वह एक ऐसा शायर था जिसके दीवानों एवं प्रशंसकों में प्रधानमंत्री मोदी भी हैं, मल्लिकार्जुन खड़गे भी। स्वयं श्रीमती इन्दिरा गांधी, कालांतर में डॉ. मनमोहन सिंह, सुषमा स्वराज और पाकिस्तान के तत्कालीन प्रधानमंत्री जुल्फीकार अली भुट्टो भी इस फहरिस्त में शामिल थे। दरअसल राजनीतिज्ञों द्वारा अपनी बातों की सार्थक व पसंदीदा प्रस्तुति के लिए गत कुछ दशकों में या तो दुष्यंत कुमार की काव्य पंक्तियां चर्चा में आई या फिर बशीर बद्र की। भारतीय फिल्म जगत में उनके शेअरों को अपनी बातचीत में उद्धृत करने वालों में मीना कुमारी भी थी, दिलीप साहब भी, देवानंद भी और स्वयं ‘बिग बी’ भी शामिल थे।
मीना कुमारी ने तो एक बार अपने अनेक प्रशंसकों को आटोग्राफ देते वक्त बशीर साहब का वह शेअर अपने हाथ से लिखा, ‘उजाले अपनी यादों को…’ नीचे बशीर का नाम दिया और फिर ‘दुआओं के साथ- मीना’ के रूप में हस्ताक्षर दिए। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि इस महान शायर के जनाजे में इतने कम लोग क्यों आए? उनके एक शेअर ‘दुश्मनी जम कर करो/लेकिन यह गुंजायश रहे/जब कभी हम दोस्त जाएं तो शर्मिंदा न हों, का एक बार संसद में बहस के दौरान स्वयं मल्लिकार्जुन खड़गे ने किया और बाद में एक बार किसी प्रसंग में श्री मोदी ने भी कह डाला था, ‘मुसाफिर हो तुम भी, मुसािफर हैं हम भी, किसी मोड़ पर फिर, मुलाकात कर देंगे।’
एक बार संसद में भी तत्कालीन प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने मिर्जा गालिब के एक शेअर के माध्यम से तब की प्रतिपक्ष-नेता श्रीमती सुषमा स्वराज पर तंज कसा था, ‘हमको उनसे है, वफा की उम्मीद, जो नहीं जानते वफा क्या है, तो जवाब में सुषमा जी ने भी बशीर के एक शेअर का सहारा लेते हुए तंज कसा था, ‘कुछ तो मजबूरियां रही होंगी, यूं ही कोई बेवफा नहीं होता।’ हमारे इस कालखण्ड में जिन बड़े शायरों के कलाम एवं गजलें, मुहावरों की तरह आम आदमी व ‘इलीट-क्लास’ की जुबान पर अक्सर सवार रहते हैं, उनमें बशीर बद्र का नाम पहली पंक्ति में बना रहेगा। वह एक करीबी दोस्त थे, इसलिए मेरा निजी सरमाया भी थे, मगर इसके इलावा इनसे अदबी रिश्ता भी था जो बरसों तक बना रहेगा। कालजयी शायरी क्या होती है, इसकी कोई मिसाल देखनी हो तो बशीर की शायरी से गुजर कर देखिए। बशीर की सबसे बड़ी खूबी यह रही है कि अपनी अनूठी शैली, बानगी व मौलिक प्रस्तुति के साथ उसने सामयिक मुद्दों को भी बेहद नजाकत के साथ उठाया है। नगरीय एवं कस्बई हिंसा पर उनका यह तंज अब भी जिक्र में बना हुआ है-
लोग टूट जाते हैं, एक घर बनाने में
तुम रहम नहीं खाते, बस्तियां जलाने में।
जिंदगी की शाम वाला उनका एक शेअर विदायगी के हर मौके पर गूंजता है-
उजाले अपनी यादों के हमारे पास रहने दो
न जाने किस गली में जिंदगी की शाम हो जाए।
जिन दो शायरों का प्रयोग कमोबेश हर राजनीतिज्ञ ने भी किया है, उनमें दुष्यंत के इलावा दूसरा नाम बशीर बद्र का ही है। 91 की उम्र में वह चले गए। सुना था ‘डिमेंशिया’ सरीखी बीमारियों से पीडि़त लोग लम्बी उम्र तक भी बने रहते हैं। इन दिनों वह ‘हल्का-हल्का’ बहाल भी होने लगे थे, मगर यादों के गलियारे में उस तरह चलने की मशक्कत करने ही लगे थे कि बीच सफर में ही लौट गए। इस बार का लौटना अंतिम था और आज वह शारीरिक तौर पर हमारे बीच नहीं हैं।
मेरे जेहन में वे पुराने दिन उदास बदलों की तरह जिंदगी की उमस से जूझने लगते हैं, जब एक बेहद चहेते व प्यारे अजीज दोस्त के रूप में वह मेरे पुश्तैनी शहर अबोहर आए थे। हम दो दिन तक उस सरहदी शहर में एक नहर के किनारे घूमते रहे थे। अपनी जिंदगी के ढेरों राज उन दो दिनों में उसने उडे़ले थे। वे 48 घंटे ऐसे बीते जैसे दो-चार पल का सिलसिला हो। मैं, मेरे प्रिय दोस्त एवं उर्दू अदीब मोहनलाल, वहां के बोहिमियन्ज क्लब के सूत्रधार प्रो. सत्य प्रकाश, युवा पत्रकार साथी राजसदोष और साथ में बशीर बद्र। दरअसल उन्हें 48 घंटों की एक शाम हम लोगों ने तय किया कि बशीर के कलाम से हिंदी में उर्दू शायरी को जज्बा करने वाली नई पीढ़ी को रूबरू कराया जाए। मोहन लाल मूल रूप से उर्दू व पंजाबी के कहानीकार एवं उपन्यासकार थे। उन्हीं के मशविरे व पहलकदमी से शब्दलोक प्रकाशन का एक ‘बैनर’ बुना गया।
