ईरान-इजराइल व अमेरिका के युद्ध को चलते अब एक महीना हो चुका है परन्तु इसकी विभीषिका कम नहीं हो रही है बल्कि उल्टे एक तरफ समझौता वार्ता की खबरों के चलते अमेरिका द्वारा ईरान में थल सौनिक उतारने की चर्चा भी जोरों पर चल रही है। इस युद्ध से इतना तो स्पष्ट हो चुका है कि यह ऐसा लक्ष्यहीन संग्राम है जिसके प्रभाव से दुनिया के अधिसंख्य देश व्यथित हो रहे हैं। इनमें भारत का नाम प्रमुख रूप से लिया जा सकता है क्योंकि स्वतन्त्रता से पहले 1947 तक भारत व ईरान की सीमाएं एक-दूसरे से मिलती थीं। यही वजह है कि भारत व ईरान के बीच ऐतिहासिक सांस्कृतिक प्रगाढ़ता है। इसके साथ ही भारत व ईरान के आर्थिक व सामाजिक सम्बन्ध भी गहराई लिये हुए रहे हैं क्योंकि ईसा से पूर्व सम्राट अशोक का शासन पाटिलीपुत्र से लेकर तेहरान तक था जो कि आज ईरान की राजधानी है।
अतः युद्ध के दुष्प्रभावों का जोर भारत पर होना ही था। इसे ही हम आज देख रहे हैं, बेशक इसके आयाम बदले हुए हैं क्योंकि ईरान के संकरे होर्मुज जलडमरूमध्य समुद्री रास्ते से होकर भारत की ऊर्जा सप्लाई का 60 प्रतिशत से अधिक हिस्सा आता है जिसके चलते आज भारत में ईंधन गैस की सप्लाई में कमी हो रही है लेकिन इसके बावजूद भारत की मोदी सरकार इस ईंधन गैस की किल्लत की मार आम भारतीय उपभोक्ताओं पर कम से कम डालने की कोशिशें कर रही है और ईरान भी भारत के ऊर्जा स्रोतों के वाणज्यिक जहाजों को जलडमरूमध्य मार्ग से गुजरने की इजाजत दे रहा है परन्तु यह युद्ध का केवल एक आयाम है।
दूसरा आयाम वह है जिसकी वजह से इसके व्यापक होने का खतरा मंडरा रहा है क्योंकि ईरान जिस तरह इजराइली व अमेरिकी हमलों का जवाब देने के लिए अरब व खाड़ी के देशों में स्थित अमेरिकी सैनिक अड्डों को निशाने पर ले रहा है उससे इस क्षेत्र में विश्व के दूसरे शक्तिशाली देशों रूस व चीन के हितों पर भी चोट पहुंच रही है। मगर अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के रुख को देख कर लगता है कि उन्हें इस युद्ध के दुष्परिणामों की चिन्ता नहीं है और वह अमेरिका को पुनः महान बनाने की अपनी रट में विकाशील व अविकसित राष्ट्रों की विकास प्रक्रिया को दरकिनार कर रहे हैं।
इस मामले में सबसे पहले यह समझना जरूरी है कि विगत 28 फरवरी को यह युद्ध तब शुरू हुआ जब जिनीवा में एक खाड़ी देश ओमान की मध्यस्थता में अमेरिका व ईरान के बीच शान्ति वार्ता चल रही थी और इसका मुख्य विषय ईरान का परमाणु कार्यक्रम था। अतः कहा जा सकता है कि अमेरिका ने यह युद्ध अपने सहयोगी राष्ट्र इजराइल की जिद के चलते ईरान पर थोपा है जो कि संयुक्त राष्ट्र संघ के नियमावली के पूर्णतः विरुद्ध है। इसी वजह से दुनिया के कुछ देश इसे असंवैधानिक भी बता रहे हैं।
