भारत की संवैधानिक कानून व्यवस्था जिस आधार पर टिकी हुई है उसके अनुसार सौ अपराधी भी छूट जायें मगर एक निरपराधी को सजा नहीं मिलनी चाहिए। जाहिर है कि किसी भी सभ्य समाज में तब तक उस व्यक्ति को निर्दोष माना जाता है जब तक कि उस पर आरोप साबित न हो जाये और आरोप केवल कानून द्वारा स्थापित न्यायालयों में ही साबित किया जा सकता है। इसी से स्पष्ट है कि भारत में किसी भी आरोपी को जमानत पर छूटने का अधिकार मिलना स्वाभाविक और नैसर्गिक है जबकि उसे आरोप सिद्ध होने तक लगातार जेल में बन्द रखना प्राकृतिक न्याय के विरुद्ध है।
भारत के संविधान के अनुच्छेद-21 में निजी स्वतन्त्रता का अधिकार हर नागरिक को मिला हुआ है जिसमें वह उस सरकारी कानूनी कार्रवाई को चुनौती दे सकता है, जिसमें उसे प्रशासन द्वारा आरोपित कर भारत न्याय संहिता की विभिन्न धाराओं के तहत सजा देने का प्रावधान होता है मगर इन धाराओं की सत्यता केवल न्यायालय ही सिद्ध कर सकता है अतः न्यायालय चाहे तो उस व्यक्ति को जमानत पर जेल से बाहर आने की इजाजत दे सकता है। इस सन्दर्भ में सर्वोच्च न्यायालय की न्यायमूर्ति बी.वी. नागरत्ना व उज्वल भुइयां की पीठ ने यह कह कर कि जमानत सामान्य प्रक्रिया है और जेल असामान्य घटना है, साफ कर दिया है कि भारत की न्यायपालिका प्राकृतिक न्याय के अनुरूप अपनी कार्यवाही चलाने को वरीयता देती है।
इससे यह भी सिद्ध होता है कि न्यायपालिका सर्वप्रथम मानवीयता को ध्यान में रखकर ही अपने निर्णय करने को प्रश्रय देती है। वैसे भारत का पूरा संविधान ही मानवीयता पर टिका हुआ है तभी तो इसमें अनुच्छेद-21 को शामिल किया गया। आज हमें यह जानने की सख्त जरूरत है कि 1946 से लेकर 1949 तक बने भारतीय संविधान की प्रत्येक धारा और अनुच्छेद को संविधान सभा ने सर्वसम्मति से पारित किया था जबकि इसके सदस्यों में उस समय के लगभग सभी सामाजिक व राजनीतिक तबकों का प्रतिनिधित्व था (केवल समाजवादियों को छोड़ कर क्योंकि तब संविधान सभा का सदस्य बनते वक्त ब्रिटेन के सम्राट के प्रति वफादारी की शपथ उठानी पड़ती थी)। संविधान सभा में कांग्रेस के प्रतिनिधि भी थे और हिन्दू महासभा के डाॅ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी भी तथा राजे-रजवाड़े भी।
कहने का मतलब यह है कि संविधान ने जब मानवीयता को अपना आधार बनाया तो पूरा भारत देश इस पर सहमत था। इसलिए न्यायमूर्ति नागरत्ना व भुइयां का यह कहना कि आतंकवाद निरोधक कानून (यूएपीए) के तहत गिरफ्तार किये गये व्यक्ति को भी जमानत पर छूटने का अधिकार है, भारतीय संवैधानिक आदर्शों को ही प्रतिष्ठापित करता है। मगर यह भी सत्य है कि सर्वोच्च न्यायालय स्वयं ही इस सन्दर्भ में पूर्व में अलग-अलग फैसले दे चुका है।
