नैपोलियन बोनापार्ट के एक सेनापति व एक भारतीय राजकुमारी के मध्य संबंधों की प्रेम गाथा एक ऐसी कहानी है जिसमें समकालीन इतिहास की प्रामाणिक गवाही दर्ज है।
इस प्रेम कथा का नायक है, जनरल ल्यां फ्रैंकोइस अलार्ड और नायिका है चम्बा (हिमाचल) की एक राजकुमारी पानदेई। जनरल अलार्ड नैपोलियन बोनापार्ट की सेना में सेवारत था। वर्ष 1785 में सेंट ट्रौपेज़ नामक द्वीप पर जन्मा यह शख्स अपनी अदम्य वीरता व रण कौशल के कारण नैपोलियन के चहेते सेनानायकों की कतार में शामिल हो गया, लेकिन बहुचर्चित ‘वाटर लू-युद्ध’ के बाद वह भी अन्य सेनानायकों की तरह भटकाव का शिकार बना। पेरिस से वह किसी नई चुनौती की तलाश में पर्शिया चला गया, लेकिन वहां भी उसका मन नहीं लगा। उसने अपने कुछ सेनानायक मित्रों के सुझाव पर पंजाब का रुख किया, जहां उन दिनों महाराजा रणजीत सिंह का शासन था।
महाराजा पहले से ही उसकी योग्यता व रणकौशल के बारे में बहुत कुछ सुन चुका था। वैसे ही महाराजा का स्वभाव था कि वह सदा ऐसे यूरोपीय अधिकारियों की तलाश में रहता जो उसकी सेना के हर अंग को नई मुस्तैदी व ऊर्जा दे सकें।
महाराजा ने अलार्ड को अपनी सेना में जनरल का पद दिया और उसे अपनी फौज में एक नई ‘कोर’ स्थापित करने का दायित्व सौंप दिया।
उधर, चम्बा के राजा मैंगा राम की बेटी पान देई के अनेक किस्से एक बार फिर पेरिस में चर्चित हो उठे हैं। पान देई के बारे में प्राप्त रिकार्ड के अनुसार उसका जन्म 25 जनवरी, 1814 को चम्बा में हुआ था। वह केवल 14 वर्ष की ही थी जब फ्रांसीसी जनरल अलार्ड ने उसे देखा और उसी वर्ष मार्च में ही उसने राजा से पान देई का हाथ मांग लिया। अलार्ड और पान देई के सात बच्चे हुए थे। इनमें से दो बचपन में ही चल बसे थे। उन दोनों की कब्रें अब भी लाहौर में ही हैं।
जनरल अलार्ड पंजाब की सती प्रथा से बेहद आतंकित था। उसने पेरिस में एक समाचार-पत्र को दिए गए साक्षात्कार में इस तथ्य को स्वीकारा भी था कि वह राजकुमारी पान देई और बच्चों को केवल इसलिए पेरिस ले आया था ताकि किसी युद्ध में उसके दिवंगत होने पर पान देई को उसके शव के साथ ही सती होने पर विवश न किया जाए।
जनरल अलार्ड ने पान देई को पेरिस के समीप ही ‘सेंट ट्रोपेज़’ में रखा। वहां फ्रांसीसी रीति-रिवाज़ों के साथ दोनों का पुनर्विवाह हुआ। ऐसा कानूनी रूप से आवश्यक था क्योंकि तब तक पान देई, एक हिन्दू स्त्री के रूप में ही थी और विवाह से पहले उसका धर्म परिवर्तन नहीं हो पाया था। यह भी कहा जाता है कि चम्बा के राजा का ही आग्रह था कि पान देई को धर्म-परिवर्तन के लिए विवश न किया जाए। उसके परम्परागत पूजा पाठ के लिए उसे पेरिस ले जाते समय जनरल अलार्ड उसकी दो सेविकाओं को भी साथ ले गया था। फ्रांसीसी सम्भ्रात समाज में पान देई ने स्वयं को अपने बुद्धि कौशल से शीघ्र ही स्थापित व स्वीकार्य बना लिया।
