बीते दिनों दिल्ली विधानसभा में पूर्व मुख्यमंत्री आतिशी के बयान को लेकर विवाद खड़ा हुआ जिसमें विपक्ष ने आरोप लगाया कि उनके द्वारा गुरु तेग बहादुर जी के लिए आपत्तिजनक शब्दों का प्रयोग किया गया है जिसके बाद यह मामला पूरी तरह से तूल पकड़ गया और केवल सिख समाज ही नहीं बल्कि गैर सिख संस्थाओं ने भी आतिशी सहित समूची आम आदमी पार्टी को दोषी मानते हुए उनके विधायक पद से इस्तीफे की मांग कर डाली। वहीं विपक्षी पार्टी भाजपा, कांग्रेस, शिरोमणि अकाली दल को मानो बैठे बिठाये दिल्ली से लेकर पंजाब तक आप को घेरने का मौका मिल गया।
दिल्ली में भी दिल्ली सिख गुरुद्वारा प्रबन्धक कमेटी, परमजीत सिंह सरना सहित कई सिख जत्थेबंदियों ने इस पर आपत्ति दर्ज करवाते हुए कानूनी कार्यवाही की मांग के चलते आतिशी के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज करवाई। वहीं दूसरी ओर आप कार्यकर्ताओं ने इसे वीडियो से छेड़छाड़ का मामला बताते हुए आतिशी को बेकसूर बताया। असल में विवाद की शुरुआत तब हुई जब दिल्ली के कानून मंत्री कपिल मिश्रा और कुछ अन्य भाजपा नेताओं ने सोशल मीडिया पर एक वीडियो साझा कर दावा किया गया कि इस वीडियो में आतिशी ने दिल्ली विधानसभा के सत्र के दौरान नौवें सिख गुरु, श्री गुरु तेग बहादुर जी के प्रति अपमानजनक भाषा का इस्तेमाल किया है। यह बहस दिल्ली विधानसभा के शीतकालीन सत्र के दौरान हुई थी। नवंबर में गुरु साहिब के 350वें शहीदी दिवस के उपलक्ष्य में आयोजित एक कार्यक्रम पर चर्चा के दौरान हुई थी।
हालांकि, पंजाब की जालंधर पुलिस ने एक स्थानीय नेता इकबाल सिंह की शिकायत पर इस मामले में अज्ञात लोगों के खिलाफ एफआईआर दर्ज की। वहीं सूत्रों के हवाले से यह भी कहा जा रहा है कि फॉरेंसिक जांच में यह पाया गया कि वीडियो के साथ छेड़छाड़ की गई थी और आतिशी ने ‘गुरु’ शब्द का वह अपमानजनक संदर्भ में उपयोग नहीं किया था जो कैप्शन में दिखाया गया था, हालांकि इसकी कोई पुख्ता जानकारी नहीं मिली है लेकिन इस बाबत दिल्ली विधानसभा सचिवालय द्वारा मांगे गए जवाब पर अब डायरेक्टर जनरल पंजाब और जालंधर के पुलिस कमिश्नर ने दिल्ली विधानसभा के सचिव को पत्र लिख जवाब देने के लिए 10 दिन का समय मांगा है। दिल्ली विधानसभा के अध्यक्ष विजेंद्र गुप्ता ने इस कार्रवाई को असंवैधानिक करार दिया। उन्होंने स्पष्ट किया कि विधानसभा के भीतर की गई कोई भी रिकॉर्डिंग सदन की विशेष संपत्ति होती है।
बाहरी पुलिस बल सदन की कार्यवाही के आधार पर अध्यक्ष की अनुमति के बिना स्वतः संज्ञान लेकर एफआईआर दर्ज नहीं कर सकती। वहीं सिख बुद्धिजीवियों की राय में आतिशी या भाजपा नेताओं में से कोई तो कसूरवार है, पर जो भी असल में दोषी है उसके खिलाफ सख्त कार्रवाई होनी चाहिए क्योंकि गुरु साहिब के लिए अपमानजनक शब्द कहना तो दूर, कोई ऐसा सोच भी नहीं सकता और दोनों में से जिस किसी ने भी राजनीतिक लाभ लेने हेतु ऐसी घिनौनी हरकत करने की सोच रखी उसे सामने लाकर सख्त सजा मिलनी चाहिए ताकि भविष्य में कोई ऐसा करने से पहले कई बार सोचे। गुरु साहिबान सबके लिए सम्मानजनक हैं उनका अपमान किसी सूरत में बर्दाश्त नहीं किया जा सकता।
पाकिस्तान में सिनेमा के माध्यम से खालिस्तानी गतिविधियों को बढ़ावा