खासकर 2020 के दिल्ली दंगों में गिरफ्तार जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय के छात्र नेता उमर खालिद व शरजिल इमाम के मामले में। ये दोनों छात्र नेता तभी से जेल में बन्द हैं और बीच में सर्वोच्च न्यायालय ने भी इनकी जमानत की अर्जी खारिज कर दी जबकि 2021 में सर्वोच्च न्यायालय की एक तीन सदस्यीय पीठ ने ‘भारत सरकार विरुद्ध के.ए. नजीब’ मुकदमे का फैसला देते हुए कहा था कि किसी भी व्यक्ति पर चलाये जा रहे मुकदमे की त्वरित सुनवाई में देरी करते हुए उसे लम्बा खींचना नागरिकों के मौलिक अधिकारों का हनन है जो कि जमानत पाने का अधिकार बनता है, चाहे उस व्यक्ति की गिरफ्तारी यूएपीए कानून के तहत ही क्यों न हुई हो।
इस तीन सदस्यीय पीठ ने तब 2015 से जेल में बन्द आरोपी नजीब को जमानत दे दी थी। नजीब को 2010 में केरल के एक प्रोफैसर का हाथ काटने के आरोप में गिरफ्तार किया गया था। न्यायमूर्ति नागरत्ना व भुइयां की पीठ ने इस फैसले का संज्ञान लेते हुए कहा कि आरोपी के विरुद्ध मुकदमा लम्बा चलाये रखने के लिए उसे लगातार जेल में बन्द रखे रहने पर कई तरह के सवाल उठने स्वाभाविक हैं क्योंकि यूएपीए कानून की धारा 43डी(5) में आरोपी को सख्त सजा देने का प्रावधान तो है और जमानत पाने के लिए कड़े नियम व उपनियम भी हैं मगर यह धारा तब हल्की पड़ जाती है जब आरोपी को बिना मुकदमा आगे बढ़ाये ही लम्बे समय तक जेल में बन्द रखा जाता है।
इससे संविधान के अनुच्छेद-21 की उल्लंघना होती है। इससे स्पष्ट है कि शरजिल इमाम व उमर खालिद के मामले में अभी तक जिस प्रकार का रवैया न्यायपालिका का रहा है वह मौलिक संवैधानिक मर्यादाओं के अनुरूप नहीं है। न्यायमूर्ति नागरत्ना व भुइयां का मन्तव्य यही लगता है। मगर तीन सदस्यीय पीठ के फैसले के बाद दो और मामले सर्वोच्च न्यायालय के सामने आये और दोनों ही बार न्यायालय की दो-दो सदस्यीय पीठों ने अलग-अलग फैसले लिये। एक मामला गुरुवेन्दर सिंह विरुद्ध पंजाब राज्य था और दूसरा गुलफिशा फातिमा विरुद्ध दिल्ली सरकार था। क्रमशः 2024 और 2026 के इन मामलों में गुलफिशा फातिमा मुकदमे में न्यायालय ने 2020 के दंगों में आरोपित पांच अन्य आरोपियों को जमानत दे दी मगर शरजिल इमाम व उमर खालिद को यह राहत नहीं दी गई।
यह फैसला न्यायमूर्ति अरविन्द कुमार व एन.वी. अंजरिया की पीठ ने किया था। उन्हें यह कह जमानत नहीं दी गई कि अपराध में उनकी सक्रियता अन्य लोगों से कही ज्यादा लगती है। न्यायमूर्ति नागरत्ना व भुइयां की पीठ ने अपने आंकलन में इन फैसलों को लेते हुए कहा है कि उन्हें इस बारे में इतना ही कहना है कि बड़ी संख्या वाली पीठ के फैसले के आलोक में कम सदस्यों वाली पीठों के फैसलों का अवलोकन किया जाना चाहिए। इससे कुल आशय यही निकलता है कि भारतीय दंड प्रणाली कठोर से कठोरतम परिस्थियों में भी मानवीयता का दामन नहीं छोड़ती है। न्यायमूर्ति नागरत्ना व भुइयां की पीठ जम्मू-कश्मीर के सैयद इफ्तिखार अन्द्राबी के मुकदमे पर विचार कर रही थी जिसे यूएपीए कानून के तहत 2020 में गिरफ्तार किया गया था। उस पर अवैध नशा तस्करी व आतंकवाद फैलाने के आरोप हैं। पीठ ने उसे जमानत देते हुए उपरोक्त आंकलन किये।


Download Android App
Download iOS App




