युद्ध से शांति की ओर

Summary :

40 दिन के जबरदस्त घमासान के बाद अमेरिका, इजराइल और ईरान ने 15 दिन के युद्ध विराम पर सहमति की खबर ने समूचे विश्व को राहत की सांस दी है। 48 घंटे का अल्टीमेटम खत्म होने से पहले अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ईरान को पाषाण युग में भेजने, कुछ घंटों में उसकी सभ्यता खत्म करने की धमकियां दे रहे थे, ने नाटकीय घटनाक्रम के बीच स्वयं युद्ध विराम पर सहमति का ऐलान किया। ईरान ने भी इस पर अपनी सहमति जताई और इजराइल ने भी इसे स्वीकार किया। डोनाल्ड ट्रम्प ने स्वीकार किया कि यद्यपि पाकिस्तान ने मध्यस्थ की भूमिका…

40 दिन के जबरदस्त घमासान के बाद अमेरिका, इजराइल और ईरान ने 15 दिन के युद्ध विराम पर सहमति की खबर ने समूचे विश्व को राहत की सांस दी है। 48 घंटे का अल्टीमेटम खत्म होने से पहले अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ईरान को पाषाण युग में भेजने, कुछ घंटों में उसकी सभ्यता खत्म करने की धमकियां दे रहे थे, ने नाटकीय घटनाक्रम के बीच स्वयं युद्ध विराम पर सहमति का ऐलान किया। ईरान ने भी इस पर अपनी सहमति जताई और इजराइल ने भी इसे स्वीकार किया। डोनाल्ड ट्रम्प ने स्वीकार किया कि यद्यपि पाकिस्तान ने मध्यस्थ की भूमिका निभाई लेकिन चीन ने ईरान को युद्ध विराम के लिए राजी किया। युद्धों को समाप्त करने की व्यवस्था में युद्ध विरामों का स्थान हमेशा से ही केन्द्रीय रहा है। बड़े-बड़े युद्ध अंततः मेज पर ही आकर खत्म होते हैं। युद्ध विराम का उद्देश्य संवाद स्थापित करना, मानवीय सहायता की पहुंच सुनिश्चित करना और किसी समाधान तक पहुंचने के लिए समझौता करना होता है। युद्ध विराम को कूटनीति के अनिवार्य साधन के रूप में देखा जाता है। कहा जाता है कि युद्ध के बिना बुद्ध प्रगट नहीं होते लेकिन आज के दौर में डोनाल्ड ट्रम्प और इजराइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू से बुद्ध होने की उम्मीद नहीं की जा सकती। युद्ध विराम भी विवशताओं के बीच रणनीतिक हथियार बन गए हैं।
डोनाल्ड ट्रम्प द्वारा युद्ध विराम की घोषणा एक रणनीतिक मजबूरी के रूप में देखा जा रहा है। ईरान द्वारा होर्मुज स्ट्रेट को बंद किए जाने के वैश्विक तेल आपूर्ति खतरे में पड़ चुकी थी जिससे तेल की कीमतें बढ़ गई थीं और हाहाकार मच गया था। आपूर्ति बाधित होने से गैस की कीमतों में भी उछाल आ चुका था। नाटो और अमेरिका के मित्र यूरोपीय देश इस कोहराम के ​लिए ट्रम्प को जिम्मेदार ठहरा रहे थेे और उन्होंने भी युद्ध से किनारा कर लिया था। अमेरिका को इस युद्ध में कुछ हासिल नहीं हुआ, उल्टा उसे अपने बेशकीमती लड़ाकू विमान और हैलीकाॅप्टर खोने पड़े। 40 दिन के युद्ध में उसे अरबों रुपए खर्च करने पड़े। लगातार हमलों के बावजूद ईरान की प्रतिरोधक क्षमता और इजराइल-अमेरिका के खिलाफ जवाबी हमले की क्षमता ने ट्रम्प प्रशासन को युद्ध रोकने के लिए मजबूर किया। ईरान ने अपने ड्रोनों और मिसाइलों के हमलों से अमेरिका और इजराइल को ऐसा झटका दिया जिसकी कल्पना कभी वैश्विक शक्ति माने गए अमेरिका ने भी नहीं की होगी।
