डा. धर्मबीर भारती के ‘अंधायुग’ की कुछ पंक्तियां याद आ रही हैं ः
टुकड़े-टुकड़े हो बिखर चुकी मर्यादा
उसको दोनों ही पक्षों ने तोड़ा है
यह अजब युद्ध है नहीं किसी की भी जय
दोनों पक्षों को खोना ही खोना है
अन्धों से शोभित था युग का सिंहासन
दोनों ही पक्षों में विवेक ही हारा
दोनों ही पक्षों में जीता अन्धापन
भय का अन्धापन, ममता का अन्धापन
अधिकारों का अन्धापन जीत गया
भारती की यह काव्य पंक्तियां महाभारत-युद्ध के पात्रों पर केंद्रित थी। मगर लगता है ईरान-अमेरिका युद्ध के संदर्भ में भी ये प्रासंगिक हैं। इस समझौते ने दोनों पक्षों को भरपूर शर्मिंदगी का एहसास दिया है मगर सभी ‘टूटी तलवारें हाथों में लिए’ मूछों पर ताव देते हुए युद्ध-भूमि से सगर्व लौट रहे हैं। कभी-कभी लगता है ये देश ‘युद्ध के नशेड़ी’ हो चुके हैं। अभी तय नहीं है कि समझौतों की घोषणाएं कब तक लागू रहेंगी। अमेरिका और इजराइल ने 28 फरवरी को ईरान पर हमला किया था। एक अनुमान के मुताबिक 108 अरब डॉलर (करीब 1,08,75,73, 15,00000) खर्च किए। साथ ही तेल की कीमत बढ़ने से अमेरिका और दुनिया के दूसरे देशों के लोगों को भारी कीमत चुकानी पड़ी।
अमेरिका ने रक्षा विभाग ने बताया था कि अमेरिका-ईरान युद्ध के पहले छह दिन में ही 11.3 अरब डॉलर खर्च हो चुके थे। रोजाना के हिसाब से यह रकम करीब 1.88 अरब डॉलर बैठती है। इसके बाद रोजाना का खर्च करीब 1 अरब डॉलर यानी करीब 94,47,55,00,000 रुपए रहा। यह खर्च 28 फरवरी से 16 जून तक के अनुमानों के आधार पर है। हालांकि आलोचकों का कहना है कि इस खर्च को कम करके दिखाया गया है और असल खर्च इससे कहीं अधिक है। जानकारों का कहना है कि अगर इसमें अमेरिका के कुल आर्थिक बोझ को शामिल किया जाए तो यह आंकड़ा एक ट्रिलियन डॉलर तक जा सकता है।
अमेरिकी रक्षा मंत्रालय पेंटागन के मुताबिक ईरान युद्ध के शुरुआती दौर में ही मिसाइलों और गोला-बारूद पर 25 बिलियन खर्च हो गए थे। ईरान-कॉस्ट-टिक्कर डॉट कॉम के मुताबिक, अमेरिका को ईरान युद्ध के दौरान रोजाना 1 अरब डॉलर खर्च करने पड़ रहे थे। अमेरिका ने ईरान युद्ध के शुरुआती दौर में शाहेद ड्रोन के मारने के लिए पैट्रियट मिसाइलें दागी थीं। इसमें प्रत्येक मिसाइल की कीमत 40 लाख डॉलर है। अमेरिका ने खाड़ी में सैनिकों की भारी तैनाती कर रखी थी। इस पर उसे रोजाना भारी खर्च करना पड़ रहा था। ट्रम्प प्रशासन ने ईरान युद्ध के लिए शुरुआत में 200 अरब डॉलर की मांग की थी। ईरान में युद्ध में तबाह हुए बुनियादी ढांचों, तेल रिफाइनरियों और पॉवर ग्रिड्स को दोबारा बनाने के लिए 300 बिलियन डॉलर खर्च आने का अनुमान है। समझौते के मुताबिक अमेरिका ने यह राशि ईरान को देने पर सहमत जताई है। अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प का कहना है कि यह पैसा खाड़ी देशों से आएगा। इसके अलावा ईरान के ‘फ्रीज एसेट्स’ को भी ‘रिलीज’ किया जाएगा।