इस सन्दर्भ में यह तथ्य बहुत जरूरी है कि ईरान अन्तर्राष्ट्रीय परमाणु अप्रसार सन्धि का सदस्य देश है अतः उसका पूरा परमाणु कार्यक्रम पहले से इस बारे में स्थापित परमाणु एजेंसी की निगरानी में था लेकिन हम देख रहे हैं कि गत 28 फरवरी को युद्ध शुरू करते हुए अमेरिका व इजराइल ने घोषणा की कि वे ईरान में सत्ता परिवर्तन करके इसका कथित आतंकवादी स्वरूप बदना चाहते हैं। इस क्रम में इन दोनों देशों के आक्रमण के दौरान ईरान के सर्वोच्च नेता आयतुल्लाह अली खामेनेई भी मारे गये परन्तु इसके बावजूद ईरान में सत्ता परिवर्तन होने के बजाय उनके द्वारा स्थापित धार्मिक- राजनैतिक प्रशासन तन्त्र ही मजबूत हुआ और ईरान की सत्ता पर अपेक्षाकृत कट्टर इस्लामी समझे जाने वाले तत्वों का कब्जा होता चला गया जिसकी वजह से ईरान की उदारवादी ताकतों को भारी झटका लगा और पूरा देश ईरान युद्धोन्माद के भाव से भर गया। इसलिए कहा जा सकता है कि ईरान यह लड़ाई अपने अस्तित्व को बचाने के लिए लड़ रहा है जिसमें हर ईरानी आपसी राजनैतिक व क्षेत्रीय मतभेद भूल कर एक साथ आ गया है।
वर्ना इससे पहले खामेनेई के जीवित रहते ही इस देश में उदारवादी ताकतें अपना सिर उठाने लगी थी और ईरानी शहरों की सड़कों पर नारी अधिकारी को लेकर सरकार के विरुद्ध भारी प्रदर्शन भी होते रहते थे। भारत की इस मामले में स्पष्ट नीति रही है कि किसी भी देश में किस प्रकार का निजाम स्थापित हो इसका फैसला केवल उस देश की जनता ही कर सकती है। दूसरी ओर वर्तमान में जिस तरह भारत का पड़ौसी देश पाकिस्तान मिस्र, सऊदी अरब व तुर्की के साथ मिल कर इस्लामाबाद में इन देशों के विदेश मन्त्रियों के साथ मिल कर होर्मुज के जलडमरूमध्य मार्ग को खोलने की कोशिशों को वार्ता के माध्यम से अंजाम देना चाहता था लेकिन उनकी बैठक भी बिना किसी फैसले के खत्म हो गई। क्योंकि पाकिस्तान स्वयं में एक अवैध परमाणु शक्ति सम्पन्न राष्ट्र है और पूरे विश्व में आतंकवाद को फैलाने में उसकी महत्ती भूमिका रही है।
यह इस युद्ध की दिशाहीनता का एक और उदाहरण कहा जा सकता है। इसके साथ ही अमेरिका के प्रमुख नगरों में राष्ट्रपति ट्रम्प की युद्ध नीति के खिलाफ जिस तरह नागरिकों के भारी प्रदर्शन हो रहे हैं उससे पता चलता है कि ट्रम्प की अपनी जनता के बीच ही लोकप्रियता लगातार घटती जा रही है। हालांकि ट्रम्प की रिपब्लिकन पार्टी अभी भी इस युद्ध का पूर्ण समर्थन कर रही है। इसके बावजूद अमेरिकी नागरिक प्रदर्शनों का यह नारा कि वे अपने देश में राष्ट्रपति का व्यवहार किसी राजा-महाराजा की तरह नहीं बल्कि चुने हुए लोकतान्त्रिक नेता के रूप में देखना चाहते हैं।
ट्रम्प के लिए चिन्ता बढ़ा सकते हैं क्योंकि अमेरिका विश्व का सबसे बड़ा पुराना उदार व खुला लोकतन्त्र माना जाता है। इसके समानान्तर ट्रम्प शासन द्वारा ईरान में अपने थल सैनिक उतारने की अपुष्ट खबरों से ईरान भी काफी चिन्तित नजर आता है और इसकी संसद( मजलिस) के अध्यक्ष श्री मोहम्मद बाकर कुलीबफ ने कह दिया है कि यदि अमेरिका ऐसा करता है तो उनके देश की सेना न केवल उनका कफन तैयार करेगी बल्कि खाड़ी क्षेत्र में उसके मित्र राष्ट्रों को भी इसका परिणाम भुगतना होगा। पश्चिम एशिया के देशों में अमेरिका के कुल 16 सैनिक अड्डाें में से 13 को ईरान निशाने पर ले चुका है जिससे यही आभास होता है कि इस युद्ध की समयावधि अमेरिका व इजराइल की इच्छा पर ही निर्भर करती है।


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