भारत-आस्ट्रेलिया रक्षा सहयोग

Summary :

भारत-ऑस्ट्रेलिया संबंध सभ्यागत निकटता के प्रतीक से आगे बढ़कर एक बहुआयामी और ठोस साझेदारी में विकसित हो चुके हैं, जिसे विशेष रूप से चीन के प्रभुत्व संबंधी साझा चिंताओं ने आकार दिया है। संबंधों में नए आयाम स्थापित करने के लिए दोनों देशों के बीच व्यापार, रक्षा, ऊर्जा और शिक्षा जैसे क्षेत्रों में संस्थागत तंत्र को मजबूत करना जरूरी है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की इंडोनेशिया के बाद ऑस्ट्रेलिया यात्रा सभी अर्थों में काफी सफल रही। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और ऑस्ट्रेलिया के प्रधानमंत्री एंथनी अल्बनीस ने संयुक्त रक्षा और सुरक्षा सहयोग पर संयुक्त घोषणा पत्र जारी किया। दोनों नेताओं ने हिन्द…

भारत-ऑस्ट्रेलिया संबंध सभ्यागत निकटता के प्रतीक से आगे बढ़कर एक बहुआयामी और ठोस साझेदारी में विकसित हो चुके हैं, जिसे विशेष रूप से चीन के प्रभुत्व संबंधी साझा चिंताओं ने आकार दिया है। संबंधों में नए आयाम स्थापित करने के लिए दोनों देशों के बीच व्यापार, रक्षा, ऊर्जा और शिक्षा जैसे क्षेत्रों में संस्थागत तंत्र को मजबूत करना जरूरी है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की इंडोनेशिया के बाद ऑस्ट्रेलिया यात्रा सभी अर्थों में काफी सफल रही। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और ऑस्ट्रेलिया के प्रधानमंत्री एंथनी अल्बनीस ने संयुक्त रक्षा और सुरक्षा सहयोग पर संयुक्त घोषणा पत्र जारी किया। दोनों नेताओं ने हिन्द प्रशांत क्षेत्र को स्वतंत्र, शांतिपूर्ण, स्थिर और समृद्ध बनाए रखने की प्रतिबद्धता दोहराते हुए रक्षा सहयोग, समुद्री सुरक्षा, रक्षा उद्योग, सैन्य अभ्यास और उन्नत रक्षा प्रौद्योगिकी में सहयोग बढ़ाने का फैसला किया है। दोनों देशों के बीच यूरेनियम आपूर्ति समझौता रणनीतिक संबंधों में नया आयाम माना जा रहा है। ऑस्ट्रेलिया वही देश है जिसने 1974 और 1998 के परमाणु परीक्षणों के बाद भारत को यूरेनियम देने से साफ इन्कार कर दिया था। 2010 और 2011 में भी ऐसा समय आया जब भारत के परमाणु कार्यक्रम के कारण ऑस्ट्रेलिया इस बात पर अड़ गया कि भारत को परमाणु अप्रसार संधि पर हस्ताक्षर करने चाहिएं।
वर्ष 1974 में जब भारत ने पोखरण-1 के जरिये दुनिया को अपनी परमाणु क्षमता दिखाई तो कई पश्चिमी देश भड़क उठे थे। पश्चिमी मीडिया ने तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी के कार्टून बनाकर मजाक उड़ाया था कि भारत पहले अपनी गरीबी दूर करे, क्योंकि भारत परमाणु अप्रसार संधि को भेदभावपूर्ण मानता था इसलिए उसने हस्ताक्षर नहीं किए थे। 2014 में हुए नागरिक परमाणु सहयोग समझौते के बाद ही ऑस्ट्रेलिया ने यूरेनियम सप्लाई की राह खोली। अन्य देशों की तरह ऑस्ट्रेलिया को भी डर था कि भारत इस यूरेनियम का इस्तेमाल बिजली बनाने के बजाय परमाणु बम बनाने में कर सकता है। हालांकि, 2008 में हुए भारत-अमेरिका असैन्य परमाणु करार के बाद ऑस्ट्रेलिया में भी बदलाव आया। भारत के पहले परमाणु हमला न करने के ट्रैक रिकॉर्ड को देखते हुए 2011 में ऑस्ट्रेलिया ने नीति बदली। वर्ष 2014 में जब ऑस्ट्रेलियाई पीएम टोनी एबॉट भारत आए, तब ऐतिहासिक नागरिक परमाणु सहयोग समझौते पर हस्ताक्षर हुए। सुरक्षा गारंटी, परमाणु दायित्व कानून के विवादों को सुलझाने जैसी तमाम तकनीकी बारीकियों और कागजी कार्रवाइयों को पूरा होने के बाद इस समझौते पर हस्ताक्षर हुए हैं।