अमेरिका के भीतर भी युद्ध के विरोध में जनभावनाएं उभार ले चुकी थी और ट्रम्प की लोकप्रियता जमीन सूंघने लगी थी। ट्रम्प पर न केवल खाड़ी देशों, मित्र देशों का बल्कि देश के भीतर से भी काफी दबाव था कि युद्ध को किसी न किसी हालत में रोका जाए। यद्यपि ट्रम्प ने ईरान के परमाणु और मिसाइल कार्यक्रम को लेकर बहुत कड़ी शर्तें रखी थीं, जिसे वे अपनी बड़ी जीत के रूप में पेश कर रहे थे लेकिन उनकी धमकियां युद्ध विराम समझौते के लिए दबाव डालने की रणनीति ही थी। पाकिस्तान भले ही मध्यस्थता के लिए अपनी पीठ ठोके। पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ और सेनाध्यक्ष मुल्ला मुनीर कुछ भी बयानबाजी करें। यह साफ है कि पाकिस्तान की भूमिका एक संदेशवाहक के रूप में ही थी। उन्होंने केवल ईरान की शर्तों और अमेरिका की शर्तों के प्रस्तावों का आदान-प्रदान ही करवाया। चीन ने ईरान को समझौते के लिए राजी किया। ईरान की सड़कों पर जश्न का माहौल है। तेहरान के लोग अपने देश का झंडा लेकर सड़कों पर लहरा रहे हैं। ईरान की सरकार युद्ध विराम समझौते को अपनी जीत के रूप में पेश कर रही है। ईरान ने युद्ध की शुरूआत में अपने सर्वोच्च नेता अली खामेनेई और आईआरजीसी के वरिष्ठ जनरलों को हमलों में खोया था और यह लड़ाई वहां के शासन के लिए अस्तित्व की लड़ाई बन गई थी। ईरान युद्ध को विजयी इसलिए मान रहा है क्योंकि वह अमेरिका और इजराइल से टक्कर लेकर 40 दिन तक युद्ध में टिका रहा। यह जीत तेहरान की राष्ट्रवादी जनता की भी मानी जा रही है।
ईरान की जनता ने एक मंत्री के आह्वान पर जिस तरह से पावर प्लांटों के चारों तरफ मानव शृंखला बनाकर खुद को ढाल के रूप में प्रस्तुत किया वह अपने आप में बहुत बड़ा उदाहरण है। यह वही जनता है जो धार्मिक सत्ता के​ खिलाफ सड़कों पर उतर आई थी लेकिन अमेरिका-इजराइल के हमलों ने ईरानी अवाम को एकजुट कर दिया। ईरान ने 10 शर्तें रखी हैं, जिसमें हमले तुरन्त रोकने, उस पर प्रतिबंध हटाने, संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के प्रस्ताव रद्द करने और संवर्धित यूरेनियम उसके पास सुरक्षित रहने इत्यादि शामिल हैं। सबसे बड़ा मसला होर्मुज स्ट्रेट को खोलने का था जिसके लिए ईरान तैयार है लेकिन उसकी शर्त यह है कि दो हफ्ते तक वह होर्मुज स्ट्रेट पर जहाजों से टोल टैक्स वसूलेगा ताकि उसके नुक्सान की भरपाई हो सके। अब इन शर्तों पर पाकिस्तान में बातचीत होगी। अमेरिका ने भी ईरान के सामने 15 शर्तें रखी हैं। अब यह जरूरी है कि अमेरिका और ईरान में बातचीत को लेकर भरोसा कायम हो। इसमें कोई संदेह नहीं कि बातचीत काफी सख्त रहेगी। कुल मिलाकर युद्ध​ विराम समझौता ईरान की शर्तों पर हुआ दिखाई देता है। युद्ध खत्म होना और शांति के मार्ग पर आगे बढ़ना दुनिया के लिए अच्छा है लेकिन इससे वर्ल्ड आर्डर बदल जाएगा।
अमेरिका का साथ देने वाले खाड़ी देशों को इस बात का अहसास हो चुका है कि सुरक्षा की दृष्टि से वे ईरान के मुकाबले बहुत कमजोर हैं और अमेरिका उनकी रक्षा करने में नाकाम रहा है। इसलिए वे भविष्य में अपनी सुरक्षा को लेकर व्यवस्था करने में जुट जाएंगे औरहथियार इकट्ठा करने की नई होड़ शुरू हो जाएगी। एक तरफ खाड़ी देश और अमेरिका होंगे तो दूसरी तरफ चीन और रूस तथा मित्र देश होंगे। दुनिया भर को हमेशा अपनी ताकत से डराने वाले अमेरिका और इजराइल से अब कोई खौफ नहीं खाएगा। अमेरिका का तिलस्म खत्म हो चुका है। बेहतरी इसी में होगी कि युद्ध विराम ईमानदारी से लागू हो और विध्वंस के बाद नवसृजन शुरू हो। खाड़ी देशों में लोग शांति से रह सकें।

Aditya Chopra

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