ये किस्सा लगभग 45 बरस पुराना है। उन दिनों 1100 प्रतियां छापना एक जोखिम भरा प्रयास था। मगर सभी प्रतियां छह महीने में खप गईं। उन्हें खरीदने वाले कमोबेश सभी युवा चेहरे थे। तब मूल्य भी 20 रुपए था और कॉलेजों के पुस्तकालयों के लिए 15 रुपए में। फिर भी पहले संस्करण से जो पैसे बचे, भाई मोहन लाल ने ईमानदारी के साथ उन्हीं दिनों मनी आर्डर (अब पता नहीं प्रचलन में है भी या नहीं) के जरिए भिजवा दिए। मगर सार्थक सोच वाले उदारमना बशीर बद्र ने उसमें 11 रुपए रखे, शेष लौटा दिए। साथ में शुक्रिया अदा किया कि इस कृति के बहाने बड़ी संख्या में हिंदी के पाठक व जवां पीढ़ी उनके प्रशंसकों में शामिल हुए हैं। उनका आग्रह था कि अगला संस्करण शीघ्र छपे। मुझे याद है अम्बाला व गुरुग्राम के वे मुशायरे जिनमें ज्यादातर शायर यही आग्रह करते थे कि उन्हें बशीर से पहले पढ़ा दिया जाए क्योंकि एक बार बशीर शुरू हुए तो फिर श्रोता उन्हीं के नाम को आगे बढ़ाते रहने की जिद्द करेंगे।
इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि बशीर के जनाजे में सिर्फ 20-30 लोग ही आए। वह कोई राजनेता नहीं थे, जिनकी अंतिम यात्रा में उनके समर्थक कोई भीड़ जुटाते। वह नफीस इंसान भी थे और नफासत एवं खामोशी के साथ ‘सुपुर्दे खाक’ भी हो गए। अलबशीर बद्र आने वाले लम्बे वक्त तक भारतीयों की जिंदगी में बने रहेंगे। अलविदा बशीर साहब। बशीर बद्र के बारे में बड़ी बात यह नहीं है कि वे बड़े शायर थे। बड़ी बात यह है कि वे ऐसे शायर थे, जिन्हें पढ़कर बहुत से लोगों को पहली बार लगा कि गजल कोई ऊँची मीनार में बैठी हुई अरबी-फारसी की रानी नहीं, शाम के धुंधलके में आपके अपने कमरे में रखी वह छोटी-सी रोशनी है जो बुझती नहीं। उनकी शायरी में इश्क था लेकिन सिर्फ महबूब का इश्क नहीं, उसमें मनुष्य से, स्मृति से, भाषा से, शहर से, दोस्ती से और टूट जाने के बाद भी बची हुई मनुष्यता से इश्क था।
बशीर बद्र गजल को कठिन भाषा की जेल से निकालकर आम आदमी के दरवाजे तक लाए थे। बशीर बद्र की सबसे बड़ी क्रांति यही थी कि उन्होंने गजल को आसान बनाया लेकिन हल्का नहीं किया। उनकी भाषा में कोई नकली अकड़ नहीं थी। वे ऐसे शब्द चुनते थे जिन्हें कोई कॉलेज का लड़का भी समझ सके, कोई बूढ़ा श्रोता भी याद रख सके और कोई प्रेम में पड़ा हुआ आदमी तो जैसे अपनी जेब में रख ले। कोई टैंपो या ट्रैक्टर चलाती महिला भी कंठ में बसा ले। यही कारण है कि उनके शेअर किताबों से निकलकर मुशायरों, रेडियो, टीवी, अखबारों, फिल्मों और अब सोशल मीडिया तक पहुंच गए। बशीर बद्र वे शायर जिनके पास दु:ख भी था, रोशनी भी थी और बोलचाल की भाषा में अमर हो जाने की कला भी।
मैं तमाम तारे उठा-उठा के
गरीब लोगों में बांट दूं,
कभी एक रात वो आसमान का
निजाम दे मेरे हाथ में।
तुम्हारे साथ ये मौसम फरिश्तों जैसा है,
तुम्हारे बाश्द ये मौसम बहुत सताएगा।
तीन प्रधानमंत्री भी दीवाने थे बशीर बद्र के
Summary :
वह एक ऐसा शायर था जिसके दीवानों एवं प्रशंसकों में प्रधानमंत्री मोदी भी हैं, मल्लिकार्जुन खड़गे भी। स्वयं श्रीमती इन्दिरा गांधी, कालांतर में डॉ. मनमोहन सिंह, सुषमा स्वराज और पाकिस्तान के तत्कालीन प्रधानमंत्री जुल्फीकार अली भुट्टो भी इस फहरिस्त में शामिल थे। दरअसल राजनीतिज्ञों द्वारा अपनी बातों की सार्थक व पसंदीदा प्रस्तुति के लिए गत कुछ दशकों में या तो दुष्यंत कुमार की काव्य पंक्तियां चर्चा में आई या फिर बशीर बद्र की। भारतीय फिल्म जगत में उनके शेअरों को अपनी बातचीत में उद्धृत करने वालों में मीना कुमारी भी थी, दिलीप साहब भी, देवानंद भी और स्वयं ‘बिग बी’…


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