्तेमाल करते हुए ट्रम्प को नेतन्याहू का ‘पूडल’ अर्थात् गोद में लिया छोटा कुत्ता कहा है। वह युद्ध जो ईरान में शासन पलटने और उनके परमाणु कार्यक्रम को ध्वस्त करने के लक्ष्य से शुरू हुआ था, अब विश्व की अर्थव्यवस्था के लिए ख़तरा बन गया है।

ईरान द्वारा होर्मुज जलमार्ग को बाधित करने से तेल और गैस की क़ीमतें आसमान पर पहुंच रही हैं और अगर यह युद्ध कुछ देर और चल गया तो तबाही हो जाएगी। हमारे जैसे देश जो तेल और गैस की आपूर्ति के लिए खाड़ी के देशों पर बहुत निर्भर हैं पर होर्मुज के रूक जाने का बुरा असर पड़ रहा है। होर्मुज का खुला रहना विश्व अर्थव्यवस्था और विश्व शान्ति के लिए ज़रूरी है। मुख्य खिलाड़ियों की स्थिति कुछ ऐसी है।
अमेरिका : दुनिया में एकमतता है कि इस युद्ध से अमेरिका और उसके राष्ट्रपति का बहुत नुकसान हुआ है। ट्रम्प इस वादे के साथ राष्ट्रपति बने थे कि वह अमेरिका को मध्य-पूर्व के युद्धों से दूर रखेंगे और हर हालत में अमरीकी सैनिकों को ज़मीन पर नहीं उतारेंगे।

वह वहां ही युद्ध कर रहे हैं और 3500 सैनिकों को वहां भेज दिया ताकि ईरान के तेल उत्पादक खर्ग द्वीप पर क़ब्ज़ा कर सकें, अगर अमेरिकी सैनिकों और ईरान के सैनिक आमने-सामने आते हैं तो ईरान का तो नुकसान होगा ही पर अमेरिका का भी बराबर जानी नुक़सान होगा जिसके लिए अमरीकी जनता बिलकुल तैयार नहीं है। वह हज़ारों मील दूर उस देश से लड़ना नहीं चाहते जिससे अमेरिका को कोई सीधा ख़तरा नहीं है। अभी से अमेरिका में लाखों लोग सड़कों पर उतर रहे हैं। उनका नारा है, ‘नो किंग्स’ अर्थात् हमें राजा नहीं चाहिए। वह ट्रम्प की नीतियों, ईरान युद्ध और बढ़ती महंगाई का विरोध कर रहे हैं। उनकी अपनी रिपब्लिकन पार्टी में युद्ध का विरोध हो रहा है, क्योंकि न लक्ष्य स्पष्ट है न ख़त्म करने का रास्ता। ट्रम्प ने संसद से युद्ध के लिए 200 अरब डालर की मांग की है जो मिलने की सम्भावना नहीं है। आगे मिड टर्म चुनाव है और तेल की क़ीमतों से लोग परेशान हैं। उनकी रिपब्लिकन पार्टी को धक्का पहुंचेगा।

अमेरिका की नेशनल इंटेलिजेंस डायरेक्टर तुलसी गबार्ड ने तो साफ़ कहा कि 2025 के हमले के बाद ईरान ने दोबारा परमाणु क्षमता खड़ी करने की कोशिश नहीं की। यह ट्रम्प के कथन का सीधा प्रतिवाद है कि ईरान के परमाणु कार्यक्रम से दूर बैठे अमेरिका को खतरा है। अमेरिका ने ईरान को 15 नुक्तों वाला शान्ति प्रस्ताव भेजा था जिसका अर्थ होता कि ईरान अपने हाथ काट कर अमेरिका और इज़राइल को सौंप देता। ट्रम्प को समझना चाहिए कि शान्ति उनके शर्तों पर नहीं होगी। ईरान के शीर्ष नेतृत्व को ख़त्म कर दिया गया है। तेहरान पर ज़बरदस्त बमबारी हो रही है। मिनाब में 160 स्कूली बच्चियां मारी जा चुकी हैं। ईरान सब झेल गया है, क्योंकि वह अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहा है। बहुत मार खाई है पर अब वैश्विक अर्थव्यवस्था पर उसकी पकड़ है। होर्मुज को रोक कर उसने खेल बदल दिया है।

ईरान वह लम्बी लड़ाई के लिए तैयार है। ट्रम्प बहुत बड़ी ग़लतफ़हमी में थे कि वह हथियार डाल देंगे। यह नहीं होने वाला। कई विशेषज्ञ मानते हैं कि ईरान जीत चुका है। कर्नल मैकग्रैगर जो अमेरिका के रक्षा मंत्री के सलाहकार रहे हैं ने कहा है, “सब कुछ यह संकेत दे रहा है कि ईरान अमेरिका पर शर्तें थोप रहा है…वह देश जिस पर दिन रात दुनिया की दो सबसे शक्तिशाली वायुसेना बम बरसा रही हैं उसके पास अभी भी जवाबी हमले करने की क्षमता हैं”। ईरान की क्षमताओं को कम आंका गया है जो बात इज़राइली विशेषज्ञ भी स्वीकार करते हैं। ईरान का जवाब ज़बरदस्त रहा है। लगता है वह इसके लिए दशकों से तैयारी कर रहे थे। खाड़ी के देशों में स्थित अमरीकी अड्डों को ईरान बुरी तरह ध्वस्त कर रहा है। कई अड्डे तो इतने नष्ट हो गए हैं कि अमेरिकी सैनिकों को होटलों में ठहराया जा रहा है जिन पर फिर ईरान हमले कर रहा है।

