जब भी कमी खलती है आपकी
आपकी यादों से मुलाकातें कर लेता हूं,
अब आपसे मिलना मुमकिन कहां
इसलिए आपकी तस्वीर से बातें कर लेता हूं।
जिन्दगी के अंधेरों में वो जलती मशाल थे,
मुसीबतों से बचाने को वो परिवार की ढाल थे,
कहां जी पाये थे वो अपनी जिन्दगी अपने हिसाब से
पिता हमारे कोई आम शख्स नहीं, त्याग की एक मिसाल थे।
बच्चों के लिए मां प्रेम और स्नेह का प्रतीक होती हैं। वे निस्वार्थ प्रेम प्रदान करती हैं और तब तक उनका पालन-पोषण करती हैं जब तक कि वे आत्मनिर्भर न हो जाएं। दूसरी ओर, पिता अधिकांश बच्चों के लिए एक शक्ति होते हैं। उनके जीवन को पिता की उपस्थिति से मजबूती मिलती है। शायद आप इसे महसूस न करें, लेकिन पिता की उपस्थिति मात्र ही एक मार्गदर्शक की तरह होती है जो हर समय आपके आसपास रहता है। आज मेरे पिता पंजाब केसरी के पूर्व मुख्य सम्पादक और पूर्व सांसद श्री अश्विनी कुमार का जन्मदिवस है। मुझे याद है कि आपको जन्मदिन मनाने का बहुत शौक था। आपका जन्मदिन मेरे लिए और मेरे अनुजों अर्जुन, आकाश के लिए भी खुशी का सबब होता। पिताश्री जब हमारा जन्मदिन मनाते या मेरी मां किरण चोपड़ा के जन्मदिन पर पार्टी करते तो उनकी खुशी का कोई ठिकाना नहीं रहता। दोस्तों के बीच रहना और खुलकर जीना उनकी आदत रही। दोस्तों के बीच उनकी दीवानगी देख सभी कहने लगते थे-
“यार बिना कख दा, यार नाल लख दा।”
आज भी हम उनका जन्मदिन उनके दोस्तों के बीच मनाएंगे। मैं समझता हूं शब्दों से भरा सागर भी आज हमारी भावनाओं को चित्रित करने के लिए पर्याप्त नहीं होगा। भावुकता के क्षणों के बीच मैं महसूस करता हूं कि मेरे लिए मेरी मां दृढ़ता और संकल्प की प्रतीक हैं। उन्होंने हम सब के और परिवार के लिए हर संभव प्रयास किया। वहीं दूसरी ओर मेरे पिता प्रेरणा के स्रोत और धैर्य की साक्षात मूर्ति थे। मैंने उनसे मौन का महत्व सीखा। उनका मौन मेरे लिए उनके शब्दों से कहीं अधिक गहरा अर्थ रखता था। वे मेरे आदर्श थे और हमेशा रहेंगे।
पत्रकारिता तो उन्हें विरासत में मिली थी। डीएवी कालेज जालंधर से ग्रेजुएशन और पंजाब विश्वविद्यालय चंडीगढ़ से पत्रकारिता में स्नातकोत्तर तक की शिक्षा प्राप्त की लेकिन उनकी दिलचस्पी क्रिकेट में थी।
कई वर्षों तक वह रणजी ट्राफी, ईरानी ट्राफी और दिलीप ट्राफी में फ्रंट फुट पर खेले। गेंदबाजी और बल्लेबाजी के क्षेत्र में उन्हें दक्षता प्राप्त थी। उनकी पहचान आल राउंडर के तौर पर स्थापित हो चुकी थी। उन्हें नेशनल टीम में खेलने का अवसर मिला लेकिन आपातकाल और फिर उसके बाद आतंकवाद ने उनके जीवन की धारा ही बदल दी। पूजनीय दादा श्री रमेश चन्द्र जी की शहादत के बाद उन्होंने कलम सम्भाली तो जीवन के अंतिम क्षण तक लिखते रहे। उन्हें अपने निर्भीक विचारों और स्वतंत्र लेखनी के लिए जाना जाता है। उनके सम्पादकीय लेख के लाखों लोग प्रशंसक रहे। मेरे पड़दादा और दादा की शहादत के बाद भी उन्होंने आतंकवाद के विरुद्ध लेखन नहीं छोड़ा। वह करनाल संसदीय सीट से भारी मतों से जीत कर सांसद भी बने लेकिन कलम छोड़ना उन्हें गवारा न था।
जीवन चलता रहता है। हर बाधा एक अवसर लेकर आती है। अश्विनी जी स्वयं स्वामी विवेकानंद की पंक्तियों का स्मरण करते थे-दूसरे तुम्हारा क्या मूल्यांकन करते हैं, यह उतना महत्वपूर्ण नहीं, महत्वपूर्ण यह है कि तुम स्वयं को कितना महत्वपूर्ण मानते हो। मेरे पिता के व्यक्तित्व का आंकलन न तो भाई कर सकता है, न ही अन्य रिश्तेदार। कोई रिश्ता उनका आंकलन कर ही नहीं सकता है। मुझे इस बात की खुशी है कि उन्होंने जो भी जीवन में किया बड़ी शिद्दत के साथ किया।
सोचता हूं कि उनकी कलम में ऐसी कौन सी ताकत थी जो लाखों पाठकों को दिवाना बना देती थी। मुझे आज इस बात की खुशी है कि दिल्ली की श्रीमती रेखा गुप्ता सरकार ने मेरे पिता के व्यक्तित्व का मूल्यांकन करते हुए ब्रिटेनिया चौक का नामकरण अश्विनी चोेपड़ा मिन्ना के नाम पर करने का फैसला किया है। पंजाब केसरी परिवार उनका हार्दिक आभार व्यक्त करता है। यह मेरे पिताजी को बहुत बड़ा हैप्पी बर्थडे गिफ्ट है।
आज जो मैं हूं, उसमें ढालने के लिए मैं अपने माता-पिता का एहसान कभी नहीं चुका सकता, फिर भी मैं उनके मूल्यों को अपनाकर उनका सम्मान कर सकता हूं। मैंने कभी हार न मानने का सबक सीखा और अपने पिता से असीम धैर्य और मौन का महत्व सीखा। जब हम किसी अपने को खो देते हैं तो हम वे सभी काम स्वयं करने लगते हैं जो उस व्यक्ति को करने थे, दूसरे शब्दों में कहें तो, हमें जीवन जीने की अधिक शक्ति प्राप्त होती है। कठिनाइयां हमें और अधिक मजबूत बनने के अवसर प्रदान करती हैं। आज मैं और मेरे दोनों अनुज अर्जुन और आकाश पत्रकारिता की विरासत को सम्भाल रहे हैं। हम जीवन भर पिताजी का अनुसरण करते हुए अपनी राह पर आगे बढ़ेंगे।


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