भारत के परमाणु कार्यक्रम का विरोध करने वाले ऑस्ट्रेलिया से यूरेनियम की सप्लाई अपने आप में एक बड़ी सफलता है। यह यूरेनियम भारत के परमाणु कार्यक्रम के लिए नहीं बल्कि परमाणु ऊर्जा संबंधी जरूरतों को पूरा करने में अहम भूमिका निभाएगा। इससे गैर जीवाश्म ईंधन आधारित बिजली उत्पादन क्षमता बढ़ाने में मदद मिलेगी। भारत सरकार ने 2047 तक परमाणु ऊर्जा को 100 गीगावाट तक पहुंचाने का लक्ष्य रखा है। भारत अभी केवल 8 गीगावाट परमाणु ऊर्जा बनाता है। 100 गीगावाट उत्पादन के लिए भारत को यूरेनियम की बहुत जरूरत है। इस समय यूरेनियम का सबसे बड़ा भंडार ऑस्ट्रेलिया के पास है। हाल ही के वर्षों में भारत की ऊर्जा मांग तेजी से बढ़ी है।
परमाणु ऊर्जा से बनने वाली ​बिजली स्वच्छ ऊर्जा का स्रोत है। स्वच्छ ऊर्जा भारत की व्यावहारिक जरूरत है। जिस तरह से देश में इलेक्ट्रिकल व्हीकल्स उद्योग विस्तार कर रहा है और स्वच्छ हवा के लिए ठोस कदम उठाए जा रहे हैं, उसके लिए हमें स्वच्छ ऊर्जा के स्रोत विकसित करने की जरूरत है। भारत की आर्थिक प्रगति के लिए भी स्वच्छ ऊर्जा महत्वपूर्ण पहलू है। जहां तक दोनों देशों के बीच रक्षा सहयोग का सवाल है, दोनों देशों की करीबी चीन की सैन्य महत्वाकांक्षाओं पर नजर बनाए रखने की साझा इच्छा पर आधारित है। दोनों देश हिन्द प्रशांत पर संयुक्त रूप से नजर रखेंगे। ऑस्ट्रेलिया ने भारत को अंतरिक्ष कार्यक्रम में सहयोग देने का भी फैसला किया है। दोनों देश हिन्द महासागर में कोकोस द्वीप समूह पर अस्थाई अंतरिक्ष ट्रैकिंग टर्मिनल बनाएंगे। यद्यपि दोनों देशों में साइबर, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस  और ड्रोन जैसे क्षेत्रों में पहले से ही सहयोग चल रहा है। ऑस्ट्रेलिया में 10 लाख से अधिक भारतीय मूल का प्रवासी समुदाय संबंधों में जीवंत सेतु बना हुआ है। हाल के वर्षों में ऑस्ट्रेलिया में भारतीय मूल के लोगों की संख्या काफ़ी बढ़ी है, जिससे देश में मोदी के समर्थकों का एक बड़ा आधार बना है। जून में जारी पिछले साल के आंकड़ों के अनुसार, पहली बार ऑस्ट्रेलिया में विदेश में जन्मे निवासियों का सबसे बड़ा समूह भारत में जन्मे लोगों का था। ऑस्ट्रेलिया इंडिया इंस्टीट्यूट की डॉ. तीस्ता प्रकाश ने एएफपी को बताया, “2014 में ऑस्ट्रेलिया में भारतीय मूल के लोगों का समुदाय अपेक्षाकृत छोटा था लेकिन 2026 में यह ऑस्ट्रेलिया का सबसे बड़ा प्रवासी समुदाय बन गया है। इसने ब्रिटिश मूल के समुदाय को पीछे छोड़ दिया है। ये एक बड़ा परिवर्तन है।”
शिक्षा और खेल संबंध तो पहले से ही काफी गतिशील हैं। ऑस्ट्रेलियाई सरकार भारत को अपनी अर्थव्यवस्था के विकास के लिए रणनीतिक केन्द्र के रूप में देखती है और उसका नया आर्थिक रोडमैप भारत के लिए काफी फायदेमंद हो सकता है।

Aditya Chopra

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