दुबई पर हुए हमलों का यह बड़ा कारण है कि वहां के होटलों में अमरीकी सैनिक ठहरे थे। इज़राइल से एलन मिज़राही लिखते हैं कि “अमेरिका ने ऐसी तबाही पहले नहीं देखी”। अमरीका का कितना नुक़सान हुआ है यह बताया नहीं जा रहा पर निश्चित तौर पर मामूली नहीं है। ईरान की सैनिक क्षमता और इंफ्रास्ट्रक्चर सारे देश में भूमिगत सिलो में हैं जहां तक अमरीका-इज़राइल बम पहुंच नहीं रहे। ईरान समर्थक हूती बाग़ी यमन से इज़राइल पर मिसाइल दाग रहे हैं। एक और मोर्चा खुल गया है। और वहां नुक़सान हो रहा है। होर्मुज जलमार्ग को रोक कर ईरान ने अपना ट्रम्प कार्ड चल दिया है। अब सारा ज़ोर होर्मुज को खोलने पर लगा है जबकि युद्ध शुरू होने से पहले यह मार्ग वैसे ही खुला था, पर अगर ईरान इसे अधिक देर बाधित रखता है तो अंतर्राष्ट्रीय सहानुभूति खो देगा। अभी तो दुनिया ट्रम्प और नेतन्याहू को युद्ध के लिए दोषी ठहरा रही है पर अगर यह लम्बा चला और क़ीमतें बढ़ती गईं तो ईरान को भी आलोचना का सामना करना पड़ेगा।

इजराइल: इस युद्ध से सबसे बड़ा नुक़सान इज़राइल का हुआ है। उस देश को अंतर्राष्ट्रीय खलनायक समझा जा रहा है जो किसी अंतर्राष्ट्रीय क़ानून को मानने को तैयार नहीं। भारत में जिसे ‘राइट विंग’ कहा जाता है को छोड़कर दुनिया में कहीं भी इज़राइल को समर्थन नहीं मिल रहा। नेतन्याहू विशेष तौर पर दुनिया में बदनाम हैं। जिस तरह बदला लेने के लिए इज़राइल द्वारा गाजा में 70000 लोगाें को मारा गया वह सबने देखा है। बच्चे, औरतों, किसी का लिहाज़ नहीं किया गया। तेहरान में यूनिवर्सिटी पर बमबारी की गई है। कैसे लोग हैं जो शिक्षा के केन्द्रों पर बमबारी कर रहे हैं ? अब लेबनान में 1000 लोग मार दिए गए हैं। पता नहीं नेतन्याहू कितना खून बहाने की क्षमता रखते हैं?पर उनका दुर्भाग्य है कि ईरान में युद्ध उनके मुताबिक़ नहीं चल रहा।

उन्होंने समझा था कि यह जल्द ख़त्म हो जाएगा और वह नवम्बर में होने वाले चुनाव अडवांस कर जुलाई में करवा सकेंगे, पर ईरान जो मुक़ाबला कर रहा है उससे नेतन्याहू का हिसाब किताब सब गड़बड़ा गया है। इज़राइल का यह भी नुक़सान हुआ है कि उनकी अजेयता की प्रतिष्ठा ख़त्म हो गई है। अभी तक तो यह समझा जाताथा कि इज़राइल को कोई हाथ नहीं लगा सकता। उनके ‘आयरन डोम’ को कोई भेद नहीं सकता। इस युद्ध ने यह प्रभाव भी ख़त्म कर दिया। ईरान इज़राइल की एयर स्पेस को भेद कर अंदर तक मार करने में सफल हो रहा है। तेलअवीव और यरूशलेम जैसे शहरों पर मिसाइल हमले हो रहे हैं।

इज़राइल अब पहले की तुलना में कम सुरक्षित है। ईरान से परमाणु ख़तरा कम नहीं हुआ। वहां शासन बदलने का लक्ष्य जो नेतन्याहु ने दशकों से पाल रखा था, वह भी पूरा नहीं हुआ। ईरान ने सस्ते ड्रोन और मिसाइलों द्वारा दोनों अमरीका और इज़राइल को चुनौती दे दी है। अमरीका तो दूर बैठा है उसका कोई नुक़सान ईरान नहीं कर सकता, पर इज़राइल को सदैव चौकस रहना होगा। इन दोनों के लिए एक और कड़वी सच्चाई है। उन्होंने वह शुरू कर दिया है जो वह ख़त्म करने की स्थिति में नहीं है। उनके पास आसान और सम्मानजनक विकल्प नहीं है। इनका इससे बड़ा दुर्भाग्य क्या हो सकता है कि मध्यस्थता के लिए पाकिस्तान जैसे फटीचर देश की मदद ली जा रही है?

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