युद्ध के प्रभाव से अंतर्राष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें बढ़ने के कारण अमेरिकी लोगों को 40 बिलियन से अधिक का नुक्सान झेलना पड़ा है। हालांकि डेमोक्रेटिक नेताओं और कई अर्थशास्त्रियों का मानना है कि यह आंकड़ा काफी कम है। उनका कहना है कि अमेरिकी अर्थव्यवस्था और देश के लोगों को होने वाला असल नुक्सान 630 अरब डॉलर से लेकर एक ट्रिलियन डॉलर तक हो सकता है।
अमेरिका की उपलब्धि सिर्फ यह है कि इस युद्ध की कवायद से जान छूटी। ईरान को अपने पुराने ध्वस्त निर्माण के स्थान पर नवनिर्माण के लिए भरपूर खर्चा-पानी मिला। पूरी दुनिया को चुंगी-भाड़ा चुकाकर होर्मुज की आवाजाही मिली। मगर सबसे महत्वपूर्ण सवाल वहीं पर है। इतिहास से कभी भी किसी भी देश या किसी भी राजनेता किस्म के शख्स ने कुछ भी नहीं सीखा।
अमेरिका को इतिहास ने वियतनाम-युद्ध में भी सीख देने की मशक्कत की थी। उसे अफगानिस्तान-युद्ध में भी इतिहास ने बहुत कुछ ‘सीख’ के रूप में परोसा था। वैसे भी प्रथम और द्वितीय विश्व युद्ध में भी बहुत कुछ था सीखने को। मगर सब व्यर्थ।
साहिर लुधियानवी ने भी कहा था-
ख़ून अपना हो या पराया हो
नस्ल-ए-आदम का ख़ून है आखिर
जंग मशरिक में हो कि मग़रिब में
अमन-ए-आलम का ख़ून है आखिर
बम घरों पर गिरें कि सरहद पर
रूह-ए-तामीर ज़ख्म खाती है
खेत अपने जलें कि औरों के
ज़ीस्त फाक़ों से तिलमिलाती है
टैंक आगे बढ़ें कि पीछे हटें
कोख धरती की बांझ होती है
फतह का जश्न हो कि हार का सोग
जि़ंदगी मय्यतों पे रोती है
जंग तो खुद ही एक मसला है
इतिहास में यह सारी घटनाएं दर्ज हैं। हैमिंग्वे, सॉमरसैट मॉम, शेक्सपियर, रामधारी सिंह दिनकर, धर्मवीर भारती, साहिर, फैज़ और उनसे भी पहले जफर, गालिब की कलमें भी खूब चलीं। मगर हमने सिर्फ वाह-वाह की। दुनियाभर में शताब्दी समारोह भी सब के बारे में मनाए गए। शांति के श्वेत कबूतर खूब उड़ाए गए। हिरोशिमा, नागासाकी में हर साल लाखों लोग अब भी पुष्पांजलियां अर्पित करते हैं। मगर इतिहास तो सिर्फ एक मुंशी है। वह इन महानायकों, खलनायकों को क्या सीख देगा। हमने गीता से 18 महापुराणों से, महाभारत से, रामायण या तुलसी बाबा के रामचरितमानस से क्या कुछ भी सीखा? इतिहास या कविता-उपन्यास से कोई भी कुछ नहीं सीखता।
पुराने किस्से छोड़ भी दें फिर भी 110 दिन तक चली इस जंग में लगभग 9000 लोग मारे गए, पूरे 110 दिन हवाई हमलों के ‘सायरन’ बजे। कोई भी टैंक ज़मीन पर नहीं उतरा, आमने-सामने की लड़ाई का तो सवाल ही नहीं। कुल अनुमानत: 162 लाख करोड़ रुपए फूंक डाले गए। और इन सिरफिरे सियासतदानों का क्या भरोसा। कुछ दिन बाद फिर दनदना उठें। इन ‘युद्ध-नशेडि़यों’ को कहां सुहाती है शांति।


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