पाकिस्तान में यह देखा जा रहा है कि सिनेमा का उपयोग भारत-विरोधी गतिविधियों, विशेष रूप से खालिस्तान से जुड़ी गतिविधियों को तेज करने के एक उपकरण के रूप में लगातार बढ़ रहा है। जो लोग भारत में प्रतिबंधों के कारण खालिस्तान का प्रचार करने वाली फिल्में या गीत बनाने में कठिनाई महसूस करते हैं, वह इस स्थिति का पूरा लाभ उठाते दिखाई देते हैं। वह पाकिस्तान जाते हैं, बिना किसी रोक-टोक के अपनी गतिविधियां करते हैं और फिर उस सामग्री को सोशल मीडिया पर वायरल कर देते हैं। पाकिस्तानियों के इस प्रतिगामी सोच के कारण एक ऐसी स्थिति बन गई है जिसमें एक ओर पूरा भारत विशेषकर भारतीय पंजाब तेज आर्थिक विकास, संस्थागत सुधारों और सामाजिक प्रगति के कारण वैश्विक ध्यान आकर्षित कर रहे हैं, वहीं दूसरी ओर पाकिस्तानी पंजाब भ्रष्टाचार, घोटालों और लंबे समय से चली आ रही कुशासन की स्थिति में फंसा हुआ है।
अपनी आंतरिक विफलताओं का सामना करने के बजाय, पाकिस्तानी राज्य लगातार भारत-विरोधी कथानकों पर निर्भर होता जा रहा है। इसी उद्देश्य से राज्य-समर्थित मीडिया हाउसों, सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर्स, यूट्यूबर्स और फिल्म निर्माताओं को सक्रिय किया जा रहा है ताकि सांस्कृतिक उत्पादन के माध्यम से ध्यान भटकाया जा सके और जनमत को प्रभावित किया जा सके। किसी भी स्थिति में, सिनेमा का हथियारीकरण कोई नई घटना नहीं है। दशकों से पाकिस्तानी फिल्मों और टेलीविजन धारावाहिकों में सिख पात्रों, विशेषकर सिख महिलाओं को अत्यंत संकीर्ण और गहराई से विवादास्पद दृष्टिकोण से प्रस्तुत किया गया है। कई रचनाओं में इस्लामीकरण या “धर्मांतरण-आधारित रोमांस” जैसे कथानक प्रयोग किए जाते हैं, जिन्हें अनेक सिख टिप्पणीकार अपमानजनक और वैचारिक रूप से पक्षपाती मानते हैं।
वेयरियम (1981) जैसी फिल्में इस बात के लिए याद की जाती हैं कि उनमें एक सिख महिला के भावनात्मक झुकाव को एक मुस्लिम पुरुष नायक की ओर इस तरह दिखाया गया है जिससे परोक्ष रूप से इस्लाम और मुस्लिम संस्कृति को श्रेष्ठ और अधिक आकर्षक प्रस्तुत किया जाता है। पंजाबान (2003), जो एक पाकिस्तानी मुस्लिम पुरुष और एक भारतीय सिख महिला के बीच सीमा-पार प्रेम कहानी पर केंद्रित है, को भी इस धारणा पर आधारित होने के कारण आलोचना का सामना करना पड़ा कि सिख महिलाएं भावनात्मक या आध्यात्मिक रूप से इस्लाम और मुस्लिम पाकिस्तान की ओर आकर्षित होती हैं।
पाकिस्तानी सिनेमा का उपयोग भारत-विरोधी कथानकों को मजबूत करने और राजनीतिक उद्देश्यों के लिए धार्मिक प्रतीकों के शोषण हेतु किया जा रहा है। आलोचकों का कहना है कि ऐसी रणनीतियां पवित्र स्थलों की मर्यादा को क्षीण करती हैं, विरासत के राजनीतिकरण को सामान्य बनाती हैं और कला व धर्म को राज्य सत्ता के उपकरण में बदल देती हैं। इसकी कीमत सरकारें नहीं, बल्कि वे समुदाय चुकाते हैं जिनकी पहचान को बार-बार हथियाया और विकृत किया जाता है। इसलिए सभी सिख संगठनों को इस मुद्दे का संज्ञान लेना चाहिए और इसे रोकने के लिए अभियान शुरू करने चाहिए अन्यथा भविष्य में सिख समुदाय को भारी कीमत चुकानी पड़ सकती है।


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