1936 में अलार्ड, पान देई व बच्चों के लिए ‘सेंट ट्रोपेज़’ में समुचित व्यवस्था करने के बाद वापिस पंजाब लौट आया। 1941 में पेशावर में एक युद्ध के मध्य उसकी मृत्यु हो गई और उसकी अंतिम इच्छा के अनुसार पान देई को पंजाब में नहीं बुलाया गया। उसे आशंका थी कि पान देई को सती-प्रथा के लिए विवश किया जाएगा। अलार्ड के शव को लाहौर में ही उसी स्थान पर दफ्न किया गया जहां उसके एवं पान देई के दो बच्चे दफ्न थे। पति की मृत्यु पर पान देई के निवास पर फ्रांस के लगभग सभी प्रमुख शाही एवं सैनिक परिवार शोक व्यक्त करने के लिए एकत्र हुए। उन्हीं दिनों जनरल अलार्ड के परिजनों के आग्रह पर उसने रोमन कैथोलिक ईसाई बनने का निर्णय लिया। ईसाई धर्म में दीक्षा का यह समारोह सेंट ट्रोपेज़ के चर्च में ही सम्पन्न हुआ और फ्रांस के तत्कालीन सम्राट और साम्राज्ञी ने उसमें पान देई के ‘गॉड फादर’ और ‘गॉड मदर’ के रूप में शिरकत की थी। एक अन्य चर्चित फ्रांसीसी जनरल वेंचुरा ने इस आयोजन में अलार्ड-पविार की ओर से मेज़बान की भूमिका निभाई।
चम्बा की वह मासूम, अशिक्षित राजकुमारी तब तक फ्रास के सम्भ्रांत परिवारों में शुमार हो चुकी थी। मगर अपने संस्कारों से वह मुक्त नहीं हो पाई। उन दिनों पेरिस के कुछ अखबारों में यह भी छपा कि पान देई अलार्ड तब भी अपने हिमाचली अंचल एवं भारतीय परिवेश के कुछ पर्व वहां मनाती रहीं। इसी बीच उसकी छोटी बेटी फेलिसी का निधन हो गया। फेलिसी का जन्म कलकत्ता में हुआ था। पान देई ने पंजाबी परम्परा के अनुसार अपने विशाल आवास के उद्यान में ही उसकी अंतिम क्रिया सम्पन्न कराई। इसके लिए उसे सरकार से विशेष अनुमति भी लेनी पड़ी थी। प्राप्त विवरण के अनुसार अलार्ड ने सेंट ट्रोपेज़ में ही समुद्र के किनारे एक विशाल ‘एस्टेट’ खरीदी थी, जहां बाद में पान देई ने अलार्ड के स्मृति चिह्न व कुछ विशेष पेंटिंग प्रदर्शित की थीं। कहा तो यही जाता है कि पान देई ने स्वयं भी कुछ पेंटिंग बनाई थीं। दरअसल वह अलार्ड को कभी भुला नहीं पाई। वह तब भी पेशावर में अलार्ड की मृत्यु पर पूरी तरह विश्वास नहीं कर पाई। एक लम्बी अवधि तक वह हर शाम समुद्र के किनारे जाती और किसी जहाज़ से जनरल अलार्ड की वापसी के लिए घंटों मुन्तजि़र रहती। अलार्ड को भले ही अपने वतन की मिट्टी नसीब नहीं हुई और उसे लाहौर में ही दफन किया गया, लेकिन पान देई को अलार्ड के वतन की मिट्टी नसीब हुई। वह आज भी सेंट ट्रोपेज़ के कब्रिस्तान में अलार्ड-परिवार के मकबरे में दफन है।
अलार्ड के कुछ नज़दीकी मित्रों व महाराज की सेना के कुछ पुराने अधिकारियों ने पेरिस में ही महाराजा रणजीत सिंह की एक भव्य प्रतिमा स्थापित की। इस प्रतिमा के अनावरण समारोह जनरल अलार्ड एवं पान देई के वंशज विशेष रूप से उपस्थित थे। यह भव्य प्रतिमा एक भारतीय मूर्तिकार द्वारा ही बनाई गई थी।
जनरल अलार्ड और चम्बा की राजकुमारी
Summary :
नैपोलियन बोनापार्ट के एक सेनापति व एक भारतीय राजकुमारी के मध्य संबंधों की प्रेम गाथा एक ऐसी कहानी है जिसमें समकालीन इतिहास की प्रामाणिक गवाही दर्ज है। इस प्रेम कथा का नायक है, जनरल ल्यां फ्रैंकोइस अलार्ड और नायिका है चम्बा (हिमाचल) की एक राजकुमारी पानदेई। जनरल अलार्ड नैपोलियन बोनापार्ट की सेना में सेवारत था। वर्ष 1785 में सेंट ट्रौपेज़ नामक द्वीप पर जन्मा यह शख्स अपनी अदम्य वीरता व रण कौशल के कारण नैपोलियन के चहेते सेनानायकों की कतार में शामिल हो गया, लेकिन बहुचर्चित ‘वाटर लू-युद्ध’ के बाद वह भी अन्य सेनानायकों की तरह भटकाव का शिकार बना।…


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